भारतकोश
संग्रह पर लौटें

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

प्रथमे तु स्मृत्यन्तरव्यतिरेकात् स्मृत्यन्तरमप्यनुभूतिः स्यात् । न हि यतो व्यतिरिक्ता स्मरणव्यक्त्यन्तरादेका स्मृतिव्यक्तिस्तत् स्मरणमेव न भवति, येन तदन्यत्वं न स्मृत्यन्यत्वं स्यात् । नापि द्वितीयः ; मदीयादिस्मृतिव्यक्तिभ्यो हि भवता कथङ्कारं व्यतिरिक्तत्व- -मवधारणीयं प्रमायाः, तासां सर्वासां भवता प्रत्येतुमशक्यत्वात् । तथा हि— न तावत्परकीयज्ञाने परस्यास्मादृशोऽध्यक्षसम्भवः । नाप्यनुमानार्थापत्ती, लिङ्गानुपपद्यमानयोः सर्वत्रावाग्दृशा प्रत्येतुमशक्यत्वात् । नापि शब्दः ; सर्वत्र तस्यासम्भवात् । उपमानाद्यसम्भवोऽपि स्फुट एव । ततः कथं सर्वाभ्यः स्मृति- व्यक्तिभ्यो व्यतिरेको निरूप्यः प्रमाया इत्यनवबोधादसिद्धिर्लक्षणस्य । न च वाच्यं स्मृतित्वेन सर्वाः स्मृतिव्यक्तयः सर्वकालसर्वपुरुषसम्बन्धिन्यः स्वात्मीयां स्मृतिव्यक्तिं प्रत्यक्षतः प्रत्यक्षादेवावगम्यन्ते सामान्यलक्षणया इन्द्रिय- का अर्थ क्या एक-दो स्मृतियों से अन्य मानते हैं, सब स्मृतियों से अन्य अथवा स्मृतित्व-रहितत्व ? यदि एक दो स्मृतियों से अन्य अर्थ है, तो एक स्मृति से द्वितीय स्मृति के अन्य होने से द्वितीय स्मृति भी अनुभूति हो जायगी, क्योंकि जिस स्मृति से अन्य द्वितीय स्मृति है, वह स्मृति ही नहीं है-- यह बात नहीं है, जिससे उसे अन्यत्व स्मृत्य- अन्यत्व न हो । सभी स्मृतियों से अन्यत्व ही स्मृत्यन्यत्व है, यह द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं, क्योंकि मेरी स्मृति से अन्यत्व प्रमा में है, इसका निश्चय आप कैसे करेंगे ? हम लोगों के सदृश अर्थात् योगबल से रहित अन्य मनुष्यों को अन्य पुरुष के ज्ञान का प्रत्यक्ष तो हो नहीं सकता । फिर सर्वत्र हेतु या अनुपपद्यमानता का ज्ञान न होने के कारण अनुमान अथवा अर्थापत्ति से भी बाह्यदर्शी को सभी अन्य स्मृतियों का भेद प्रमा में गृहीत नहीं हो सकता । सर्वत्र शब्द के न होने से शाब्द भी संभव नहीं । उपमान आदि से भी अन्य स्मृतियों का अन्यत्व प्रमा में निश्चित नहीं हो सकता, क्योंकि उपमान से संज्ञा-संज्ञिभाव मात्र का निश्चय होता है और यहाँ संज्ञा-संज्ञिभाव है नहीं । ऐसी स्थिति में प्रमा में सम्पूर्ण स्मृतियों से भेद कैसे जाना जाय ? इस तरह ज्ञान के न होने से लक्षण ही असिद्ध है । समर्थन-- स्वीय स्मृति के मानस प्रत्यक्षकाल में सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति से सभी कालों एवं सभी पुरुषों से संबद्ध सर्वस्मृतियों का ज्ञान हो सकता है, जैसे कि व्याप्ति-

परिच्छेद ] स्मृतिभिन्नत्वका खण्डन ११८ प्रत्यासत्त्या व्याप्तिग्रहणकाल इव व्याप्यव्यापकव्यक्तय इति दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयो- र्दोषग्रस्तत्वात् । तथा सति ह्येकं प्रमेयं प्रत्यक्षतः प्रमेयत्वसामान्यप्रत्यासत्त्या विश्वमेव प्रत्यक्षं स्यात् । एवमभ्युपगच्छतश्च श्रद्दधीमहि ते सार्वज्ञ्यमिदम्, यदि जानासि किमस्मच्चेतसि विपरिवर्तत इति । नापि तृतीयः; स्मृतित्वरहितत्वं हि स्मृतित्वाभाववत्त्वं वा स्यात्, स्मृतित्व- प्रतियोगिकमाश्रयस्य स्वरूपं वा, तज्ज्ञानं वा ? न तावदाद्यः । तथा हि—स्मृतित्वान्योन्याभावोऽपि स्मृतित्वाभावो भवत्येव। तद्वत्त्वञ्च स्मृतिष्वप्यस्ति । [ न हि स्मृतित्वमेव स्मृतिः । ] ततश्च स्मृतेरपि प्रमात्वा- पातः । तदव्यवच्छेदाद्विशेषणवैयर्थ्यञ्च, विना विशेष्यमिच्छादावतिप्रसङ्गात् । ग्रहकाल में सामान्यलक्षणा के बल से सकल व्याप्य-व्यापक व्यक्तियों का ज्ञान हो जाता है । खण्डन—दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिक दोनों स्थलों में सम्पूर्ण व्यक्तियों का ज्ञान सामान्य-लक्षणा से हो नहीं सकता, क्योंकि सामान्यलक्षणा में दोष होने से वह प्रत्यासत्ति ही नहीं है । अन्यथा यदि सामान्यलक्षणा को प्रत्यासत्ति मानें, तो एक प्रमेय के प्रत्यक्षकाल में प्रमेयत्व रूप से सकल प्रमेयों का प्रत्यक्ष होने लगेगा । समर्थन—प्रमेयत्व रूप से सकल प्रमेयों का प्रत्यक्ष होता हैं, ऐसा ही क्यों न मान लिया जाय ? खण्डन—ऐसा मानने पर तो सभी मनुष्य सर्वज्ञ हो जायेंगे । यदि आप कहें कि सब मनुष्य सर्वज्ञ हो ही जाते हैं, तो आपके इस वाक्य को हम तभी मान सकते हैं, जब आप यह जान लें कि इस समय हमारे चित्त में क्या है । यदि कहें कि स्मृतित्वरहितत्व ही स्मृति से अन्यत्व है, तो यह तीसरा पक्ष भी उचित नहीं; क्योंकि स्मृतित्व-रहितत्व क्या वस्तु है—क्या स्मृतित्व का अभाव है, स्मृतित्वप्रतियोगिक अधिकरणस्वरूप है ( स्मृतित्व है प्रतियोगी जिसका ऐसा जो अधिकरण, उसका स्वरूप है ) या स्मृतित्वप्रतियोगिक अधिकरण का ज्ञान है ? इनमें 'स्मृतित्व का अभाव स्मृतित्वरहितत्व है' यह प्रथम पक्ष उचित नहीं है; क्योंकि स्मृतित्व का अन्योन्याभाव भी स्मृतित्वाभाव ही है और वह स्मृति में भी है। फलतः स्मृति भी अनुभूति हो जायगी । अतः अनुभूति पद से स्मृति का व्यवच्छेद न होने से वह व्यर्थ ही हो जायगा। यदि अनुभूति पद का निवेश न करें, तो इच्छादि में अतिव्याप्ति हो जायगी।

