भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 145

५२८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम एवं यद्यदेव प्रतियोगि वाच्यं तत्तत्स्वरूपत एव न स्यात् । तस्यापि संसर्गे प्रति धावने च तदक्षतम्, संसर्गानवस्था, शेषोच्छेदात् पूर्वपूर्वोच्छेदो वा स्यात् । न प्रतियोग्यनुयोगिनोस्तथात्वं विरोधः, किन्तु सहभावाभावः, अतस्तन्मात्रं न स्यात्, न तु तन्मात्रमेव न स्यादिति चेन्न । अनुयोगिनि प्रतियोग्यापत्तेः । तथा प्रमाभावात् कथं तदास्तामिति चेन्न । तथाप्रमाभावमूलकस्य विरोधस्य सहानवस्थानस्य नियमभङ्गात्, प्रतियोग्यनुयोगिभावादन्यः कस्तयोर्विरोधः स्यात् । इसी तरह जो-जो वस्तुएँ अविशेषित (केवल) ही निषेध की प्रतियोगी होंगी, वे स्वरूप से ही उच्छिन्न हो जायँगी अर्थात् अलीक हो जायँगी । समर्थन—संसर्ग या तादात्म्य के भी संसर्ग का ही निषेध होता है, अतः स्वरूपतः उन दोनों का उच्छेद नहीं होगा । खंडन—यदि संसर्ग के भी संसर्ग का ही निषेध करें, तो अनवस्था हो जायगी । यदि स्वरूप का निषेध करें, तो संसर्ग के संसर्ग का स्वरूप से ही उच्छेद हो जायगा । साथ ही उत्तर संसर्ग का उच्छेद होने से पूर्व-पूर्व का भी उच्छेद होने के कारण फिर भी संसर्ग तथा तादात्म्यमात्र का उच्छेद हो जायगा; क्योंकि संसर्ग का उच्छेद होने पर संसर्गी की स्थिति हो ही नहीं सकती । समर्थन—अविशेषित संसर्ग तथा तादात्म्य का अभाव होने पर स्वरूप से उन दोनों का उच्छेद तब होता, जब प्रतियोगी के साथ अभाव का परस्पर निषेध्य-निषेधभावरूप (प्रतियोगी का निषेध अभावरूप और अभाव का निषेध प्रतियोगीरूप) विरोध होता । किन्तु यहाँ तो सह-अवस्थान का अभाव ही विरोध है । अतः प्रतियोगी और अभाव दोनों का सह-अवस्थानमात्र न होगा, प्रतियोगी के स्वरूपतः उच्छेद का तो कोई प्रश्न ही नहीं । खंडन—यदि सह-अवस्थान का अभाव ही विरोध हो, तो जैसे प्रतियोगी में अभाव का वैशिष्ट्य होता है, वैसे अभाव में अभाव का वैशिष्ट्य नहीं है, क्योंकि स्व में स्व नहीं रहता । एवञ्च अभाव में प्रतियोगी का वैशिष्ट्य भी होने लगेगा, कारण अब तो दोनों का स्वरूपतः विरोध है ही नहीं । समर्थन—अभाव में प्रतियोगी के वैशिष्ट्य की प्रमा नहीं होती, अतः उसमें प्रतियोगी के वैशिष्ट्य का आपादन हो ही नहीं सकता । खंडन—तब तो प्रतियोगी तथा अभाव दोनों के सह-अवस्थान की प्रमा तथा आधाराधेयभाव की प्रमा भी नहीं होती । उनमें सह-अवस्थान की प्रमा का विरह तो सह-अवस्थानरूप विरोध से उपपादित हो सकता है । किन्तु आधाराधेयभाव की प्रमा के विरह के उपपादनार्थ एक अन्य नियम का भी स्वीकार करना पड़ेगा । अतः 'सह-अवस्थान ही विरोध है' यह नियम भग्न हो जायगा । वह नियम प्रतियोगी-अनुयोगिभाव (परस्पर निषेध्य-निषेधकभाव) से अन्य नहीं हो सकता ।