खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य स्मृतित्वस्य संसर्गाभावस्तत्र विवक्षित इति चेन्न । तथा हि—स्मृतित्वस्य संसर्गाभाव इति किमुच्यते, किं स्मृतित्वविशिष्टस्य संसर्गस्याभावः, उत संसर्ग- विशिष्टस्य स्मृतित्वस्य, अथान्यदेव वा किञ्चिदनया वाचोयुक्त्या विवक्षितम् ? आद्ये स्मृतित्वसंसर्गान्योन्याभावः स्मृतावस्तीति स एव प्रसङ्गः । न हि स्मृतित्व- संसर्गः स्मृतिः । अतएव न द्वितीयोऽपि, न हि संसर्गविशिष्टं यत्स्मृतित्वं तदेव स्मृतिव्यक्तिः । ततश्च संसर्गविशिष्टस्मृतित्वेन सह स्मृतिव्यक्तेरन्योन्याभाव- मादाय उक्तदोषानिवृत्तिः । एवं तत्र तत्रापि संसर्गविशेषणप्रक्षेपे दोषानिवृत्तिरेव, अनवस्थायां वा पर्यवसानं विशेषणप्रक्षेपपरम्परायाः । न च वाच्यं स्मृतित्वसंसर्गस्य न संसर्गान्तरेण सम्बन्धित्वं किन्तु स्वभावत एव, तत् कुतः परम्परागवेषणं कार्यमिति । स्मृतित्वसंसर्गस्यान्योन्याभावमादाय समर्थन—यहाँ स्मृतित्वाभाव से स्मृतित्व के संसर्गाभाव का ग्रहण है । खंडन— यह तुम नहीं कह सकते; क्योंकि स्मृतित्व का संसर्गाभाव क्या स्मृतित्व- विशिष्टसंसर्गाभाव है, संसर्गविशिष्ट स्मृतित्वाभाव है या इस वाक्य-रचना से और ही कुछ ? यदि स्मृतित्व का संसर्गाभाव अभिप्रेत हो, तो स्मृतित्व-संसर्ग का अन्योन्याभाव भी स्मृति में है ही । अतः स्मृति में प्रमालक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि स्मृतित्वसंसर्ग स्मृति नहीं है । इसीलिए द्वितीयपक्ष भी युक्त नहीं है; क्योंकि संसर्गविशिष्ट स्मृतित्वव्यक्ति भी स्मृति नहीं है । अतः संसर्गविशिष्ट स्मृतित्व के साथ स्मृति-व्यक्ति के अन्योन्याभाव का ग्रहणकर स्मृति-व्यक्ति में पुनः अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—स्मृतित्व-संसर्ग का संसर्गाभाव ही स्मृतित्वरहितत्व है । स्मृतित्व-संसर्ग का संसर्गाभाव स्मृतिव्यक्ति में नहीं है, क्योंकि स्मृति में स्मृतित्व-संसर्ग ही है । अतः स्मृति में अनुभूतिलक्षण की अतिव्याप्ति नहीं है । खंडन—स्मृतित्व-संसर्ग का संसर्गाभाव इस शब्द से भी यदि संसर्ग का अभाव ही अभिप्रेत है, तो फिर भी स्मृतित्व-संसर्ग के अन्योन्याभाव का ग्रहणकर स्मृति में अतिव्याप्ति ही है । इस तरह अपर-अपर संसर्ग का निवेश करें, तो अनवस्था या अन्तिम संसर्ग का अन्योन्याभाव लेकर अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—स्मृतित्व का संसर्ग ( समवाय ) अन्य संसर्ग से नहीं, किन्तु स्वभाव- स्वरूप सम्बन्ध से ही संबद्ध है । अतः संसर्ग-परम्परा का गवेषण न होने से अनवस्था