११८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम

प्रथमे तु स्मृत्यन्तरव्यतिरेकात् स्मृत्यन्तरमप्यनुभूतिः स्यात् । न हि यतो व्यतिरिक्ता स्मरणव्यक्त्यन्तरादेका स्मृतिव्यक्तिस्तत् स्मरणमेव न भवति, येन तदन्यत्वं न स्मृत्यन्यत्वं स्यात् । नापि द्वितीयः ; मदीयादिस्मृतिव्यक्तिभ्यो हि भवता कथङ्कारं व्यतिरिक्तत्व- मवधारणीयं प्रमायाः, तासां सर्वासां भवता प्रत्येतुमशक्यत्वात् । तथा हि—न तावत्परकीयज्ञाने परस्यास्मदादृशोऽध्यक्षसम्भवः । नाप्यनुमानार्थापत्ती, लिङ्गानुपपद्यमानयोः सर्वत्रावार्ग्दृशा प्रत्येतुमशक्यत्वात् । नापि शब्दः; सर्वत्र तस्यासम्भवात् । उपमानाद्यसम्भवोऽपि स्फुट एव । ततः कथं सर्वाभ्यः स्मृति- व्यक्तिभ्यो व्यतिरेको निरूप्यः प्रमाया इत्यनवबोधादसिद्धिर्लक्षणस्य । न च वाच्यं स्मृतित्वेन सर्वाः स्मृतिव्यक्तयः सर्वकालसर्वपुरुषसम्बन्धिन्यः स्वात्मीयां स्मृतिव्यक्तिं प्रत्ययतः प्रत्यक्षादेवावगम्यन्ते सामान्यलक्षणया इन्द्रिय- का अर्थ क्या एक-दो स्मृतियों से अन्य मानते हैं, सब स्मृतियों से अन्य अथवा स्मृतित्व-रहितत्व ? यदि एक दो स्मृतियों से अन्य अर्थ है, तो एक स्मृति से द्वितीय स्मृति के अन्य होने से द्वितीय स्मृति भी अनुभूति हो जायगी, क्योंकि जिस स्मृति से अन्य द्वितीय स्मृति है, वह स्मृति ही नहीं है-- यह बात नहीं है, जिससे उसे अन्यत्व स्मृत्य -अन्यत्व न हो । सभी स्मृतियों से अन्यत्व ही स्मृत्यन्यत्व है, यह द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं, क्योंकि मेरी स्मृति से अन्यत्व प्रमा में है, इसका निश्चय आप कैसे करेंगे ? हम लोगों के सदृश अर्थात् योगबल से रहित अन्य मनुष्यों को अन्य पुरुष के ज्ञान का प्रत्यक्ष तो हो नहीं सकता । फिर सर्वत्र हेतु या अनुपपद्यमानता का ज्ञान न होने के कारण अनुमान अथवा अर्थापत्ति से भी बाह्यदर्शी को सभी अन्य स्मृतियों का भेद प्रमा में गृहीत नहीं हो सकता । सर्वत्र शब्द के न होने से शाब्द भी संभव नहीं । उपमान आदि से भी अन्य स्मृतियों का अन्यत्व प्रमा में निश्चित नहीं हो सकता, क्योंकि उपमान से संज्ञा-संज्ञिभाव मात्र का निश्चय होता है और यहाँ संज्ञा-संज्ञिभाव है नहीं । ऐसी स्थिति में प्रमा में सम्पूर्ण स्मृतियों से भेद कैसे जाना जाय ? इस तरह ज्ञान के न होने से लक्षण ही असिद्ध है । सम्भवेन— स्वीय स्मृति के मानस प्रत्यक्षकाल में सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति से सभी कालों एवं सभी पुरुषों से संबद्ध सर्वस्मृतियों का ज्ञान हो सकता है, जैसे कि व्याप्ति-

परिच्छेद ] स्मृतिभिन्नत्वका खण्डन ११६ प्रत्यासत्त्या व्याप्तिग्रहणकाल इव व्याप्यव्यापकव्यक्तय इति दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयो- र्दोषग्रस्तत्वात् । तथा सति ह्येकं प्रमेयं प्रत्ययतः प्रमेयत्वसामान्यप्रत्यासत्त्या विश्वमेव प्रत्यक्षं स्यात् । एवमभ्युपगच्छतश्च श्रद्दधीमहि ते सार्वज्ञ्यमिदम्, यदि जानासि किमस्मच्चेतसि विपरिवर्तत इति । नापि तृतीयः; स्मृतित्वरहितत्वं हि स्मृतित्वाभाववत्त्वं वा स्यात्, स्मृतित्व- प्रतियोगिकंमाश्रयस्य स्वरूपं वा, तज्ज्ञानं वा ? न तावदाद्यः । तथा हि—स्मृतित्वान्योन्याभावोऽपि स्मृतित्वाभावो भवत्येव। तद्वत्त्वञ्च स्मृतिष्वप्यस्ति । [ न हि स्मृतित्वमेव स्मृतिः । ] ततश्च स्मृतेरपि प्रमात्वा- पातः । तद्व्यवच्छेदाद्विशेषणवैय्यर्थ्यञ्च, विना विशेष्यमिच्छादावतिप्रसङ्गात् । ग्रहकाल में सामान्यलक्षणा के बल से सकल व्याप्य-व्यापक व्यक्तियों का ज्ञान हो जाता है । खण्डन—दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिक दोनों स्थलों में सम्पूर्ण व्यक्तियों का ज्ञान सामान्य-लक्षणा से हो नहीं सकता, क्योंकि सामान्यलक्षणा में दोष होने से वह प्रत्यासत्ति ही नहीं है । अन्यथा यदि सामान्यलक्षणा को प्रत्यासत्ति मानें, तो एक प्रमेय के प्रत्यक्षकाल में प्रमेयत्व रूप से सकल प्रमेयों का प्रत्यक्ष होने लगेगा । समर्थन—प्रमेयत्व रूप से सकल प्रमेयों का प्रत्यक्ष होता है, ऐसा ही क्यों न मान लिया जाय ? खण्डन—ऐसा मानने पर तो सभी मनुष्य सर्वज्ञ हो जायेंगे । यदि आप कहें कि सब मनुष्य सर्वज्ञ हो ही जाते हैं, तो आपके इस वाक्य को हम तभी मान सकते हैं, जब आप यह जान लें कि इस समय हमारे चित्त में क्या है । यदि कहें कि स्मृतित्वरहितत्व ही स्मृति से अन्यत्व है, तो यह तीसरा पक्ष भी उचित नहीं; क्योंकि स्मृतित्व-रहितत्व क्या वस्तु है—क्या स्मृतित्व का अभाव है, स्मृतित्वप्रतियोगिक अधिकरणस्वरूप है ( स्मृतित्व है प्रतियोगी जिसका ऐसा जो अधिकरण, उसका स्वरूप है ) या स्मृतित्वप्रतियोगिक अधिकरण का ज्ञान है ? इनमें 'स्मृतित्व का अभाव स्मृतित्वरहितत्व है' यह प्रथम पक्ष उचित नहीं है; क्योंकि स्मृतित्व का अन्योन्याभाव भी स्मृतित्वाभाव ही है, और वह स्मृति में भी है । फलतः स्मृति भी अनुभूति हो जायगी । अतः अनुभूति पद से स्मृति का व्यवच्छेद न होने से वह व्यर्थ ही हो जायगा । यदि अनुभूति पद का निवेश न करें, तो इच्छादि में अतिव्याप्ति हो जायगी ।

१२० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य स्मृतित्वस्य संसर्गाभावस्तत्र विवक्षित इति चेन्न । तथा हि—स्मृतित्वस्य संसर्गाभाव इति किमुच्यते, किं स्मृतित्वविशिष्टस्य संसर्गस्याभावः, उत संसर्ग- विशिष्टस्य स्मृतित्वस्य, अथान्यदेव वा किञ्चिदनया वाचोयुक्त्या विवक्षितम् ? आद्ये स्मृतित्वसंसर्गान्योन्‍याभावः स्मृतावस्तीति स एव प्रसङ्गः । न हि स्मृतित्व- संसर्गः स्मृतिः । अतएव न द्वितीयोऽपि, न हि संसर्गविशिष्टं यत्स्मृतित्वं तदेव स्मृतिव्यक्तिः । ततश्च संसर्गविशिष्टस्मृतित्वेन सह स्मृतिव्यक्तेरन्योन्‍याभाव- मादाय उक्तदोषानिवृत्तिः । एवं तत्र तत्रापि संसर्गविशेषणप्रक्षेपे दोषानिवृत्तिरेव, अनवस्थायां वा पर्यवसानं विशेषणप्रक्षेपपरम्परायाः । न च वाच्यं स्मृतित्वसंसर्गस्य न संसर्गान्तरेण सम्बन्धित्वं किन्तु स्वभावत एव, तत् कुतः परम्परागवेषणं कार्यमिति । स्मृतित्वसंसर्गस्यान्योन्‍याभावमादाय समर्थन—यहाँ स्मृतित्वाभाव से स्मृतित्व के संसर्गाभाव का ग्रहण है । खंडन— यह तुम नहीं कह सकते; क्योंकि स्मृतित्व का संसर्गाभाव क्या स्मृतित्व- विशिष्टसंसर्गाभाव है, संसर्गविशिष्ट स्मृतित्वाभाव है या इस वाक्य-रचना से और ही कुछ ? यदि स्मृतित्व का संसर्गाभाव अभिप्रेत हो, तो स्मृतित्व-संसर्ग का अन्योन्याभाव भी स्मृति में है ही । अतः स्मृति में प्रमालक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि स्मृतित्वसंसर्ग स्मृति नहीं है । इसीलिए द्वितीयपक्ष भी युक्त नहीं है; क्योंकि संसर्गविशिष्ट स्मृतित्वव्यक्ति भी स्मृति नहीं है । अतः संसर्गविशिष्ट स्मृतित्व के साथ स्मृति-व्यक्ति के अन्योन्याभाव का ग्रहणकर स्मृति-व्यक्ति में पुनः अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—स्मृतित्व-संसर्ग का संसर्गाभाव ही स्मृतित्वरहितत्व है । स्मृतित्व-संसर्ग का संसर्गाभाव स्मृतिव्यक्ति में नहीं है, क्योंकि स्मृति में स्मृतित्व-संसर्ग ही है । अतः स्मृति में अनुभूतिलक्षण की अतिव्याप्ति नहीं है । खंडन—स्मृतित्व-संसर्ग का संसर्गाभाव इस शब्द से भी यदि संसर्ग का अभाव ही अभिप्रेत है, तो फिर भी स्मृतित्व-संसर्ग के अन्योन्याभाव का ग्रहणकर स्मृति में अतिव्याप्ति ही है । इस तरह अपर-अपर संसर्ग का निवेश करें, तो अनवस्था या अन्तिम संसर्ग का अन्योन्याभाव लेकर अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—स्मृतित्व का संसर्ग ( समवाय ) अन्य संसर्ग से नहीं, किन्तु स्वभाव- स्वरूप सम्बन्ध से ही संबद्ध है । अतः संसर्ग-परम्परा का गवेषण न होने से अनवस्था

