भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 158

परिच्छेद ] स्मृति-लक्षण-का खण्डन १४१ प्रकारः प्रकार एवेति चेन्न । अविदितलक्ष्यस्य लक्षणमनभिधाय इतरव्य- वच्छेदेन तस्य दर्शयितुमशक्यत्वात् । अन्यथा सर्वत्र प्रष्टारं प्रति लक्षणानभिधा- नापातात् । ‘को घटः’ इत्यादिपृष्टे ‘घट एव घटः’ इत्याद्येवोत्तरं सङ्गच्छेत । ‘प्रकार एवेति पक्षो नोपपन्नः, सदोषत्वादिति वक्ता ‘को दोषः’ इत्यनुयुक्तः ‘दोष एव दोषः’ इत्यभिधायैव च निर्वृतो भवेदिति । स्मृति-लक्षण खण्डनम् स्मृतित्ववत् ‘स्मृतेर्लक्षणान्तरेण रहितत्वमनुभूतित्वमिति प्रत्युक्तं वेदितव्यम् । ‘गृहीतस्य हि ज्ञानं स्मृतिरिति च स्मृतिलक्षणे धारावाहिकज्ञानेऽतिप्रसक्तिः । समर्थन—‘प्रकार’ शब्द का अर्थ प्रसिद्ध है, अतः उसके निर्वचन की आवश्यकता ही नहीं। किन्तु प्रकार ही प्रकार है। खंडन—जो लोग प्रकाररूप लक्ष्य को ही नहीं जानते, उन्हें आप बिना लक्षण किये इतरव्यावृत्तरूप लक्ष्य का स्वरूप ही दिखा नहीं सकते। यदि आप लक्षण न करके भी लक्ष्य को इतर-व्यावृत्त रूप से दिखा सकें, तो प्रष्टा के बोध के लिए सर्वत्र लक्षण करना व्यर्थ ही हो जायगा । किञ्च—यदि कोई प्रश्न करे कि ‘घट क्या है’, तो इस पर ‘घट एवं घटः’ यह उत्तर ही पूर्ण सङ्गत हो जायगा । किञ्च—‘प्रकार-पक्ष युक्त नहीं है, सदोष होने से’ यह कहनेवाला ‘क्या दोष है’ यह पूछे जाने पर ‘दोष ही ‘दोष है’ यह कहकर ही विजय प्राप्तकर प्रसन्न हो जायगा । स्मृति-लक्षण का खण्डन इसी तरह यदि आप ‘स्मृतिलक्षणरहितत्वे सति ज्ञानत्वमनुभूतित्वम्’ यह अनुभूति का लक्षण करें, तो वह भी नहीं हो सकता । कारण जैसे ऊपर ‘स्मृतिरहितत्वे सति ज्ञानत्वम्’ इस लक्षण में स्मृतित्व का अन्योन्याभाव लेकर स्मृति में अतिव्याप्ति दी गयी है, वैसे ही यहाँ भी स्मृति-लक्षण का अन्योन्याभाव लेकर स्मृति में ही अतिव्याप्ति हो जायगी। किञ्च—स्मृति का लक्षण न होने से ‘स्मृतिलक्षणरहितत्वे सति ज्ञानत्वमनुभूतित्वम्’ यह लक्षण भी अयुक्त है। निर्वचन-कर्ता—गृहीत (ज्ञात) का ज्ञान ही स्मृति है। खंडन—ऐसा लक्षण करने पर धारावाहिक ज्ञान में पूर्व-पूर्व ज्ञान से गृहीत विषय उत्तर-उत्तर ज्ञान का विषय होने से उत्तरज्ञान में अतिव्याप्ति हो जायगी।