भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 149

१३२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अन्यश्चान्योन्याभावेष्वेव तिष्ठन्नेव कः प्रमेयो यद्वति तथा कथ्येत ? अभावमात्रे त्वतिप्रसङ्गात् । व्यक्तिविशेषे च शेषेष्वन्योन्याभावेषु संसर्गाभावत्वापत्तेः । एतच्च सर्वत्र तदन्यत्वेन व्यवच्छिद्यमाने द्रष्टव्यम् । तथा हि— ‘नातत्तन्मन्यसे तावन्न तत्तदपि मंस्यसे । सामानाधिकरण्यं हि रूपभेदमपेक्षते ॥ २९ ॥ रूपान्तरेण निर्दिश्य तच्चेत्तदभिधीयते । ताद्रूप्येण तथाऽपि स्यात् सैव सव्यभिचारिता ॥ ३० ॥’ अपि च—अन्योन्याभावस्य संसर्गाभावोऽप्येवं व्यवच्छिन्नः स्यात्, तस्यापि अन्योन्यप्रतियोगिकत्वात् । समर्थन—अन्योन्याभावमात्र में वृत्ति किसी धर्म को उद्देश्यता का अवच्छेदक मानकर अन्योन्याभावत्व के विधान के तात्पर्य से ‘अन्योन्याभावः अन्योन्याभावः’ यह प्रयोग हो सकता है । खंडन—अन्योन्याभावत्व से अन्य अन्योन्याभावमात्रवृत्ति धर्म में कोई प्रमाण नहीं है । यदि प्रथम अन्योन्याभाव पद का लक्षणा द्वारा अभावत्वबोध के तात्पर्य से प्रयोग करें, तो ‘अन्योन्याभावः अन्योन्याभावः’ इस वाक्य का ‘अभावः अन्योन्याभावः’ इस अर्थ में तात्पर्य होने से संसर्गाभाव भी अन्योन्याभाव हो जायगा । यदि घटान्योन्याभाव के तात्पर्य से प्रयोग हो, तो उक्त वाक्य का ‘घटान्योन्याभाव अन्योन्याभाव है’ यह अर्थ होगा । अतः पटान्योन्याभाव अन्योन्याभाव नहीं हो सकेगा; किन्तु वह संसर्गाभाव ही हो जायगा । जिन-जिन लक्षणों में किसीसे अन्यत्व का निवेश हो, उन सभी लक्षणों में यह दोष जानना चाहिए । देखिये— जैसे उससे भिन्न वह, यह प्रयोग नहिं होत । ऐसे वह वह यह नहीं, कभी प्रयोग भी होत ॥ अन्य धर्म में लक्षणावश से यदि प्रयोग । अतिव्याप्ति अव्याप्ति तब, दोष न होत है योग ॥ किञ्च—यदि संसर्गाभाव के लक्षण में ‘अन्योन्यप्रतियोगित्वे सति’ यह निवेश करें, तो ‘अन्योन्याभावो नास्ति’ इस प्रतीति से सिद्ध संसर्गाभाव में अव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि वह भी अन्योन्यप्रतियोगिक ही है, अप्रतियोगिक नहीं ।