खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] भेद-संसर्गाभाव का भेद खण्डन १२३ अथान्योन्याभावस्य संसर्गाभावो नाम अधिको नोपेयत एव, यमादाय तथा स्यादिति चेन्न । एवं तर्ह्यन्योन्याभावस्य अन्योन्याभावोऽपि नाधिकोऽभ्युपगन्तव्यः स्यादिति अन्योन्याप्रतियोगित्वेन व्यवच्छेदोऽपि संसर्गाभावस्य त्वदभिमतस्य कथं स्यात्, व्यवच्छेदस्य निषेधार्थत्वात् । अथ माभूदधिकोऽसौ, स्वरूपमेव तु तथेष्यत इति तदादायैव व्यवहार एष निर्दोष इति चेत्, तर्ह्यन्योन्याभावसंसर्गव्यतिरेकेऽपि तुल्यमेतत् । अपि च—'अन्योन्यप्रतियोगिको न भवत्यभावो यः स संसर्गाभावः' इति वदता त्वया अन्योन्यप्रतियोगिकेऽभावे निषिध्यमाने अन्योन्यात्मकोऽसौ अभावोऽभ्युपगतः स्यात्, द्वयोर्निषेधयोः सुन्दोपसुन्दतया अन्योन्यस्यैव स्थैर्यापत्तेः । तथा च सत्य- न्योन्यस्मिन् निर्विशेषणे जगदेव प्रविष्टमिति संसर्गाभावत्वेन विवक्षितस्य जगदात्म- समर्थन—अनवस्था तथा अनुभव-दोष से अभाव के अभाव को अतिरिक्त नहीं मानते । एवञ्च अन्योन्याभावप्रतियोगिक ससर्गाभाव के अन्योन्याभाव से अतिरिक्त प्रसिद्ध ही न होने से उसे लेकर अव्याप्ति भी नहीं होगी । खण्डन—यदि अभाव के अभाव को अतिरिक्त नहीं मानेंगे, तो अन्योन्याभाव का अन्योन्याभाव भी नहीं मानेंगे । फिर अन्योन्याप्रतियोगित्व विशेषण देने पर संसर्गाभाव में अन्योन्याभाव से व्यवच्छेद भी कैसे होगा; क्योंकि 'व्यवच्छेद' पदार्थ भी निषेध ( अन्योन्याभाव ) ही है । समर्थन—अन्योन्याभाव का अन्योन्याभाव अतिरिक्त न होने पर भी व्यवच्छेद्यभूत अन्योन्याभावरूप ही वह व्यवच्छेद है ! अतः अन्योन्याप्रतियोगिकत्व विशेषण से अन्योन्याभाव का स्वरूपरूप अन्योन्याभाव मिल जायगा । खण्डन—तब तो 'अन्योन्या- भावो नास्ति' इस प्रतीति से सिद्ध अभाव अतिरिक्त न होने पर भी उसे आप स्वरूपरूप अवश्य मानेंगे । एवञ्च स्वरूपरूप उस अभाव में संसर्गाभाव के लक्षण की अव्याप्ति वैसी ही बनी रही । किञ्च—'जो अभाव अन्योन्यप्रतियोगिक न हो, वह संसर्गाभाव है' ऐसा लक्षण करनेवाले अन्योन्य-प्रतियोगिक अभाव का निषेध होने पर 'संसर्गाभाव अन्योन्यात्मक है' यह अवश्य मानेंगे; क्योंकि दोनों अभावों के परस्पर सुन्द-उपसुन्द के तुल्य निषेधरूप होने से अन्योन्य की ही स्थिति होगी । ऐसा होने पर विशेषणरहित अन्योन्य में जगन्मात्र प्रविष्ट हुआ । अतः जिसे आप संसर्गाभाव कहते हैं, उसके जगद्रूप सिद्ध होने पर वह अन्योन्याभावरूप भी हुआ । अतः अन्योन्याभाव