परिच्छेद ] स्मृतिभिन्नत्व का खण्डन १२१ कृतस्य प्रसङ्गस्य परिहर्तुं तदानीं सुतरामशक्यत्वात् संसर्गान्तरविशेषकवचनस्य अधिकार्थापर्यवसायित्वात् । किञ्च—तदुभयस्वरूपातिरेकं तत्संसर्गस्यानन्यमानेन स्मृतित्वसंसर्गः स्मृतित्व- धर्मिस्वरूपं चेत्येतयोः संसर्गात्मकत्वे व्यवस्थाप्यमानेऽनुभूतौ कथं तादृशस्य संसर्गस्य निषेधः । किमनुभूतेः स्वरूपं नास्ति, उत स्मृतित्वसंसर्गस्य, ततः कस्य निषेधः ? अर्थान्तरभूतस्य च संसर्गस्य निषेधे स्मृतावपि प्रसङ्गस्तदवस्थः, स्मृतौ तस्यार्थान्तरभूतस्य भवताऽनभ्युपगमात्, स्वरूपमेव तयोः सम्बन्ध इति तत्र भवतोऽभ्युपगमः । अथोच्यते—अनुभूतिस्मृतित्वसंसर्गयोः स्वरूपसम्भवेऽपि न परस्परसम्बद्ध- बुद्धिजनकत्वं तयोः, तादृक्त्वञ्च यत्र तयोस्तत्र सम्बन्धात्मकत्वं स्वरूपयोरुच्यत नहीं है । खंडन--यदि स्मृतित्व-संसर्ग का स्वभाव ( स्वरूप ) ही सम्बन्ध है, तो स्मृतित्व- संसर्ग के संसर्गाभाव शब्द का अर्थ संसर्ग का स्वरूपाभाव ही हुआ । अर्थात् संसर्गाभाव से अधिक नहीं हुआ । अतः संसर्ग का अन्योन्याभाव लेकर जो अतिव्याप्ति दी गयी, वह वैसी ही बनी हुई है । किंच—स्मृतित्व-संसर्ग (समवाय) तथा स्मृति के संसर्ग को उभयस्वरूप से अतिरिक्त न माननेवाले आप स्मृतित्व-संसर्ग तथा स्मृति दोनों को ही संसर्गात्मक मानेंगे, तो फिर अनुभूति में उस संसर्ग का निषेध कैसे होगा ? क्या अनुभूति का स्वरूप नहीं है या स्मृतित्व-संसर्ग का स्वरूप नहीं है ? जब दोनों के स्वरूप हैं, तो किसका निषेध होगा ? समर्थन—स्मृतित्व-संसर्ग के स्वरूपसम्बन्ध का निषेध अनुभूति में नहीं है; किन्तु स्वरूप से अन्य सम्बन्ध का निषेध अनुभूति में है । खंडन—यदि स्वरूप से अन्य सम्बन्ध का निषेध है, तो स्मृतित्व-संसर्ग के स्वरूप से अन्य संसर्ग स्मृति में नहीं है, क्योंकि आप स्मृतित्व-संसर्ग के स्वरूप-रूप सम्बन्ध को ही स्मृति में मानते हैं, स्वरूप से अन्य सम्बन्ध को नहीं मानते । अतः स्वरूप से अन्य सम्बन्ध का अभाव स्मृति में भी हो सकता है। फलतः अनुभूति-लक्षण की स्मृति में अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन — शुद्ध स्वरूपमात्र सम्बन्ध नहीं है, किन्तु परस्परसंसृष्टत्व-बुद्धिजनकत्वरूप- स्वरूप ही संसर्ग है। वह स्मृतित्व-संसर्ग तथा स्मृति दोनों के स्वरूपों में है, अतः इन दोनों का स्वरूप संसर्ग है। अनुभूति तथा स्मृतित्व-संसर्ग इन दोनों के स्वरूपों में वह नहीं है ।

१२२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य इति मैवम्; विशेषोपसङ्ग्राहकासिद्धौ तस्याप्यनुपपत्तेः । उपसङ्ग्राहकान्तरोक्तौ तत्सम्बन्धेऽपि प्रसङ्गेन अपरापरोपसङ्ग्राहकगवेषणायामनवस्थापातात् । तावताऽपि चानुभूतिस्वरूपे कस्य निषेधो वर्णितः स्यात् ? स्मृतित्वसंसर्गानुभूती सम्बद्धे इत्येवंरूपबुद्धिजनकत्वस्येति चेन्न । भ्रान्त्या- त्मिकाया ईदृशबुद्धेर्जनकत्वस्य वारयितुमशक्यत्वात् । यथार्थाया इति चेत्, ईदृशबुद्धेर्यथार्थ्याया यदि सत्त्वमभ्युपैषि, तदाऽनुभूतौ स्मृतित्वप्रसङ्गः । अथ नाभ्युपैषि, किं प्रति तस्या जनकत्वाभावो निरूप्यः । अथात्यन्तासतीमेव तादृशबुद्धिं प्रति जनकत्वाभावावधारणमनुभूतेरभ्युपैषि, खण्डन — स्मृतियों में स्मृतित्व-संसर्ग तथा स्मृति दोनों की परस्परसंसर्गबुद्धिजनकता तबतक नहीं रह सकती, जबतक कि जनकता का कोई अवच्छेदक न माना जाय । यदि कहें कि स्मृतित्व ही जनकतावच्छेदक है, तो अद्यावधि वह सिद्ध ही नहीं हुआ है । किंच — स्मृतित्व या अन्य किसी धर्म को जनकतावच्छेदक मान लें, तो भी 'स्मृतित्व का सम्बन्ध स्मृति में ही है, अन्यत्र नहीं' इसमें भी कोई नियामक अवश्य मानना होगा । इस तरह नियामक में भी नियामकान्तर मानने पर अनवस्था दोष हो जायगा । किंच—'परस्परसम्बन्ध-बुद्धि-जनकत्व-स्वरूप ही संसर्ग है' यह कहने पर भी अनुभूति में किस वस्तु का निषेध होगा ? अनुभूति तथा स्मृतित्व-संसर्ग के स्वरूप का निषेध तो हो नहीं सकता, क्योंकि वह सत् है । स्वरूपरूप संसर्ग का निषेध भी नहीं हो सकता; क्योंकि अनुभूति तथा स्मृतित्व-संसर्ग के स्वरूप में परस्परसम्बन्ध-बुद्धिजनकत्व न होने से वह संसर्ग ही नहीं है। समर्थन — अनुभूति में ही 'स्मृतित्व-संसर्ग तथा अनुभूति दोनों परस्पर संबद्ध हैं' इत्याकारक बुद्धि की जनकता का निषेध होगा। खण्डन — भ्रमारूप निरुक्त बुद्धि की जनकता का निषेध नहीं हो सकता, क्योंकि अनुभूति में उसकी सत्ता है ही । प्रथम तो विषय न होने से निरुक्त बुद्धि प्रमारूप ही नहीं होगी । फिर, उक्त बुद्धि के असत् होने से उसकी जनकता भी असत् ही होगी । तब शशशृंग के तुल्य उक्त असत् जनकत्व का निषेध हो - ही नहीं सकता । कथंचित् मान भी लें कि उक्त बुद्धि प्रमारूप होती है, तो उक्त प्रमा के करण ( प्रमाण ) से ही अनुभूति में स्मृतित्व का प्रसङ्ग हो जायगा । समर्थन — अत्यन्त असत् उक्त यथार्थबुद्धि की जनकता का निषेध ही अनुभूति में क्यों न माना जाय, क्योंकि 'शशशृङ्गं नास्ति' या अलीकप्रतियोगिक अभाव के तुल्य

