भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 157

१४० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [प्रथम अथान्यदेव किञ्चित्संसर्गाभावनिर्वचनं क्रियते । तथा हि—स्मृतित्वस्य यत्र संसर्गितया निषेधस्तत्र तदभावस्य संसर्गाभावत्वम् । यत्र तु तदात्मत्वेन, तत्र तद- भावस्य न संसर्गाभावता, किन्तु अन्योन्याभावत्वमेव । स च इह न विवक्षितः , पूर्व एव तु संसर्गाभावो विवक्षित इति । नैतद्विचारसहम् । ‘संसर्गितया निषेधः' इति येयं तृतीया सा लक्षणे वा, सहियोगे वा, कारकभेदे वा करणादौ ? नाद्यः ; संसर्गितया लक्षितस्यैवान्योन्या- भावमादाय प्रसङ्गात् । नापि द्वितीयः ; तत्सहितस्यैवान्योन्यनिषेधस्य प्रत्याख्यातु- मशक्यत्वात् । तृतीयस्तु न सम्भवति ; अत्यन्तनिषेधस्यानुत्पत्तिधर्मकत्वात्, तस्य च प्रकृतोदाहरणत्वात् । प्रकारवाचिनीयं तृतीयेति चेन्न । प्रकारशब्दार्थस्याधिकस्य निर्वक्तव्यत्वापातात् । निखिल अन्योन्याभावों की प्रमिति में अब कोई प्रमाण है ही नहीं । तस्मात् विस्तार से कोई इष्टसिद्धि नहीं, इसलिए अब अधिक विस्तार न किया जाय । समर्थन—जिस अधिकरण में स्मृतित्व के अभाव का ज्ञान होता हो, उस अधि- करण का स्वरूप या ज्ञान ही स्मृतित्वाभाव है। वह अनुभूति में ही है, स्मृति में नहीं; अतः अतिव्याप्ति नहीं है । खंडन—तब तो आप स्मृतित्व के अन्योन्याभाव को भी स्मृतित्व का अभेदज्ञान जिस आश्रय में हो, उस आश्रय का स्वरूप या ज्ञान-स्वरूप ही मानेंगे । अतः इन पक्षों में भी स्मृति में अतिव्याप्ति वैसी ही बनी हुई है । समर्थन—हम संसर्गाभाव का अलग ही निर्वचन करेंगे । सुनिये—जहाँ स्मृतित्व का संसर्गितया निषेध हो, वहाँ स्मृतित्व का संसर्गाभाव है । जहाँ स्मृतित्व का तादात्म्येन निषेध हो, वहाँ स्मृतित्व का संसर्गाभाव नहीं, किन्तु अन्योन्याभाव ही है । उक्त लक्षण में अन्योन्याभाव नहीं, संसर्गाभाव ही विवक्षित है । अतः स्मृति में अति- व्याप्ति नहीं है । खंडन—'संसर्गितया निषेधः' इस पद में तृतीया-विभक्ति का क्या अर्थ है--लक्षण, सहयोग, करण या प्रकार ? इनमें प्रथम और द्वितीय पक्ष उचित नहीं हैं, क्योंकि संस- र्गिता से उपलक्षित या संसर्गिता के साहित्य से युक्त स्मृतित्व के अन्योन्याभाव को ग्रहण- कर पूर्ववत् अतिव्याप्ति हो जायगी । तृतीय कल्प भी युक्त नहीं है; क्योंकि अत्यन्ताभाव के नित्य होने से संसर्गिता उसका करण (कारक) नहीं हो सकता । चतुर्थ पक्ष भी उचित नहीं है; क्योंकि यदि संसर्गिता ही प्रकार है, तो उससे युक्त स्मृतित्व का अन्योन्याभाव ग्रहणकर स्मृति में ही अतिव्याप्ति है । यदि संसर्गिता से अन्य कोई प्रकार हो, तो उसका निर्वचन (लक्षण) कीजिये ।