भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 610 में से

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पृष्ठ 148

परिच्छेद ] भेद-संसर्गाभाव का भेद-खण्डन १३१ संसर्गाप्रतियोगित्वेन निर्वाच्य इति चेन्न । एवं हि अन्योन्यसंसर्गाभावः संसर्गा- न्योन्याभावश्च अपरा कोटिः स्यात् । किञ्च—एवं सति संसर्गाभावोऽन्योन्याभावो यो न भवति, स संसर्गाभावतया विवक्षित इत्युक्तं स्यात् । तथा च संसर्गविशेषणं व्यर्थमिति संसर्गाभावमर्थमधिक- माकाङ्क्षता त्वयाऽन्वर्थः संसर्गाभावशब्दोऽपि हारितः स्यात्, [ यतोऽन्यो- न्याभावो यो न भवत्यभावः स संसर्गाभाव इत्युक्तम् ] । किञ्च—अनयाऽपि वाचा अन्योन्याभावनिषेधोऽभिधीयमानोऽन्योन्याभावेऽपि प्रसज्यते । न ह्यन्योन्याभावोऽन्योन्याभावो भवतीति शक्यं प्रमातुम् । सामानाधि- करण्यं हि प्रकारभेदे सति भवति, यथा नीलमुत्पलमित्यादि । ततस्तदभावादेव न तथेत्यतिप्रसङ्गः । है । एवञ्च स्मृतित्वसंसर्गान्योन्याभाव संसर्गाभाव ही नहीं है, क्योंकि वह अन्योन्य- प्रतियोगिक भी हुआ करता है । फिर उक्त अन्योन्याभाव को ग्रहणकर प्रमालक्षण की अतिव्याप्ति कैसे होगी ? खंडन—ऐसा मानें, तो 'अन्योन्यं नास्ति' इत्याकारक प्रतीतिसिद्ध अभाव भी अन्योन्यप्रतियोगिक होने से संसर्गाभाव नहीं कहा जायगा । इसी तरह 'संसर्गो न' इस प्रतीति से सिद्ध अभाव भी संसर्गप्रतियोगिक होने से अन्योन्याभाव नहीं हो सकेगा । तब उक्त अभावद्वय स्वीकृत अभावों में अन्तर्भूत न होने से अन्यकोटिक ही हो जायेंगे । किञ्च—ऐसा होने पर 'अन्योन्यप्रतियोगिक से भिन्न जो संसर्गाभाव है, वही संसर्गा- भाव है' यही उक्त वाक्य का अर्थ होगा । तब तो 'संसर्ग' विशेषण व्यर्थ है, क्योंकि 'अन्योन्यप्रतियोगिक से भिन्न जो अभाव, वह संसर्गाभाव है' ऐसा कहने पर भी कोई दोष नहीं है । यदि संसर्ग का निवेश न करें, तो 'संसर्गाभाव' शब्द की अन्वर्थता का त्याग हो जायगा; क्योंकि तब तो संसर्गाभाव शब्द का अर्थ 'संसर्ग का अभाव' नहीं, किन्तु 'अन्योन्याभाव से भिन्न अभाव' ही है । किञ्च—इस वाक्य-रचना से कथित अन्योन्याभाव का निषेध अन्योन्याभाव में भी प्रसक्त हो जायगा । कारण शब्दसामानाधिकरण्यकृत विशेष्यविशेषणभाव या उद्देश्यविधेयभाव धर्मभेद में होता है; जैसे 'नीलमुत्पलम्' इस स्थल में । अतः 'अन्योन्याभावः, अन्योन्याभावः' यह प्रतीति नहीं हो सकती । एवञ्च जब अन्योन्या- भाव का विधान अन्योन्याभाव में नहीं हुआ, तो अन्योन्याभाव का निषेध अन्योन्याभाव में सिद्ध हो जाता है ।

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