परिच्छेद ] · स्मृतिभिन्नत्व का खण्डन १२३ तदा स्मृतावपि प्रसङ्गः ; यावत्यस्तद्बुद्धयस्तत्र जायन्ते, तदधिकां तादृशबुद्धि- मत्यन्तासतीं प्रत्यजनकत्वस्य स्मृतावपि सम्भवात् । सर्वामेव तादृशबुद्धिं प्रत्यजनकत्वमनुभूतेः, न तु एवं स्मृतेरिति चेन्न । सर्वतद्व्यक्तिप्रमित्यसम्भवात् । किञ्च सर्वामिति कोऽर्थः—किमसतीं सर्वाम्, उत सतीम्, अथ सतीमसती- ञ्चेत्युभयीमपि प्रत्यजनकत्वम् ? आद्ये द्वितीये च स्मृतावपि तदजनकत्वमस्त्येव । न हि 'स्मृतित्वसंसर्गस्मृती सम्बद्धे' इति यावत्यः स्मृतिव्यक्तिषु बुद्धय उत्पद्यन्ते, ताः प्रति प्रत्येकं स्मृतिव्यक्तिषु जनकत्वमस्ति । काञ्चित् सतीं प्रति च तदजनकत्वं प्रागेव दूषितम् । तृतीये नानुभूतावपि तदजनकत्वम्, सत्यासत्यतादृशबुद्धेर्भवेन अभावेन वा सतीमसतीं प्रत्यजनकत्वस्यासम्भवादिति । संभावनामात्र से अलीककार्यनिरूपित जनकता का भी निषेध हो ही सकता है । खण्डन— तब तो स्मृति में भी अनुभूति-लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी; क्योंकि स्मृति में जितनी स्मृतित्वसंसर्गबुद्धियाँ होती हैं, उन बुद्धियों से अधिक उक्त असत्-बुद्धि की जनकता का निषेध उसमें भी संभावनामात्र से हो सकता है । समर्थन—संपूर्ण स्मृतित्व-संसर्गबुद्धियों की जनकता का अभाव लक्षण में अभिप्रेत है । स्मृति में वह नहीं है और अनुभूति में है, अतः कोई दोष नहीं है । खंडन—सामान्य- लक्षणा के खण्डित होने से संपूर्ण स्मृतित्व-संसर्गबुद्धियों का ज्ञान हो ही नहीं सकता । किंच—'सम्पूर्ण' शब्द का क्या अर्थ है ? क्या असती ( अयथार्थ ) संपूर्ण, सती ( यथार्थ ) संपूर्ण या असती और सती उभयरूप संपूर्ण अभिप्रेत है ? तीनों ही पक्षों में स्मृति में उक्त बुद्धि की जनकता का अभाव होने से अनुभूति-लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी; क्योंकि जितनी स्मृतित्व-संसर्गबुद्धियाँ हैं, उन सबकी जनकता का अभाव एक-एक स्मृति में विद्यमान ही है । समर्थन—हमें सब स्मृतित्व-संसर्गबुद्धियों की जनकता का निषेध प्रत्येक में अभिप्रेत नहीं, किन्तु प्रत्येक स्मृतित्वसंसर्गबुद्धि की जनकता का निषेध प्रत्येक में अभिप्रेत है और वह स्मृति में नहीं है । खण्डन--प्रथम पक्ष में असत् ( अयथार्थ ) उक्त बुद्धि की जनकता का अनुभूति में वारण न होने से अनुभूति में अव्याप्ति हो जायगी । द्वितीय पक्ष में सती प्रमा के करणरूप ( प्रमाण ) होने से अनुभूति में स्मृतित्व-प्रसंग हो जायगा । तृतीय पक्ष में प्रत्येक निवेश करने पर भी उक्त दोनों दोष बने ही रहेंगे । कारण उक्त अयथार्थ बुद्धि का जनकता अनुभूति में है; अतः उसका निषेध उसमें हो नहीं सकता । और, यथार्थ उक्त बुद्धि के होने से तज्जनकत्व के होने से, तदभाव अलीक होने के कारण असम्भव हो जायगा ।

१२४. सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम स्यादेतत्—स्मृतित्वस्य अन्योन्याभावमादाय याऽतिप्रसक्तिर्दर्शिता सा नोपपद्यते, भेदाभेदवादिमते स्मृतित्वभेदाभेदस्य स्मृत्या सहाभ्युपगमात्। ययोर्भेदा- भेदः, तयोस्तत्रान्योन्याभावानभ्युपगमात् । मैवम् ; कथं ह्यवधार्यं स्मृतित्वस्य भेदाभेदः स्मृत्या, नानुभूत्येति ? अनुभूत्या सह तद्विशिष्टप्रमाया अभावादिति चेन्न । किं सत्याः किमसत्या इत्याद्युक्तविकल्पदोषात् । प्रागभावप्रतियोगिन्या इति चेन्न । अनुभूतौ तादृश्याः स्वीकारेण अनुभूते- स्तथात्वापातात् । समर्थन—स्मृतित्व का अन्योन्याभाव ग्रहणकर स्मृति में अनुभूति-लक्षण की जो अतिव्याप्ति दी गयी है, वह उपपन्न नहीं हो सकती; क्योंकि धर्म का धर्मी के साथ भेदाभेद होता है । स्मृतित्व का स्मृति में भेदाभेद है। जिसमें जिसका भेदाभेद हो, उसका उसमें अन्योन्याभाव नहीं रहता । खंडन—स्मृतित्व का स्मृति के साथ ही भेदाभेद है, अनुभूति से नहीं, यह बात आपने कैसे जान ली ? समर्थन—'स्मृतित्वविशिष्टा अनुभूतिः' इत्याकारक प्रमा नहीं होती, अतः जाना जाता है कि स्मृतित्व का भेदाभेद अनुभूति में नहीं है। खंडन—क्या आप विद्यमान स्मृतित्ववैशिष्ट्य-प्रमा के अभाव से अनुभूति में स्मृतित्व का अभाव सिद्ध करते हैं या अविद्यमान ? यदि कहें कि विद्यमान प्रमा के अभाव से, तो विद्यमान प्रमा के कारणरूप प्रमाण से ही अनुभूति में स्मृतित्व सिद्ध हो जायगा। यदि कहें कि उक्तकारक प्रमा अविद्यमान है, तो प्रतियोगी के असत् होने से उसका अभाव भी असत् होगा, अतः बाधक का अभाव होने से ही अनुभूति में स्मृतित्व सिद्ध हो जायगा । समर्थन—अनुभूति में स्मृतित्ववैशिष्ट्य-प्रमा प्रागभाव की प्रतियोगिनी नहीं होती और स्मृति में होती है । अतः उक्त अभाव से अनुभूति में स्मृतित्वाभाव का निश्चय हो जायगा । खंडन—यदि उक्त वाक्य का यह अर्थ हो कि 'प्रागभावप्रतियोगी जो स्मृतित्व-प्रमा उसका अभाव', तो उक्त प्रमा में प्रागभाव की प्रतियोगिता सिद्ध हुई । फिर 'जो प्रागभाव का प्रतियोगी होता है, वह कदाचित् अवश्य उत्पन्न होता है' इस नियम के अनुसार उक्त प्रमा में सत्त्व होगा, जिससे उसके कारणरूप प्रमाण से ही अनुभूति में स्मृतित्व सिद्ध हो जायगा । यदि उक्त वाक्य का यह अर्थ करें कि 'अनुभूति में स्मृतित्व-प्रमा प्रागभाव की प्रतियोगी नहीं है', तो उक्त प्रमा में प्रागभाव-

परिच्छेद ] भेद-संसर्गाभाव का भेद-खण्डन १२५ स्मृति-स्मृतित्वयोरन्योन्याभावाभावश्च अन्योन्यात्माऽनुभूतावपि तुल्यः । न हि स्मृतित्वान्योन्याभावोऽनुभूतिरित्युक्तमावर्तते । भेद-संसर्गाभावयोर्भेदखण्डनम् अथ मा भूद्भेदाभेदमादाय परिहारः ; तथापि 'इदं तन्न भवति, इह तन्नास्ती'ति प्रतीतिसाक्षिक एवान्योन्याभावसंसर्गाभावयोर्भेद इति चेन्न । प्रतियोगिरूपोपाध्य- प्रतियोगित्व का ही निषेध हुआ, उक्त प्रमा का निषेध तो हुआ नहीं— अनादि उक्त प्रमा ही सिद्ध हुई । अतः उक्त प्रमा के करणरूप प्रमाण से ही अनुभूति में स्मृतित्व सिद्ध हो जायगा । किंच—जैसे स्मृति में स्मृतित्व के अन्योन्याभाव का अभाव ( अन्योन्याभाव ) है और वह अन्योन्यरूप है, वैसे ही अनुभूति में भी स्मृतित्व के अन्योन्याभाव का अभाव ( अन्योन्याभाव ) है और वह अन्योन्यरूप है । अर्थात् अनुभूति और स्मृतित्व उभयरूप है । फिर स्मृतित्व का भेदाभेद स्मृति के तुल्य अनुभूति में क्यों न माना जाय ? समर्थन—स्मृतित्व के अन्योन्याभाव का अत्यन्ताभाव स्मृति में ही है, अनुभूति में नहीं, क्योंकि धर्म का धर्मी में अभेद होने से अन्योन्याभाव नहीं है । फिर, अन्योन्याभाव का अत्यन्ताभाव भेदाभेद का प्रयोजक है, अतः स्मृतित्व का भेदाभेद अनुभूति में नहीं है । खंडन—जैसे स्मृतित्वात्यन्ताभाव को अन्योन्याभाव मानकर प्रथम स्मृति में अति- व्याप्ति हम दे आये हैं, वैसे ही अब भी स्मृति के अन्योन्याभाव के अत्यन्ताभाव को अन्योन्याभाव मानकर अनुभूति में स्मृतित्व का आपादन ( ग्रहण ) कर सकते हैं; क्योंकि अबतक अत्यन्ताभाव और अन्योन्याभाव में परस्पर भेद सिद्ध ही नहीं हुआ है। भेद-संसर्गाभाव का भेद-खण्डन समर्थन—यद्यपि उक्त युक्तियों से स्मृतित्व का भेदाभेद अनुभूति में भी हो सकता है । अतः आप यह तो कह नहीं सकते कि 'जिसका जिसमें भेदाभेद है, उसका उसमें अन्योन्याभाव नहीं रहता।' कारण यदि यह कहें, तो अनुभूति में भी स्मृतित्व का भेदाभेद होने से अन्योन्याभाव का प्रतिपादन नहीं कर सकेंगे । फिर भी 'स्मृतित्व का अन्योन्याभाव भी स्मृतित्वाभाव है और वह स्मृति में है, अतः प्रमा-लक्षण की स्मृति में अतिव्याप्ति है' यह नहीं कह सकते; क्योंकि उस ( प्रमा-लक्षण ) में

