खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम किं तदिति चेत्; स्वात्मनैवात्र प्रश्ने दीयतामुत्तरं भवता, येन नियतेषु प्रमाराशिष्वेवेदं ज्ञानमन्तर्भाव्यम्, प्रमासामान्यलक्षणेन वा व्यवच्छेत्तव्यम् । एवं लिङ्गाभासादिभ्योऽपि जातं लिङ्गिज्ञानं दैवगत्या स्थितलिङ्गि लिङ्गिनि लिङ्गिन्यत्येव वा यत् स्यात्तत्तु यद्यपि लिङ्गाभासे न प्रमा, न वा तद्वति लिङ्गि- स्वरूपे; तथापि विशिष्टं तथाविधं गोचरयन्त्यास्तस्या बुद्धेर्लिङ्गान्तरवति केवले वा लिङ्गिनि वह्न्यादावप्यंशे विषये प्रामाण्यस्वीकारेण उक्तदोषापरिहारादिति । आभासकरणजत्वात्तद्विषयस्य वस्तुभूतात् लिङ्ग्यादेरन्यत्वमेवेति चेन्न । विशेषस्यान्यत्वेऽपि तज्जातीयमात्रवत्त्वावभासांशे दोषापरिहारात् । प्रश्न—वह कारण क्या है ? अर्थात् जब उसका प्रत्यक्ष ही नहीं होता, तो वह है ही नहीं । उत्तर—जब उसका कार्य यथार्थज्ञान है, तो कारण का अनुमान करना चाहिए । अनुपलब्धि से अभाव का निश्चय करना उचित नहीं है, क्योंकि अयोग्य में अनुपलब्धि से अभाव का निश्चय नहीं हो सकता । अथवा आप ही इस प्रश्न का उत्तर दीजिये, जिससे प्रत्यक्षादि स्वीकृत प्रमासमूह में इसका अन्तर्भाव हो या प्रमा के 'तत्त्वानुभूतिः प्रमा' इस सामान्यलक्षण से व्यावृत्ति हो सके । इसी तरह धूलिपटल में धूमभ्रम के बाद वह्निज्ञान दैववश हेतु-साध्ययुक्त या साध्ययुक्त अधिकरण में ही होता है । यद्यपि वह हेत्वाभास-अंश में प्रमा नहीं है और न हेत्वाभास से विशिष्ट साध्य-अंश में ही प्रमा है, तथापि सभी लोग हेतुविशिष्ट साध्य को विषय करनेवाली उस बुद्धि का अन्य हेतु से विशिष्ट साध्य-अंश में अथवा केवल वह्निरूप साध्य-अंश में प्रामाण्य का स्वीकार करते हैं। अतः वहाँ प्रमालक्षण की अति- व्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'आभास-करण से जन्य ज्ञान का विषय वह्नि परमार्थ वह्नि से अन्य है, आभास-करणजन्य होने से, प्रत्यक्ष-भ्रम के विषयवत्' इस अनुमान से उक्त ज्ञान के अतत्त्वविषयक होने के कारण प्रमालक्षण की अतिव्याप्ति नहीं है। खंडन—यदि वह्नि- अंश में वह्नि का ज्ञान अन्यविषयक हो, तो वास्तविक धूम से जो वह्नि का ज्ञान होता है, वह भी अन्यविषयक क्यों न हो ? यदि किसी प्रकार अन्यविषयक मान भी लें, तो भी व्यक्ति-अंश में अन्यविषयक होने पर भी जाति-अंश में सत्त्व-विषयक होने से इस अंश में अतिव्याप्ति बनी ही रहेगी ।