भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 610 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 138

परिच्छेद ] स्मृतिभिन्नत्व का खण्डन १२१ कृतस्य प्रसङ्गस्य परिहर्तुं तदानीं सुतरामशक्यत्वात् संसर्गान्तरविशेषकवचनस्य अधिकार्थापर्यवसायित्वात् । किञ्च—तदुभयस्वरूपातिरेकं तत्संसर्गस्यानन्यमानेन स्मृतित्वसंसर्गः स्मृतित्व- धर्मिस्वरूपं चेत्येतयोः संसर्गात्मकत्वे व्यवस्थाप्यमानेऽनुभूतौ कथं तादृशस्य संसर्गस्य निषेधः । किमनुभूतेः स्वरूपं नास्ति, उत स्मृतित्वसंसर्गस्य, ततः कस्य निषेधः ? अर्थान्तरभूतस्य च संसर्गस्य निषेधे स्मृतावपि प्रसङ्गस्तदवस्थः, स्मृतौ तस्यार्थान्तरभूतस्य भवताऽनभ्युपगमात्, स्वरूपमेव तयोः सम्बन्ध इति तत्र भवतोऽभ्युपगमः । अथोच्यते—अनुभूतिस्मृतित्वसंसर्गयोः स्वरूपसम्भवेऽपि न परस्परसम्बद्ध- बुद्धिजनकत्वं तयोः, तादृक्त्वञ्च यत्र तयोस्तत्र सम्बन्धात्मकत्वं स्वरूपयोरुच्यत नहीं है । खंडन--यदि स्मृतित्व-संसर्ग का स्वभाव ( स्वरूप ) ही सम्बन्ध है, तो स्मृतित्व- संसर्ग के संसर्गाभाव शब्द का अर्थ संसर्ग का स्वरूपाभाव ही हुआ । अर्थात् संसर्गाभाव से अधिक नहीं हुआ । अतः संसर्ग का अन्योन्याभाव लेकर जो अतिव्याप्ति दी गयी, वह वैसी ही बनी हुई है । किंच—स्मृतित्व-संसर्ग (समवाय) तथा स्मृति के संसर्ग को उभयस्वरूप से अतिरिक्त न माननेवाले आप स्मृतित्व-संसर्ग तथा स्मृति दोनों को ही संसर्गात्मक मानेंगे, तो फिर अनुभूति में उस संसर्ग का निषेध कैसे होगा ? क्या अनुभूति का स्वरूप नहीं है या स्मृतित्व-संसर्ग का स्वरूप नहीं है ? जब दोनों के स्वरूप हैं, तो किसका निषेध होगा ? समर्थन—स्मृतित्व-संसर्ग के स्वरूपसम्बन्ध का निषेध अनुभूति में नहीं है; किन्तु स्वरूप से अन्य सम्बन्ध का निषेध अनुभूति में है । खंडन—यदि स्वरूप से अन्य सम्बन्ध का निषेध है, तो स्मृतित्व-संसर्ग के स्वरूप से अन्य संसर्ग स्मृति में नहीं है, क्योंकि आप स्मृतित्व-संसर्ग के स्वरूप-रूप सम्बन्ध को ही स्मृति में मानते हैं, स्वरूप से अन्य सम्बन्ध को नहीं मानते । अतः स्वरूप से अन्य सम्बन्ध का अभाव स्मृति में भी हो सकता है। फलतः अनुभूति-लक्षण की स्मृति में अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन — शुद्ध स्वरूपमात्र सम्बन्ध नहीं है, किन्तु परस्परसंसृष्टत्व-बुद्धिजनकत्वरूप- स्वरूप ही संसर्ग है। वह स्मृतित्व-संसर्ग तथा स्मृति दोनों के स्वरूपों में है, अतः इन दोनों का स्वरूप संसर्ग है। अनुभूति तथा स्मृतित्व-संसर्ग इन दोनों के स्वरूपों में वह नहीं है ।