१२६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम वैचित्र्यात्, अभावे जात्यादिभेदानभ्युपगमाच्च तयोर्भेदबुद्धिरेव प्रामाण्यमनश्नुवाना कूटसाक्षिणीति तदनादरणात् । न च स्वप्रतियोगिसमानकालसमानाधिकरणोऽभावोऽन्योन्याभाव , तदन्योन्या- भाववाँश्च तदभावः संसर्गाभावः । यथासम्भवमात्माश्रवाद्यननुभवस्वभेदाननुगम- तत्तदवगमानभ्युपगमानाममुत्तरणीयत्वप्रसङ्गात् । संसर्गाभाव का निवेश है। अर्थात् संसर्गाभाव शब्द 'संसर्गस्य अभावः' इस अर्थ में यौगिक नहीं, किन्तु 'इदमिह नास्ति' इत्याकारक प्रतीति के विषय अभाव- विशेष में रूढ़ है। इसी तरह अन्योन्याभाव शब्द भी 'अन्योन्यस्य अभावः' इस अर्थ में यौगिक नहीं, किन्तु 'इदमिदं न भवति' इस प्रतीति से सिद्ध अभाव- विशेष में रूढ़ है। लक्षण में संसर्गाभाव का ही निवेश है, अतः स्मृतित्व के अन्योन्याभाव का ग्रहणकर स्मृति में दोष नहीं है। खंडन—प्रतियोगिभेद अथवा जाति-उपाधिरूप धर्मभेद से दोनों अभावों का भेद हो सकता है, किन्तु वह यहाँ नहीं है। अतः विषय-भेद न होने के के कारण उक्त बुद्धि मिथ्या होने से आदरणीय नहीं। इसलिए उक्त बुद्धि से घटित लक्षण भी असंगत ही है। समर्थन—'स्वप्रतियोगी से समान काल तथा समान अधिकरणवाला अभाव अन्योन्याभाव है और अन्योन्याभाव से भिन्न अभाव अत्यन्ताभाव है' इस तरह दोनों अभावों के स्वरूपों में भेद मान लेने पर भेद-बुद्धि अप्रमा नहीं होगी। खंडन—उक्त लक्षण के घटक अभाव पद का यदि 'भावभिन्नत्व' अर्थ करें, तो अन्योन्याभाव के लक्षण में अन्योन्याभाव का प्रवेश होने से आत्माश्रय हो जायगा। यदि अभाव पद का 'भावत्वात्यन्ताभाववत्त्व' अर्थ करें, तो अन्योन्याश्रय हो जायगा, क्योंकि अन्योन्याभाव से भिन्न अभाव को संसर्गाभाव कहते हैं और संसर्गाभाव-विशेष ही अत्यन्ताभाव है। अतः अत्यन्ताभाव से अन्योन्याभाव का और अन्योन्याभाव से अत्यन्ताभाव का निरूपण करना पड़ता है। साथ ही अन्योन्याभाव का निरूपण अत्यन्ताभाव से, अत्यन्ता- भाव का निरूपण संसर्गाभाव से और संसर्गाभाव का निरूपण अत्यन्ताभाव से होता है, अतः चक्रक दोष भी हो जायगा। किञ्च—इन दोषों से लक्षण नहीं बनेगा और लक्षण न बनने से तदधीन लक्ष्यभूत अन्योन्याभाव तथा अत्यन्ताभाव का ज्ञान भी नहीं होगा। किञ्च—आप अन्योन्याभाव का अन्योन्याभाव मानते हैं या

परिच्छेद ] भेद-संसर्गाभाव का भेद-खण्डन १२७ ननु संसर्गप्रतियोगिको निषेधः संसर्गाभावः, तादात्म्यप्रतियोगिकश्च तादात्म्या- भाव इत्युक्त एव न मिश्रता तयोः । यो हि संसर्गतादात्म्यस्य निषेधः, स संसर्ग- निषेध एव न भवति तादात्म्यप्रतियोगिकत्वादिति । मैवम्; द्रव्यगुणकर्मणां समवायिकारणेषु हि तेषां प्रध्वंसा नैवं संसर्गाभावाः स्युः । संसर्गप्रतियोगित्वे तु संसर्गस्य समवायरूपतया समवायानित्यत्वप्रसङ्गात् । किञ्च—तर्हि संसर्गान्योन्याभावौ द्वावपि न घटादिप्रतियोगिकाविति घटादेः कालादिवन्निरवधित्वापातः । संसर्गतादात्म्ययोश्च अविशेषितयोर्निषेधे सामान्यत एव तयोरुच्छेदः स्यात् । नहीं ? यदि नहीं, तो अन्योन्याभावका भेद कहीं भी न होने से वह सर्वात्मक हो जायगा । यदि मानते हैं, तो उस अन्योन्याभाव का भी अन्य अन्योन्याभाव एवं उत्तरोत्तर अन्योन्याभावों की धारा मानने पर भेद के अननुगम तथा अननुभव का अनुसरण करना पड़ेगा । समर्थन—'जिस अभाव का प्रतियोगी संसर्ग हो, वह अभाव संसर्गाभाव है तथा जिसका प्रतियोगी तादात्म्य हो, वह अभाव अन्योन्याभाव है', ऐसा लक्षण करने पर दोनों अभावों का ऐक्य नहीं होगा; क्योंकि संसर्ग के तादात्म्य का अभाव तादात्म्य- प्रतियोगिक होने से संसर्गाभाव ही नहीं है । अतः स्मृतित्व-संसर्गाभाव शब्द से अन्योन्याभाव का ग्रहण न होने से स्मृति में प्रमालक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—ऐसा लक्षण करने पर द्रव्य-गुण-कर्म के प्रध्वंसाभाव में संसर्गाभाव- लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । क्योंकि प्रध्वंसाभाव का प्रतियोगी ससर्ग नहीं होता । यदि संसर्ग को ध्वंस का प्रतियोगी मान लें, तो द्रव्यादि के समवायिकारण में संसर्ग समवायरूप है । उसका ध्वंस मानने पर वह अनित्य हो जायगा । किन्तु नैयायिक तो समवाय को अनित्य नहीं मानते । किञ्च—यदि संसर्ग तथा तादात्म्य को संसर्गाभाव तथा अन्योन्याभाव का प्रतियोगी मानें, तो वे दोनों अभाव घटादि-प्रतियोगिक नहीं होंगे अतः घटादि का किसी भी काल या देश में निषेध न होने से काल के तुल्य घटादि भी निरवधि अर्थात् नित्य और व्यापक हो जायेंगे । किञ्च—अविशेषित संसर्ग तथा तादात्म्य का निषेध करने पर अर्थात् प्रतियोगिताकोटि में घटादि का निवेश न करने पर सामान्यरूप से ही संसर्ग तथा तादात्म्य का उच्छेद हो जायगा ।

