भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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१२६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम वैचित्र्यात्, अभावे जात्यादिभेदानभ्युपगमाच्च तयोर्भेदबुद्धिरेव प्रामाण्यमनश्नुवाना कूटसाक्षिणीति तदनादरणात् । न च स्वप्रतियोगिसमानकालसमानाधिकरणोऽभावोऽन्योन्याभाव , तदन्योन्या- भाववाँश्च तदभावः संसर्गाभावः । यथासम्भवमात्माश्रवाद्यननुभवस्वभेदाननुगम- तत्तदवगमानभ्युपगमानाममुत्तरणीयत्वप्रसङ्गात् । संसर्गाभाव का निवेश है। अर्थात् संसर्गाभाव शब्द 'संसर्गस्य अभावः' इस अर्थ में यौगिक नहीं, किन्तु 'इदमिह नास्ति' इत्याकारक प्रतीति के विषय अभाव- विशेष में रूढ़ है। इसी तरह अन्योन्याभाव शब्द भी 'अन्योन्यस्य अभावः' इस अर्थ में यौगिक नहीं, किन्तु 'इदमिदं न भवति' इस प्रतीति से सिद्ध अभाव- विशेष में रूढ़ है। लक्षण में संसर्गाभाव का ही निवेश है, अतः स्मृतित्व के अन्योन्याभाव का ग्रहणकर स्मृति में दोष नहीं है। खंडन—प्रतियोगिभेद अथवा जाति-उपाधिरूप धर्मभेद से दोनों अभावों का भेद हो सकता है, किन्तु वह यहाँ नहीं है। अतः विषय-भेद न होने के के कारण उक्त बुद्धि मिथ्या होने से आदरणीय नहीं। इसलिए उक्त बुद्धि से घटित लक्षण भी असंगत ही है। समर्थन—'स्वप्रतियोगी से समान काल तथा समान अधिकरणवाला अभाव अन्योन्याभाव है और अन्योन्याभाव से भिन्न अभाव अत्यन्ताभाव है' इस तरह दोनों अभावों के स्वरूपों में भेद मान लेने पर भेद-बुद्धि अप्रमा नहीं होगी। खंडन—उक्त लक्षण के घटक अभाव पद का यदि 'भावभिन्नत्व' अर्थ करें, तो अन्योन्याभाव के लक्षण में अन्योन्याभाव का प्रवेश होने से आत्माश्रय हो जायगा। यदि अभाव पद का 'भावत्वात्यन्ताभाववत्त्व' अर्थ करें, तो अन्योन्याश्रय हो जायगा, क्योंकि अन्योन्याभाव से भिन्न अभाव को संसर्गाभाव कहते हैं और संसर्गाभाव-विशेष ही अत्यन्ताभाव है। अतः अत्यन्ताभाव से अन्योन्याभाव का और अन्योन्याभाव से अत्यन्ताभाव का निरूपण करना पड़ता है। साथ ही अन्योन्याभाव का निरूपण अत्यन्ताभाव से, अत्यन्ता- भाव का निरूपण संसर्गाभाव से और संसर्गाभाव का निरूपण अत्यन्ताभाव से होता है, अतः चक्रक दोष भी हो जायगा। किञ्च—इन दोषों से लक्षण नहीं बनेगा और लक्षण न बनने से तदधीन लक्ष्यभूत अन्योन्याभाव तथा अत्यन्ताभाव का ज्ञान भी नहीं होगा। किञ्च—आप अन्योन्याभाव का अन्योन्याभाव मानते हैं या