भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 167

१५० सानुवाद-खण्डनखण्डखाद्ये [ प्रथम भवत्येवेति चेन्न । एवं हि पुरोवर्तित्वादिना रूपेण तथाभावसम्भवात् पुरोवर्तिनीं शुक्तिं रजततयाऽवगाहमानं ज्ञानं प्रमा स्यात् । न च वाच्यमिष्यत एव सा प्रमाऽपीति न व्यभिचारचोदनेयं युक्तिमतीति ; यथार्थताविशेषणवैयर्थ्यप्रसङ्गात् । 'अनुभूतिः प्रमे'त्युक्त एव हि तावन्नास्त्यति- प्रसङ्गः ; सर्वस्य व्यभिचार्यनुभवस्य ( अन्ततोऽन्यथाख्यातिवादिनये ) धर्मिण्यपि प्रमात्वसम्भवेन प्रमायामेव अनुभवत्वस्य स्थैर्यात् । यदि तु अंशतोऽपि व्यभिचारिण्यां मा लक्षणं गमदिति चेतसि निधाय यथार्थत्वं विशेषणं प्रयुक्तम् ; तदा न युक्तम्, उक्तदोषात् । अथोच्यते--प्रकाशमानेन रूपेण सर्वेण विशेषणभावात् यस्यानुभवस्यार्थ- सादृश्यं सा प्रमा। न च तावता धर्मिणो धर्म्यविशेषणतया दोषः, तस्यापि तद्विषयान्तरव्यवच्छेदकत्वादिति । या स्वरूप-सम्बन्ध से जैसे इदमंश ( शुक्ति में ) विशेषण है, वैसे ही ज्ञान में भी विषयता सम्बन्ध से विशेषण है । समर्थन—'इदं रजतम्' यह ज्ञान प्रमा भी है; अतः वहाँ लक्षण का जाना भूषण ही है, दूषण नहीं । खंडन —यदि 'इदं रजतम्' यह भ्रम भी लक्ष्य ही मानें, तो यथार्थ विशेषण व्यर्थ हो जायगा । 'अनुभवः प्रमा' यह कहने पर भीकोई दोष नहीं है । कारण अन्यथा- ख्यातिवादी के मत में सम्पूर्ण व्यभिचारी अनुभव (भ्रम) के अन्ततः धर्मी-अंश में प्रमा होने से अनुभवमात्र प्रमा ही है। यदि अंश से भी व्यभिचारी में लक्षण न जाय, इसलिए यथार्थत्व विशेषण दिया है, तो यह भी युक्त नहीं, कारण उक्त विशेषण देने पर भी पुरोवर्तित्वरूपेण अर्थ का साम्य होने से भ्रम में अतिव्याप्ति तदवस्थ ही है । समर्थन—अर्थ के यावत् विशेषण विषयता सम्बन्ध से जिस ज्ञान में हों, वह ज्ञान प्रमा है । भ्रम में विषयता सम्बन्ध से ज्ञान का विशेषण शुक्तिरूप अर्थ का विशेषण नहीं है, अतः अतिव्याप्ति नहीं । यह भी नहीं कह सकते कि विशेष्य रूप अर्थ ज्ञान का विशेषण है और वह 'स्व' का विशेषण नहीं है; क्योंकि विशेष्य भी स्वगत धर्म का विशेषण ( इतर से व्यावर्तक ) होता ही है, अतः अव्याप्ति नहीं है ।