खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] भेद-संसर्गाभाव का भेद-खण्डन १३६ एतेन विलक्षण एवायमभावो भावसहासनाननुवेशी य एवकारसमभिव्या- हारेणोच्यत इति निरस्तम् । तस्यापि वैलक्षण्यं प्रतियोग्याश्रयनिषेधतासाम्येऽपि सामानाधिकरण्यविरहादुन्नेयम्, तच्च तुल्यमभावान्तरेण । सामानाधिकरण्याभावप्रत्ययेनेति चेन्न । प्रत्ययविशेषकस्यार्थस्य स्मृतावपि भावात् । 'अन्योन्याभावव्यतिरिक्तः स्मृतित्वाभावः' इत्युक्तौ च स्मृतिव्यति- रिक्तपक्षोक्त एव दोषः । तदाऽऽस्तां विस्तरः । नापि स्मृतित्वप्रतियोगिकमाश्रयस्य स्वरूपं तद्धीर्वेति पक्षः, अन्योन्याभावेऽपि भवतामभावव्यवस्थायास्तादृशत्वेन उक्तप्रसङ्गस्य समानत्वात् । समर्थन—भाव के साथ एक अधिकरण में न रहनेवाला तथा अन्योन्याभाव से विलक्षण ही यह अत्यन्ताभाव है, जो एवार्थक ‘ही’ शब्द की सन्निधि में प्रतीत होता है । अर्थात् ‘जहाँ स्मृति का अभाव ही हो’ इस वाक्य का यह अर्थ हुआ कि जहाँ स्मृतित्व का अत्यन्ताभाव हो । अतः अन्योन्याभाव का ग्रहणकर स्मृति में अतिव्याप्ति नहीं है । खण्डन—अत्यन्ताभाव का अन्योन्याभाव के साथ प्रतियोगिकृत, अधिकरणकृत या स्वरूप- कृत वैलक्षण्य तो है नहीं । फिर यदि केवल प्रतियोगी के साथ असामानाधिकरण्य होने से ही वैलक्षण्य का अनुमान करें, तो वह हो नहीं सकता; क्योंकि अन्योन्याभाव में भी उक्त रीति से असामानाधिकरण्य दिखाया जा चुका है । अर्थात् ‘भावसामानाधिकरण्यं न अन्योन्याभावः’ इस प्रतीति से सिद्ध अन्योन्याभावरूप असामानाधिकरण्य अन्योन्याभाव में भी है। अतः असामानाधिकरण्यमात्र से अभावों में वैलक्षण्य का ज्ञान नहीं हो सकता । समर्थन—अत्यन्ताभाव में प्रतियोगी के साथ असामानाधिकरण्य की प्रतीति होती है, अतः उक्त प्रतीति से ही वैलक्षण्य की अनुमिति क्यों न हो ? खण्डन—‘असामानाधि- करण्य’रूप विषय के वैलक्षण्य से ही उक्त प्रतीति में वैलक्षण्य है और वह असामाना- धिकरण्य अन्योन्याभाव में भी है। अतः प्रतीति से भी दोनों अभावों में भेद न होने से अन्योन्याभाव का ग्रहणकर स्मृति में अतिव्याप्ति तदवस्थ ही है । समर्थन—‘जिस ज्ञान में अन्योन्याभाव से भिन्न स्मृतित्वाभाव रहता हो, वह ज्ञान अनुभूति है’, ऐसा लक्षण करेंगे, तो अन्योन्याभाव का ग्रहणकर स्मृति में अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—जबतक दोनों अभावों का भेद सिद्ध न हो, तबतक ऐसा लक्षण करने से कुछ लाभ नहीं । किञ्च—यदि ‘यत्किञ्चित् अन्योन्याभाव से भिन्न’ कहें, तो एक अन्योन्याभाव से भिन्न दूसरा अन्योन्याभाव है, अतः उसे ही ग्रहणकर अतिव्याप्ति हो जायगी। यदि ‘सभी अन्योन्याभावों का भेद’ निवेश करें, तो अन्योन्याभाव लेकर दोष तो होगा नहीं, किन्तु हम लोगों को सभी अन्योन्याभावों का ज्ञान न होने से लक्षण ही असिद्ध हो जायगा, कारण सामान्यलक्षणा का तो पहले ही खण्डन हो चुका है । अतः