खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] तत्त्वानुभवत्व का खण्डन १४७ सामान्यसम्बन्धकोटिनिविष्टत्वाद् विशेषस्य, तस्य च तत्रानवस्थितस्यैव स्फुरणान्नैक दोष इति चेन्न । विशेषाप्रतिभासे सामान्यतस्तन्मात्रवत्ताप्रतिभासस्यापि अभ्युपेयत्वात्, देवदत्तयज्ञदत्तसम्बन्धितासंशयेऽपि पुरुषसम्बन्धितानिश्चयवत् । सम्बन्धिविशेषस्य निर्लुठितविशेषरूपतया च प्रवेशे व्याप्यादेरननुगमप्रसङ्गात् । सामान्यानुमानाभासे च संवादिनि विशेषान्यवत्ताकल्पनानवकाशात् । सामान्यसमवाययोरप्यन्ययोरेव प्रतिभासे अन्यथाख्यातिं विहाय असत्ख्याति- प्रवेशापातात् । तत्रत्यधर्मान्तरस्य जात्या तादात्म्यारोपस्तत्रेति चेन्न । तथापि धर्मिणि जातौ च प्रमात्वतादवस्थ्यात्; संसर्गरोपनिमित्ताच्च तादात्म्यारोपानुपपत्तेः । प्रश्न—यदि धूलिपटल में ज्ञात धूम से जायमान अनुमिति में परमार्थ वह्नि नहीं भासता, तो सामान्य भी असत् ही भासता है; क्योंकि सामान्य के सम्बन्ध की एक कोटि में विशेष है और वह (विशेष) उक्त ज्ञान में असत् ही भासता है । फिर सामान्य सत् कैसे भासेगा ? उत्तर---विशेषरूप से व्यक्ति का भान न होने पर भी सामान्यरूप से व्यक्ति का भान स्वीकार किया जाता है । वह व्यक्ति सत् भासती है या असत्, यह आग्रह नहीं । यह भी निश्चय (नियम) नहीं कि व्यक्ति असत् भासे, तो सामान्य भी असत् ही भासे । केवल यही नियम है कि निर्विशेष सामान्य नहीं भासता, जैसे कि माला में देवदत्त-निर्मितत्व, यज्ञदत्त-निर्मितत्व के विशेषरूप से अज्ञात होने पर भी पुरुष-निर्मितत्व का ज्ञान होता है । यदि सामान्यमात्र-प्रकारक ज्ञान न हो, केवल विशेष- विषयक ही ज्ञान हो, तो व्याप्ति का अनुगम (ज्ञान) नहीं होगा । किञ्च, जहाँ गौ के गले में बद्ध पट में सास्ना-भ्रम के बाद 'अयं गौः सास्नावत्त्वात्' ऐसी गोत्वानुमिति होती है, वहाँ गोत्व-जाति के एक होने से 'अन्य ही गोत्व भासता है' यह कहा नहीं जा सकता । प्रश्न—यहाँ भी अन्यरूपमें सामान्य (गोत्व) या उसका समवाय ही भासता है, ऐसा क्यों न माना जाय ? उत्तर-गोत्व और समवाय अन्य हैं ही नहीं । अतः यदि उस अलीक अन्यपदार्थ का भी भान मानें, तो अन्यथाख्याति को त्याग असत्ख्याति का स्वीकार होगा, जो आपके लिए अपसिद्धान्त हो जायगा । प्रश्न—'अयं गौः' इस अनुमिति-स्थल में गोनिष्ठ रूपादि में गोत्व का तादात्म्य भासता है, ऐसा ही क्यों न मानें ? उत्तर-यदि ऐसा मान लें, तो भी उक्त अनुमिति तादात्म्यांश-मात्र में भ्रम होगी । धर्मी 'गौ' और जाति 'गोत्व' अंश में प्रमा ही है, अतः