भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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११६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम विशिष्टस्य रजतादेरेकस्मिन्ननुभवे प्रकाशिततया तज्जन्येन संस्कारेणापि तथैवोप- नेतुमुचितत्वात्, प्रत्यभिज्ञायां तथैव फलदर्शनात् । दोषवशात् तत्तांशमोष इति चेन्न । विषयसम्बन्धस्य स्वभावत्वेन संस्कारे तदलोपात् । दोषात् स्मृतौ तथेति चेत्, कः पुनरसौ दोषः ? यस्माद् भ्रान्त्युत्पत्तिः परेषाामिति चेत्तर्हि तद्रजताविशिष्टमिदं रजतमित्यत्र, सैव रजतव्यक्तिरियमित्यत्र वा, पुनस्तदेव रजतमुपस्थितमितीह वा, सामान्यत एव रजतस्य तदाऽपि परामृष्टस्य भ्रान्तौ तत्तांशमोषः स्यात्, दोषस्य विद्यमानत्वात् । अन्यथा इदं रजतमित्यंशेऽपि तस्मिन् ज्ञाने तत्तांशमोषो न स्यादित्यास्तामियं प्रसक्तानुप्रसक्तिः । विशेषण से विशिष्ट भासता हो, वह स्मरण में विशेषण-रहित कैसे भास सकता है ? प्रत्यभिज्ञा के स्मरण-अंश में अनुभव के अनुकूल विशिष्ट का भान ही देखा भी गया है । समर्थन—दोषबल से 'रजतम्' इस स्मरण में तत्तांश का त्याग होगा ? खंडन—तत्तारूप विषय के साथ संस्कार का स्वभाव ही सम्बन्ध है और दोष से संस्कार का लोप हो नहीं सकता । अन्यथा 'रजतम्' यह स्मरण ही कैसे होगा ? अतः दोष अकिञ्चित्कर है । समर्थन—दोष संस्कार का नाश नहीं करता, किन्तु तत्ता-अंश में स्मृतिरूप कार्य का प्रतिबन्धक होता है । खंडन—दोष क्या वस्तु है । अर्थात् पूर्वोक्त युक्तियों से खण्डित होने से दोष कोई वस्तु ही नहीं है । समर्थन—पर ( अन्यथाख्यातिवादी ) को जिस पित्त आदि के बल से भ्रम होता है, वे पित्तादि ही दोष हैं। खंडन—यदि दोष से तत्तांश का त्याग होता है, तो जिस स्थल में शुक्ति में उस रजत से अविशिष्ट ( सदृश ) 'यह रजत है' ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है, उस भ्रम में तथा 'यह वही रजत व्यक्ति है' इस प्रत्यभिज्ञा-भ्रम में तथा 'वही रजत फिर उपस्थित हुआ' इस प्रत्यभिज्ञारूप भ्रम में भी—जहाँ सामान्यतः तद्-शब्द से रजत का परामर्श है, वहाँ तत्तांश का त्याग होना चाहिए, क्योंकि दोष वहाँ भी है । अन्यथा यदि यहाँ दोष न मानें, तो इसी प्रत्यभिज्ञारूप भ्रम के 'इदं रजतम्' इस अंश में तत्तांश का त्याग कैसे होगा—प्रमा-लक्षण के खण्डन में प्रसक्त इस प्रत्यभिज्ञा- खण्डन में अनुप्रसक्त तत्तांश त्याग का खण्डन अनावश्यक है ।