खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमे तु स्मृत्यन्तरव्यतिरेकात् स्मृत्यन्तरमप्यनुभूतिः स्यात् । न हि यतो व्यतिरिक्ता स्मरणव्यक्त्यन्तरादेका स्मृतिव्यक्तिस्तत् स्मरणमेव न भवति, येन तदन्यत्वं न स्मृत्यन्यत्वं स्यात् । नापि द्वितीयः ; मदीयादिस्मृतिव्यक्तिभ्यो हि भवता कथङ्कारं व्यतिरिक्तत्व- -मवधारणीयं प्रमायाः, तासां सर्वासां भवता प्रत्येतुमशक्यत्वात् । तथा हि— न तावत्परकीयज्ञाने परस्यास्मादृशोऽध्यक्षसम्भवः । नाप्यनुमानार्थापत्ती, लिङ्गानुपपद्यमानयोः सर्वत्रावाग्दृशा प्रत्येतुमशक्यत्वात् । नापि शब्दः ; सर्वत्र तस्यासम्भवात् । उपमानाद्यसम्भवोऽपि स्फुट एव । ततः कथं सर्वाभ्यः स्मृति- व्यक्तिभ्यो व्यतिरेको निरूप्यः प्रमाया इत्यनवबोधादसिद्धिर्लक्षणस्य । न च वाच्यं स्मृतित्वेन सर्वाः स्मृतिव्यक्तयः सर्वकालसर्वपुरुषसम्बन्धिन्यः स्वात्मीयां स्मृतिव्यक्तिं प्रत्यक्षतः प्रत्यक्षादेवावगम्यन्ते सामान्यलक्षणया इन्द्रिय- का अर्थ क्या एक-दो स्मृतियों से अन्य मानते हैं, सब स्मृतियों से अन्य अथवा स्मृतित्व-रहितत्व ? यदि एक दो स्मृतियों से अन्य अर्थ है, तो एक स्मृति से द्वितीय स्मृति के अन्य होने से द्वितीय स्मृति भी अनुभूति हो जायगी, क्योंकि जिस स्मृति से अन्य द्वितीय स्मृति है, वह स्मृति ही नहीं है-- यह बात नहीं है, जिससे उसे अन्यत्व स्मृत्य- अन्यत्व न हो । सभी स्मृतियों से अन्यत्व ही स्मृत्यन्यत्व है, यह द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं, क्योंकि मेरी स्मृति से अन्यत्व प्रमा में है, इसका निश्चय आप कैसे करेंगे ? हम लोगों के सदृश अर्थात् योगबल से रहित अन्य मनुष्यों को अन्य पुरुष के ज्ञान का प्रत्यक्ष तो हो नहीं सकता । फिर सर्वत्र हेतु या अनुपपद्यमानता का ज्ञान न होने के कारण अनुमान अथवा अर्थापत्ति से भी बाह्यदर्शी को सभी अन्य स्मृतियों का भेद प्रमा में गृहीत नहीं हो सकता । सर्वत्र शब्द के न होने से शाब्द भी संभव नहीं । उपमान आदि से भी अन्य स्मृतियों का अन्यत्व प्रमा में निश्चित नहीं हो सकता, क्योंकि उपमान से संज्ञा-संज्ञिभाव मात्र का निश्चय होता है और यहाँ संज्ञा-संज्ञिभाव है नहीं । ऐसी स्थिति में प्रमा में सम्पूर्ण स्मृतियों से भेद कैसे जाना जाय ? इस तरह ज्ञान के न होने से लक्षण ही असिद्ध है । समर्थन-- स्वीय स्मृति के मानस प्रत्यक्षकाल में सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति से सभी कालों एवं सभी पुरुषों से संबद्ध सर्वस्मृतियों का ज्ञान हो सकता है, जैसे कि व्याप्ति-