भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 166, कुल 610 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 166

परिच्छेद ] | याथार्थ्य का खण्डन | १४६

वा स्यात् ? नाद्यः ; पूर्वं निरस्तत्वात् । नापि द्वितीयः ; व्यभिचारिणोऽपि प्रमेयत्वा- दिना अर्थसादृश्येन प्रमात्वापातात् । ननु ज्ञानविषयीकृतेन रूपेण सादृश्यमिदं विवक्षितम् । न च प्रमेयत्वादि- रूपस्य व्यभिचारिण्यपि प्रकाशनसम्भवेन तथाप्यतिप्रसङ्ग इति वाच्यम् । प्रमेय- त्वाद्यंशे प्रकाशमाने विषयीभूतधर्मान्तरापेक्षया व्यभिचारिणोऽपि प्रमात्वाभ्युपगमा- दिति । नैतद्युक्तम्; प्रकाशमानेन रूपादिसमवायित्वेन रूपेण ज्ञानस्य अर्थसादृश्या- नभ्युपगमेऽपि तत्र तदीयप्रमात्वाङ्गीकारादिति । प्रकाशमानेन रूपेण विशेषणभावादर्थसादृश्यमनुभवस्य विवक्षितम् । अर्थस्य हि यथा समवायाद्रूपं विशेषणीभवति, तथा विषयभावाद् ज्ञानस्यापि तद्विशेषणं

कारण 'अर्थमनतिक्रम्य वर्तते इति यथार्थम्' इस व्युत्पत्ति से 'यथार्थ' शब्द का यदि 'अर्थविषयकत्व' अर्थ करें, तो 'अर्थ' और 'तत्त्व' पर्यायवाची शब्द ह ने से तत्त्वविषय- कत्व के पूर्वोक्त खण्डन से यह भी खण्डित ही है । 'अर्थस्य सादृश्यं यथार्थम्' इस व्युत्पत्ति से 'अर्थसदृश' यह अर्थ करें, तो 'इदं रजतम्' यह भ्रम भी प्रमेयत्व रूप से शुक्ति या रजतत्व के सदृश है, अतः उसमें अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—यहाँ सादृश्यज्ञान विषयत्वेन विवक्षित है । एवञ्च 'इदं रजतम्' इस भ्रम के विषय में प्रमेयत्व से सादृश्य होने से वहाँ भी अतिव्याप्ति नहीं होगी । यदि कहें कि ऐसा निवेश करने पर 'इदं रजतं प्रमेयम्' इस भ्रम-ज्ञान के विषय प्रमेयत्व धर्म से सादृश्य का ग्रहणकर पुनः अतिव्याप्ति हो जायगी, तो वह ठीक नहीं । कारण प्रमेयत्व अंश में वह ज्ञान प्रमा ही है और रजतांश में प्रमेयत्वेन सादृश्य का ग्रहण ही नहीं है। अतः वहाँ अतिव्याप्ति नहीं है । खंडन—'रूपसमवायी घटः' इस ज्ञान में रूपसमवायरूप से घट का सादृश्य-ज्ञान न होने पर भी इस ज्ञान को प्रमा मानते हैं, अतः लक्षण की उक्त ज्ञान में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—ज्ञानविषयतया विशेषणत्वरूप सम्बन्ध से अर्थ का सादृश्य ज्ञान में विवक्षित है । जैसे घटरूप अर्थ में रूप समवाय सम्बन्ध से विशेषण है, वैसे ही ज्ञान में भी विषयता सम्बन्ध से विशेषण है; अतः अव्याप्ति नहीं है। खण्डन—ऐसा करनेपर 'इदं रजतम्' इस ज्ञान में अतिव्याप्ति हो जायगी, कारण पुरोवर्तित्व ( इदन्त्व ) समवाय

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक) · पृष्ठ 166, कुल 610 में से · BharatKosha