भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 610 में से

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परिच्छेद ] भेद-संसर्गाभाव का भेद-खण्डन १२७ ननु संसर्गप्रतियोगिको निषेधः संसर्गाभावः, तादात्म्यप्रतियोगिकश्च तादात्म्या- भाव इत्युक्त एव न मिश्रता तयोः । यो हि संसर्गतादात्म्यस्य निषेधः, स संसर्ग- निषेध एव न भवति तादात्म्यप्रतियोगिकत्वादिति । मैवम्; द्रव्यगुणकर्मणां समवायिकारणेषु हि तेषां प्रध्वंसा नैवं संसर्गाभावाः स्युः । संसर्गप्रतियोगित्वे तु संसर्गस्य समवायरूपतया समवायानित्यत्वप्रसङ्गात् । किञ्च—तर्हि संसर्गान्योन्याभावौ द्वावपि न घटादिप्रतियोगिकाविति घटादेः कालादिवन्निरवधित्वापातः । संसर्गतादात्म्ययोश्च अविशेषितयोर्निषेधे सामान्यत एव तयोरुच्छेदः स्यात् । नहीं ? यदि नहीं, तो अन्योन्याभावका भेद कहीं भी न होने से वह सर्वात्मक हो जायगा । यदि मानते हैं, तो उस अन्योन्याभाव का भी अन्य अन्योन्याभाव एवं उत्तरोत्तर अन्योन्याभावों की धारा मानने पर भेद के अननुगम तथा अननुभव का अनुसरण करना पड़ेगा । समर्थन—'जिस अभाव का प्रतियोगी संसर्ग हो, वह अभाव संसर्गाभाव है तथा जिसका प्रतियोगी तादात्म्य हो, वह अभाव अन्योन्याभाव है', ऐसा लक्षण करने पर दोनों अभावों का ऐक्य नहीं होगा; क्योंकि संसर्ग के तादात्म्य का अभाव तादात्म्य- प्रतियोगिक होने से संसर्गाभाव ही नहीं है । अतः स्मृतित्व-संसर्गाभाव शब्द से अन्योन्याभाव का ग्रहण न होने से स्मृति में प्रमालक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—ऐसा लक्षण करने पर द्रव्य-गुण-कर्म के प्रध्वंसाभाव में संसर्गाभाव- लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । क्योंकि प्रध्वंसाभाव का प्रतियोगी ससर्ग नहीं होता । यदि संसर्ग को ध्वंस का प्रतियोगी मान लें, तो द्रव्यादि के समवायिकारण में संसर्ग समवायरूप है । उसका ध्वंस मानने पर वह अनित्य हो जायगा । किन्तु नैयायिक तो समवाय को अनित्य नहीं मानते । किञ्च—यदि संसर्ग तथा तादात्म्य को संसर्गाभाव तथा अन्योन्याभाव का प्रतियोगी मानें, तो वे दोनों अभाव घटादि-प्रतियोगिक नहीं होंगे अतः घटादि का किसी भी काल या देश में निषेध न होने से काल के तुल्य घटादि भी निरवधि अर्थात् नित्य और व्यापक हो जायेंगे । किञ्च—अविशेषित संसर्ग तथा तादात्म्य का निषेध करने पर अर्थात् प्रतियोगिताकोटि में घटादि का निवेश न करने पर सामान्यरूप से ही संसर्ग तथा तादात्म्य का उच्छेद हो जायगा ।

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