खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम तथाभूतं स्वरूपमिति चेन्न । तस्यैव निर्वाच्यतापत्तेः । कथं गोत्वाश्वत्वाभ्यां भावाभावयोरेवंविधविरोधे विशेषः स्यात् । सत्याञ्च तयोः साहित्यप्रमायां प्रकारभेदेन व्यवस्थापना किमिति कार्या, प्रमयैवाप्रमानुपगमादिति । अथ घटादिविशेषितयोस्तयोर्निषेधौ तौ, सविशेषणौ च विधिनिषेधौ न कथञ्चिद्विशेषणमनुपसङ्क्रम्य स्यातामिति ब्रूषे; तदपि न । तर्हि विशिष्टस्य निषेधो विशेषणस्यापि भवतीति संसर्गान्योन्यनिषेधोऽपि संसर्गनिषेधः स्यादेवेति पुनः स प्रसङ्गो वज्रलेपायते । अन्योन्याप्रतियोगिकः संसर्गप्रतिषेधस्तथा विवक्षितः, एवमन्योन्यनिषेधोऽपि समर्थन--जिस रूप में भाव तथा अभाव का परस्पर सह-अवस्थान या आधाराधेय- भाव रूप संभेद (सम्बन्ध) नहीं होता, तथाभूत स्वरूप ही विरोध है । खडन---'किं रूप भाव-अभाव का परस्पर सम्भेद नहीं होता' इसका निर्वचन ही नहीं हो सकता । किञ्च--यदि सह-अनवस्थान या सह-अप्रतीयमानता ही विरोध हो, तो गोत्व- अश्वत्व के विरोध से भाव-अभाव के विरोध में भेद ही क्या रहेगा ? तार्किक परस्पर विरुद्ध संयोग और तदभाव का एकत्र समावेश करने के लिए मूल-शाखादि को अवच्छेदक मानते हैं । यदि सह-अनवस्थान या सह-अप्रतीयमानता ही विरोध है, तो संयोग-तदभाव में सह-अवस्थान और सह-प्रतीयमानता होने से विरोध ही नहीं है। फिर विरोध के परिहारार्थ अवच्छेदक-भेद क्यों माना जाय ? समर्थन--घटादिविशेषित संसर्ग का निषेध संसर्गाभाव है और घटादिविशेषित तदात्म्य का निषेध तादात्म्याभाव है । विशिष्ट का निषेध विशेषण के निषेध के बिना हो नहीं सकता, अतः विशिष्ट का निषेध ही विशेषण का भी निषेध है । तथा च, घटादिविशिष्ट संसर्ग या तादात्म्य के निषेध से विशिष्ट संसर्ग या तादात्म्य का ही उच्छेद होगा, सामान्यतः संसर्ग या तादात्म्य का उच्छेद नहीं होगा । खंडन--यदि विशिष्ट का निषेध विशेषण का भी निषेध है, तो संसर्ग के अन्योन्य का निषेध (अन्योन्याभाव) संसर्ग का भी निषेध हो जायगा । एवञ्च स्मृतित्वसंसर्ग के अन्योन्याभाव का ग्रहणकर स्मृति में प्रमालक्षण की जो अतिव्याप्ति दी गयी है, वह वज्रलेप के तुल्य, अपरिहार्य हो जायगी । कारण इस तरह तो स्मृतित्वसंसर्गान्योन्याभाव भी स्मृतित्वसंसर्गाभाव ही है । समर्थन-अन्योन्य है प्रतियोगी जिसका, उससे भिन्न संसर्ग-निषेध ही संसर्गाभाव है और संसर्ग है प्रतियोगी जिसका, उससे भिन्न अन्योन्य-निषेध ही अन्योन्याभाव