५२८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम एवं यद्यदेव प्रतियोगि वाच्यं तत्तत्स्वरूपत एव न स्यात् । तस्यापि संसर्गे प्रति धावने च तदक्षतम्, संसर्गानवस्था, शेषोच्छेदात् पूर्वपूर्वोच्छेदो वा स्यात् । न प्रतियोग्यनुयोगिनोस्तथात्वं विरोधः, किन्तु सहभावाभावः, अतस्तन्मात्रं न स्यात्, न तु तन्मात्रमेव न स्यादिति चेन्न । अनुयोगिनि प्रतियोग्यापत्तेः । तथा प्रमाभावात् कथं तदास्तामिति चेन्न । तथाप्रमाभावमूलकस्य विरोधस्य सहानवस्थानस्य नियमभङ्गात्, प्रतियोग्यनुयोगिभावादन्यः कस्तयोर्विरोधः स्यात् । इसी तरह जो-जो वस्तुएँ अविशेषित (केवल) ही निषेध की प्रतियोगी होंगी, वे स्वरूप से ही उच्छिन्न हो जायँगी अर्थात् अलीक हो जायँगी । समर्थन—संसर्ग या तादात्म्य के भी संसर्ग का ही निषेध होता है, अतः स्वरूपतः उन दोनों का उच्छेद नहीं होगा । खंडन—यदि संसर्ग के भी संसर्ग का ही निषेध करें, तो अनवस्था हो जायगी । यदि स्वरूप का निषेध करें, तो संसर्ग के संसर्ग का स्वरूप से ही उच्छेद हो जायगा । साथ ही उत्तर संसर्ग का उच्छेद होने से पूर्व-पूर्व का भी उच्छेद होने के कारण फिर भी संसर्ग तथा तादात्म्यमात्र का उच्छेद हो जायगा; क्योंकि संसर्ग का उच्छेद होने पर संसर्गी की स्थिति हो ही नहीं सकती । समर्थन—अविशेषित संसर्ग तथा तादात्म्य का अभाव होने पर स्वरूप से उन दोनों का उच्छेद तब होता, जब प्रतियोगी के साथ अभाव का परस्पर निषेध्य-निषेधभावरूप (प्रतियोगी का निषेध अभावरूप और अभाव का निषेध प्रतियोगीरूप) विरोध होता । किन्तु यहाँ तो सह-अवस्थान का अभाव ही विरोध है । अतः प्रतियोगी और अभाव दोनों का सह-अवस्थानमात्र न होगा, प्रतियोगी के स्वरूपतः उच्छेद का तो कोई प्रश्न ही नहीं । खंडन—यदि सह-अवस्थान का अभाव ही विरोध हो, तो जैसे प्रतियोगी में अभाव का वैशिष्ट्य होता है, वैसे अभाव में अभाव का वैशिष्ट्य नहीं है, क्योंकि स्व में स्व नहीं रहता । एवञ्च अभाव में प्रतियोगी का वैशिष्ट्य भी होने लगेगा, कारण अब तो दोनों का स्वरूपतः विरोध है ही नहीं । समर्थन—अभाव में प्रतियोगी के वैशिष्ट्य की प्रमा नहीं होती, अतः उसमें प्रतियोगी के वैशिष्ट्य का आपादन हो ही नहीं सकता । खंडन—तब तो प्रतियोगी तथा अभाव दोनों के सह-अवस्थान की प्रमा तथा आधाराधेयभाव की प्रमा भी नहीं होती । उनमें सह-अवस्थान की प्रमा का विरह तो सह-अवस्थानरूप विरोध से उपपादित हो सकता है । किन्तु आधाराधेयभाव की प्रमा के विरह के उपपादनार्थ एक अन्य नियम का भी स्वीकार करना पड़ेगा । अतः 'सह-अवस्थान ही विरोध है' यह नियम भग्न हो जायगा । वह नियम प्रतियोगी-अनुयोगिभाव (परस्पर निषेध्य-निषेधकभाव) से अन्य नहीं हो सकता ।

तथा न प्रमीयमाणत्वमेव स इति चेन्न । अतिप्रसङ्गात् । नियमेनेति चेन्न । व्यक्तयोरविरोधापत्तेः । तथा न प्रमातुमनौपाधिकी योग्यतेति चेत् ? सैव मेयगता योग्यता अनुयोगि- प्रतियोगित्वादन्या का समर्थिता स्यात् । स्वरूपमेवेति चेन्न । मिथः सम्भेदाभ्युपगन्त्राऽपि तयोः स्वरूपोपगमात् । समर्थन—प्रतियोगी तथा अभाव का सहभाव का तथा आधाराधेयभाव से अप्रती- यमानत्व ही विरोध है, परस्पर निषेधरूपता विरोध नहीं है । खंडन—कदाचित् पट और महारजन के भी सहभाव या आधाराधेयभाव से अप्रतीयमान होने पर उन दोनों में भी विरोध हो जायगा । समर्थन—जिस जाति से विशिष्ट पदार्थों की प्रतीति नियमतः आधारा- धेयभाव या सहभाव से न हो, उन्हीं दोनों का विरोध होता है। पट तथा महारजन की प्रतीति कदाचित् आधाराधेयभाव से भी होती है। अतः उनमें विरोध नहीं है। खंडन—तब तो नित्यत्व, अनित्यत्व आदि जिन वस्तुओं में जाति नहीं है, उनमें भी विरोध का अभाव होने लगेगा। यदि नियम को देशगर्भ मानें, तो विरुद्ध देश-व्यक्तियों में और यदि कालगर्भ मानें, तो अतीत, अनागत कालों में भी विरोध न होगा। कारण देश में देश नहीं रहता और न काल में काल ही रहता है। अथवा जात्यवच्छेदेन विरोध मानेंगे, तो दो जातियों में ही विरोध होगा, व्यक्तियों में नहीं । समर्थन—सहभाव या आधाराधेयभाव से होनेवाली प्रतीति की अयोग्यता ही विरोध है। भाव और अभाव में तो सहभाव तथा आधाराधेयभाव से प्रतीति-अयोग्यता है, किन्तु पट और महारजन में वैसी प्रतीति-अयोग्यता नहीं है; क्योंकि महारजन में कदाचित् आधाराधेयभाव से भी पट की प्रतीति होती है। खंडन—वह अयोग्यता या योग्यता ज्ञात या ज्ञानगत तो होगी नहीं, किन्तु प्रमेयगत ही हो सकती है और प्रमेय में वह परस्पर निषेध्य-निषेधात्मकता से अन्य कोई नहीं है । समर्थन—प्रतियोगी, अभाव इन दोनों स्वरूप का ही विरोध है, प्रतियोगी-अनु- योगिभाव नहीं। खंडन—जो पदार्थमात्र को सत् और असत् उभयरूप मानते हैं, उनके मत में भाव और अभाव दोनों के स्वरूप होने पर भी एकत्र समावेश होने से विरोध नहीं है। अतः व्यभिचार होने के कारण स्वरूप विरोध नहीं हो सकता । १७

१३० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम तथाभूतं स्वरूपमिति चेन्न । तस्यैव निर्वाच्यतापत्तेः । कथं गोत्वाश्वत्वाभ्यां भावाभावयोरेवंविधविरोधे विशेषः स्यात् । सत्याञ्च तयोः साहित्यप्रमायां प्रकारभेदेन व्यवस्थापना किमिति कार्या, प्रमयैवाप्रमानुपगमादिति । अथ घटादिविशेषितयोस्तयोर्निषेधौ तौ, सविशेषणौ च विधिनिषेधौ न कथञ्चिद्विशेषणमनुपसङ्क्रम्य स्यातामिति ब्रूषे; तदपि न । तर्हि विशिष्टस्य निषेधो विशेषणस्यापि भवतीति संसर्गान्योन्यनिषेधोऽपि संसर्गनिषेधः स्यादेवेति पुनः स प्रसङ्गो वज्रलेपायते । अन्योन्याप्रतियोगिकः संसर्गप्रतिषेधस्तथा विवक्षितः, एवमन्योन्यनिषेधोऽपि समर्थन--जिस रूप में भाव तथा अभाव का परस्पर सह-अवस्थान या आधाराधेय- भाव रूप संभेद (सम्बन्ध) नहीं होता, तथाभूत स्वरूप ही विरोध है । खडन---'किं रूप भाव-अभाव का परस्पर सम्भेद नहीं होता' इसका निर्वचन ही नहीं हो सकता । किञ्च--यदि सह-अनवस्थान या सह-अप्रतीयमानता ही विरोध हो, तो गोत्व- अश्वत्व के विरोध से भाव-अभाव के विरोध में भेद ही क्या रहेगा ? तार्किक परस्पर विरुद्ध संयोग और तदभाव का एकत्र समावेश करने के लिए मूल-शाखादि को अवच्छेदक मानते हैं । यदि सह-अनवस्थान या सह-अप्रतीयमानता ही विरोध है, तो संयोग-तदभाव में सह-अवस्थान और सह-प्रतीयमानता होने से विरोध ही नहीं है। फिर विरोध के परिहारार्थ अवच्छेदक-भेद क्यों माना जाय ? समर्थन--घटादिविशेषित संसर्ग का निषेध संसर्गाभाव है और घटादिविशेषित तदात्म्य का निषेध तादात्म्याभाव है । विशिष्ट का निषेध विशेषण के निषेध के बिना हो नहीं सकता, अतः विशिष्ट का निषेध ही विशेषण का भी निषेध है । तथा च, घटादिविशिष्ट संसर्ग या तादात्म्य के निषेध से विशिष्ट संसर्ग या तादात्म्य का ही उच्छेद होगा, सामान्यतः संसर्ग या तादात्म्य का उच्छेद नहीं होगा । खंडन--यदि विशिष्ट का निषेध विशेषण का भी निषेध है, तो संसर्ग के अन्योन्य का निषेध (अन्योन्याभाव) संसर्ग का भी निषेध हो जायगा । एवञ्च स्मृतित्वसंसर्ग के अन्योन्याभाव का ग्रहणकर स्मृति में प्रमालक्षण की जो अतिव्याप्ति दी गयी है, वह वज्रलेप के तुल्य, अपरिहार्य हो जायगी । कारण इस तरह तो स्मृतित्वसंसर्गान्योन्याभाव भी स्मृतित्वसंसर्गाभाव ही है । समर्थन-अन्योन्य है प्रतियोगी जिसका, उससे भिन्न संसर्ग-निषेध ही संसर्गाभाव है और संसर्ग है प्रतियोगी जिसका, उससे भिन्न अन्योन्य-निषेध ही अन्योन्याभाव

