खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] अनुभूति-जाति का खण्डन ११७ न च प्रत्यभिज्ञा नाम स्मरणानुभवाभ्यामन्य एव प्रकार इति वाच्यम् ; अननुभवत्वेन अप्रमात्वापातात् । न चैवमस्त्वित्यपि वाच्यम् ; अक्षणिकत्ववादिना स्थिरसिद्धौ प्रमाणत्वेनोपन्यस्तत्वात् । ईदृशप्रसिद्धलक्ष्यत्यागेन च लक्षणोपपादने- ऽनियमः प्रसज्येतेति । तस्मात् जातिवाचिनोऽनुभवपदस्य स्मृतितो व्यवच्छेदार्थमुपादानमिति सर्वथा- नुपपन्नमिति । • अथ स्मृत्यन्यत्वखण्डनम् नापि स्मृत्यन्यत्वमनुभवार्थः, नापि स्मृतिलक्षणरहितत्वम्; उक्तक्रमेण स्मृत्यनुभूतिसङ्करस्य दर्शितत्वेन व्यवच्छेदकत्वानुपपत्तेः । इतोऽपि न स्मृत्यन्यत्वमनुभवार्थः । तथा हि—स्मृत्यन्यत्वं यत्किञ्चित्स्मरणा- न्यत्वं वा, सर्वस्मृतिव्यक्त्यन्यता वा, स्मृतित्वरहितत्वं वा अभिप्रेतम् ? समर्थन—प्रत्यभिज्ञा स्मृति तथा अनुभव से विलक्षण प्रकार है। अतः वह प्रमा- लक्षण में अनुभूति पद का व्यवच्छेद्य हो सकती । खण्डन---प्रत्यभिज्ञा को अनुभव न मानें, तो वह अप्रमा हो जायगी । शंका—प्रत्यभिज्ञा, अप्रमा ही रहे, तो हानि क्या है ? खण्डन—यदि प्रत्यभिज्ञा को प्रमाण न मानें, तो अक्षणिकवादी नैयायिकों ने स्थिर-सिद्धि में 'तदेवेदम्' इस प्रत्यभिज्ञा को जो प्रमाण रूप से उपस्थित किया है, वह व्याहत हो जायगा । किञ्चित् प्रत्यभिज्ञा प्रमा-लक्षण का प्रसिद्ध लक्ष्य है, अतः आप द्वारा कल्पित 'तत्त्वानुभूतिः प्रमा' इस लक्षण की अव्याप्ति के भय से यह कहना कि 'प्रत्यभिज्ञा प्रमा का लक्ष्य नहीं है', अनुचित है; क्योंकि ऐसा करने से व्यवस्था ही न हो सकेगी । जब युक्ति से स्मृतिमात्र अनुभव सिद्ध हो चुका है, तब यह कहना कि 'तत्त्वानुभूतिः प्रमा' इस लक्षण में स्मृति के व्यवच्छेदार्थ जातिवाची अनुभूति पद का निवेश है, सर्वथा अनुपपन्न है । स्मृति-भिन्नत्वका खण्डन स्मृति से अन्य ज्ञान अथवा स्मृति के लक्षण (संस्कारजत्व) से रहित ज्ञान भी अनुभव-पद का अर्थ नहीं है, क्योंकि उक्त प्रकार से स्मृति और अनुभव का साङ्कर्य होने के कारण ज्ञानमात्र अनुभव रूप होने से वह अनुभव पद की व्यवच्छेद्य नहीं हो सकती । साथ ही, वक्ष्यमाण दोष अर्थात् स्मृत्यन्यत्व का निर्वचन न कर सकने के कारण भी स्मृत्यन्यत्व अनुभव पद का अर्थ नहीं हो सकता । देखिये—'स्मृति से अन्य' इस वाक्य