परिच्छेद ] भेद-संसर्गाभाव का भेद-खण्डन १३१ संसर्गाप्रतियोगित्वेन निर्वाच्य इति चेन्न । एवं हि अन्योन्यसंसर्गाभावः संसर्गा- न्योन्याभावश्च अपरा कोटिः स्यात् । किञ्च—एवं सति संसर्गाभावोऽन्योन्याभावो यो न भवति, स संसर्गाभावतया विवक्षित इत्युक्तं स्यात् । तथा च संसर्गविशेषणं व्यर्थमिति संसर्गाभावमर्थमधिक- माकाङ्क्षता त्वयाऽन्वर्थः संसर्गाभावशब्दोऽपि हारितः स्यात्, [ यतोऽन्यो- न्याभावो यो न भवत्यभावः स संसर्गाभाव इत्युक्तम् ] । किञ्च—अनयाऽपि वाचा अन्योन्याभावनिषेधोऽभिधीयमानोऽन्योन्याभावेऽपि प्रसज्यते । न ह्यन्योन्याभावोऽन्योन्याभावो भवतीति शक्यं प्रमातुम् । सामानाधि- करण्यं हि प्रकारभेदे सति भवति, यथा नीलमुत्पलमित्यादि । ततस्तदभावादेव न तथेत्यतिप्रसङ्गः । है । एवञ्च स्मृतित्वसंसर्गान्योन्याभाव संसर्गाभाव ही नहीं है, क्योंकि वह अन्योन्य- प्रतियोगिक भी हुआ करता है । फिर उक्त अन्योन्याभाव को ग्रहणकर प्रमालक्षण की अतिव्याप्ति कैसे होगी ? खंडन—ऐसा मानें, तो 'अन्योन्यं नास्ति' इत्याकारक प्रतीतिसिद्ध अभाव भी अन्योन्यप्रतियोगिक होने से संसर्गाभाव नहीं कहा जायगा । इसी तरह 'संसर्गो न' इस प्रतीति से सिद्ध अभाव भी संसर्गप्रतियोगिक होने से अन्योन्याभाव नहीं हो सकेगा । तब उक्त अभावद्वय स्वीकृत अभावों में अन्तर्भूत न होने से अन्यकोटिक ही हो जायेंगे । किञ्च—ऐसा होने पर 'अन्योन्यप्रतियोगिक से भिन्न जो संसर्गाभाव है, वही संसर्गा- भाव है' यही उक्त वाक्य का अर्थ होगा । तब तो 'संसर्ग' विशेषण व्यर्थ है, क्योंकि 'अन्योन्यप्रतियोगिक से भिन्न जो अभाव, वह संसर्गाभाव है' ऐसा कहने पर भी कोई दोष नहीं है । यदि संसर्ग का निवेश न करें, तो 'संसर्गाभाव' शब्द की अन्वर्थता का त्याग हो जायगा; क्योंकि तब तो संसर्गाभाव शब्द का अर्थ 'संसर्ग का अभाव' नहीं, किन्तु 'अन्योन्याभाव से भिन्न अभाव' ही है । किञ्च—इस वाक्य-रचना से कथित अन्योन्याभाव का निषेध अन्योन्याभाव में भी प्रसक्त हो जायगा । कारण शब्दसामानाधिकरण्यकृत विशेष्यविशेषणभाव या उद्देश्यविधेयभाव धर्मभेद में होता है; जैसे 'नीलमुत्पलम्' इस स्थल में । अतः 'अन्योन्याभावः, अन्योन्याभावः' यह प्रतीति नहीं हो सकती । एवञ्च जब अन्योन्या- भाव का विधान अन्योन्याभाव में नहीं हुआ, तो अन्योन्याभाव का निषेध अन्योन्याभाव में सिद्ध हो जाता है ।

१३२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अन्यश्चान्योन्याभावेष्वेव तिष्ठन्नेव कः प्रमेयो यद्वति तथा कथ्येत ? अभावमात्रे त्वतिप्रसङ्गात् । व्यक्तिविशेषे च शेषेष्वन्योन्याभावेषु संसर्गाभावत्वापत्तेः । एतच्च सर्वत्र तदन्यत्वेन व्यवच्छिद्यमाने द्रष्टव्यम् । तथा हि— ‘नातत्तन्मन्यसे तावन्न तत्तदपि मंस्यसे । सामानाधिकरण्यं हि रूपभेदमपेक्षते ॥ २९ ॥ रूपान्तरेण निर्दिश्य तच्चेत्तदभिधीयते । ताद्रूप्येण तथाऽपि स्यात् सैव सव्यभिचारिता ॥ ३० ॥’ अपि च—अन्योन्याभावस्य संसर्गाभावोऽप्येवं व्यवच्छिन्नः स्यात्, तस्यापि अन्योन्यप्रतियोगिकत्वात् । समर्थन—अन्योन्याभावमात्र में वृत्ति किसी धर्म को उद्देश्यता का अवच्छेदक मानकर अन्योन्याभावत्व के विधान के तात्पर्य से ‘अन्योन्याभावः अन्योन्याभावः’ यह प्रयोग हो सकता है । खंडन—अन्योन्याभावत्व से अन्य अन्योन्याभावमात्रवृत्ति धर्म में कोई प्रमाण नहीं है । यदि प्रथम अन्योन्याभाव पद का लक्षणा द्वारा अभावत्वबोध के तात्पर्य से प्रयोग करें, तो ‘अन्योन्याभावः अन्योन्याभावः’ इस वाक्य का ‘अभावः अन्योन्याभावः’ इस अर्थ में तात्पर्य होने से संसर्गाभाव भी अन्योन्याभाव हो जायगा । यदि घटान्योन्याभाव के तात्पर्य से प्रयोग हो, तो उक्त वाक्य का ‘घटान्योन्याभाव अन्योन्याभाव है’ यह अर्थ होगा । अतः पटान्योन्याभाव अन्योन्याभाव नहीं हो सकेगा; किन्तु वह संसर्गाभाव ही हो जायगा । जिन-जिन लक्षणों में किसीसे अन्यत्व का निवेश हो, उन सभी लक्षणों में यह दोष जानना चाहिए । देखिये— जैसे उससे भिन्न वह, यह प्रयोग नहिं होत । ऐसे वह वह यह नहीं, कभी प्रयोग भी होत ॥ अन्य धर्म में लक्षणावश से यदि प्रयोग । अतिव्याप्ति अव्याप्ति तब, दोष न होत है योग ॥ किञ्च—यदि संसर्गाभाव के लक्षण में ‘अन्योन्यप्रतियोगित्वे सति’ यह निवेश करें, तो ‘अन्योन्याभावो नास्ति’ इस प्रतीति से सिद्ध संसर्गाभाव में अव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि वह भी अन्योन्यप्रतियोगिक ही है, अप्रतियोगिक नहीं ।

परिच्छेद ] भेद-संसर्गाभाव का भेद खण्डन १२३ अथान्योन्याभावस्य संसर्गाभावो नाम अधिको नोपेयत एव, यमादाय तथा स्यादिति चेन्न । एवं तर्ह्यन्योन्याभावस्य अन्योन्याभावोऽपि नाधिकोऽभ्युपगन्तव्यः स्यादिति अन्योन्याप्रतियोगित्वेन व्यवच्छेदोऽपि संसर्गाभावस्य त्वदभिमतस्य कथं स्यात्, व्यवच्छेदस्य निषेधार्थत्वात् । अथ माभूदधिकोऽसौ, स्वरूपमेव तु तथेष्यत इति तदादायैव व्यवहार एष निर्दोष इति चेत्, तर्ह्यन्योन्याभावसंसर्गव्यतिरेकेऽपि तुल्यमेतत् । अपि च—'अन्योन्यप्रतियोगिको न भवत्यभावो यः स संसर्गाभावः' इति वदता त्वया अन्योन्यप्रतियोगिकेऽभावे निषिध्यमाने अन्योन्यात्मकोऽसौ अभावोऽभ्युपगतः स्यात्, द्वयोर्निषेधयोः सुन्दोपसुन्दतया अन्योन्यस्यैव स्थैर्यापत्तेः । तथा च सत्य- न्योन्यस्मिन् निर्विशेषणे जगदेव प्रविष्टमिति संसर्गाभावत्वेन विवक्षितस्य जगदात्म- समर्थन—अनवस्था तथा अनुभव-दोष से अभाव के अभाव को अतिरिक्त नहीं मानते । एवञ्च अन्योन्याभावप्रतियोगिक ससर्गाभाव के अन्योन्याभाव से अतिरिक्त प्रसिद्ध ही न होने से उसे लेकर अव्याप्ति भी नहीं होगी । खण्डन—यदि अभाव के अभाव को अतिरिक्त नहीं मानेंगे, तो अन्योन्याभाव का अन्योन्याभाव भी नहीं मानेंगे । फिर अन्योन्याप्रतियोगित्व विशेषण देने पर संसर्गाभाव में अन्योन्याभाव से व्यवच्छेद भी कैसे होगा; क्योंकि 'व्यवच्छेद' पदार्थ भी निषेध ( अन्योन्याभाव ) ही है । समर्थन—अन्योन्याभाव का अन्योन्याभाव अतिरिक्त न होने पर भी व्यवच्छेद्यभूत अन्योन्याभावरूप ही वह व्यवच्छेद है ! अतः अन्योन्याप्रतियोगिकत्व विशेषण से अन्योन्याभाव का स्वरूपरूप अन्योन्याभाव मिल जायगा । खण्डन—तब तो 'अन्योन्या- भावो नास्ति' इस प्रतीति से सिद्ध अभाव अतिरिक्त न होने पर भी उसे आप स्वरूपरूप अवश्य मानेंगे । एवञ्च स्वरूपरूप उस अभाव में संसर्गाभाव के लक्षण की अव्याप्ति वैसी ही बनी रही । किञ्च—'जो अभाव अन्योन्यप्रतियोगिक न हो, वह संसर्गाभाव है' ऐसा लक्षण करनेवाले अन्योन्य-प्रतियोगिक अभाव का निषेध होने पर 'संसर्गाभाव अन्योन्यात्मक है' यह अवश्य मानेंगे; क्योंकि दोनों अभावों के परस्पर सुन्द-उपसुन्द के तुल्य निषेधरूप होने से अन्योन्य की ही स्थिति होगी । ऐसा होने पर विशेषणरहित अन्योन्य में जगन्मात्र प्रविष्ट हुआ । अतः जिसे आप संसर्गाभाव कहते हैं, उसके जगद्रूप सिद्ध होने पर वह अन्योन्याभावरूप भी हुआ । अतः अन्योन्याभाव

१५४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम तायां सिद्धयन्त्यामन्योन्याभावात्मताऽपि स्यादिति व्यर्थो विशेषणप्रयासो हास्यायेति, सविशेषणोऽप्यविशेषणवत्प्रसङ्ग इति महत् कौतुकम्। ननु 'घटाभावो न भवति स्तम्भः' इत्युक्ते किं स्तम्भो घटात्मा विहितो भवति, तत्कस्य हेतोः ? तदा हि तथा स्यात्, यदि घटस्तदभावश्चेत्येव जगत् स्यात्। यदा तु स्तम्भादिरप्यपरा कोटिरस्ति, तदा कथं तथा स्यादित्युक्त- प्रसङ्गानवकाश इति। मैवम्; यथा घटतदभावाभ्यामन्या वस्त्रादिकमप्यस्ति कोटिस्तथाऽन्योन्य- तदभावाभ्यां नान्या कोटिः सम्भवति, निर्विशेषणान्योन्यमध्ये जगत एव प्रवेशात्। तदात्मनोऽपि निषिध्यमानत्वे तन्निषेधात्मके तदात्मनि जगत्प्रवेशात्। न हि 'घटः पटात्मे'त्यनेन पटस्वरूपादन्यस्तदात्मा विहितः स्यात्। से व्यवच्छेद के लिए लक्षण में 'अन्योन्याप्रतियोगित्व' विशेषण देने का प्रयास व्यर्थ, अतएव हास्यास्पद होगा। अति-आश्चर्य तो यह है कि विशेषण देने पर भी विशेषणरहित के तुल्य दोष होता है। शंका—'स्तम्भ घटाभाव नहीं है' यह कहने पर क्या स्तम्भ घटरूप सिद्ध होता है ? ऐसा तब होता, यदि जगत् घट तथा घटाभावमात्र होता। जब कि स्तम्भ आदि और भी कोटियाँ (वस्तुएँ) हैं, तब ऐसा कैसे हो सकता है ? इसी तरह अन्योन्याभाव का निषेध होने पर जगत् अन्योन्यरूप कैसे होगा ? उत्तर—जैसे घट और घटाभाव से अन्य स्तम्भादि हैं, वैसे अन्योन्य और अन्योन्याभाव से अन्य कोई वस्तु नहीं है। अतः संसर्गाभाव के विशेषणरहित अन्योन्य में अन्तर्भूत होने से उक्त दोष वैसे ही है। समर्थन—'अन्योन्याभाव'-शब्द तादात्म्यप्रतियोगिक अभाव की संज्ञा है, 'अन्योन्यस्य अभावः' इस अर्थ में यौगिक नहीं। एवञ्च अन्योन्याभाव के निषेध का अन्योन्य में पर्यवसान न होने से पूर्वोक्त दोष नहीं होगा। खण्डन—यदि तादात्म्य के निषेध को अन्योन्याभाव कहें, तो तादात्म्य के निषेध का निषेध भी तादात्म्यरूप में ही पर्यवसित होगा तथा च तदात्मक संसर्गाभाव में जगत् का ही प्रवेश हुआ, क्योंकि 'घटः पटात्मा' यह कहने पर घटरूप से अन्य पटात्मा प्रतीत नहीं होता, किन्तु घटरूप ही पटात्मा प्रतीत होता है

परिच्छेद ] भेद-संसर्गाभाव का भेद-खण्डन १३५ यदि तु तादात्म्यं नामाभेदाख्यो धर्मः कश्चिदिष्यते, स घटपटाद्यधिकरणतया निषिध्यते; तदा संसर्गाभाव एव स स्यात् । तस्मात् निर्विशेषणतादात्म्यान्तर्भूतं जगदिति कोट्यन्तराभाव इति । अपि च एवं तर्हि घटे निषिध्यमाने घटाभावो विधीयते, घटाभावे च निषिध्यमाने घट इत्यपि न स्यात्; तृतीयस्य विद्यमानत्वात् । भवन् वा 'घटा- भावः स्तम्भो न भवती'त्यत्रापि घटाभावत्वाविशेषात् विशेषान्तरानिर्वचनाच्च घटः स्तम्भात्मेत्येवोक्तं स्यादिति त्वत्प्रसङ्गस्त्वयि निपतेत् । संसर्गान्योन्‍याभाव- वैचित्र्यमादाय हि स परिहार्यः, स एव च नाद्यापि व्यवतिष्ठते । अत एव 'प्रतीतिबलादन्यदेव वैधर्म्यमनयोरुपेयमित्यपि निरस्तम् । प्रति- समर्थन—अन्योन्याभाव का तादात्म्य प्रतियोगी है, अतः अन्योन्याभाव का निषेध तादात्म्यरूप होगा । तादात्म्य जगत् का धर्म है, जगद्रूप नहीं । खंडन—यदि तादात्म्य का घट में निषेध करें, तो अन्योन्याभाव का संसर्गाभाव में प्रवेश होने से उसका उच्छेद हो जायगा । तस्मात् निर्विशेषण अन्योन्य अथवा तादात्म्य में जगत् का प्रवेश होने से संसर्गाभाव अन्योन्याभावात्मक हो ही जायगा । किञ्च—यदि अन्योन्याभाव के अन्योन्याभाव को अन्योन्यरूप न मानें, तो घटा- त्यन्ताभाव का अत्यन्ताभाव भी घटरूप न होगा; क्योंकि घट और घटाभाव से अन्य तृतीय कोटि यहाँ भी नहीं है । यदि तृतीय कोटि के रहते भी अभाव के अभाव को प्रतियोगीरूप मानें, तो 'घटाभावात्मा स्तम्भो न भवति' यहां घटान्योन्‍याभाव का अन्यो- न्याभाव भी स्तम्भात्मा हो जायगा; क्योंकि अन्योन्याभाव भी अभाव ही है और आपने अभीतक संसर्गाभाव से अन्योन्याभाव का भेद सिद्ध नहीं किया है । अतः 'अत्यन्ता- भावस्थल में अभावाभाव प्रतियोगीरूप होता है और अन्योन्याभावस्थल में नहीं' यह नियम मानकर भी अतिप्रसङ्ग का निवारण कर सकते हैं । समर्थन—किसी अभाव का अभाव प्रतियोगीरूप प्रतीत होता है, तो किसी का प्रतियोगी से अन्य, अतः यह प्रतीति ही दोनों अभावों के भेद में प्रमाण है । खण्डन—जब तक लक्षण से अर्थ का भेद सिद्ध न हो, तबतक दोनों अभावों की भेदावगाही प्रतीति प्रमा न होकर भ्रमरूप ही रहेगी । अतः इन दोनों अभावों की भेदावगाही प्रतीति भी प्रमा नहीं । समर्थन—'जहां प्रतियोगी और अभाव दोनों में परस्पर विरोध हो, वहां अभाव का निषेध प्रतियोगी की विधि के लिए होता है । अर्थात् अभावाभाव प्रतियोगीरूप होता