खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 168, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] याथार्थ्य का खण्डन १५१ तर्हि व्यभिचारिज्ञानं धर्मिण्यपि प्रमा न स्यात्, सर्वात्मना सादृश्याभावात् । अव्यभिचारिणं चांशमननुरुद्ध्य तदीयाप्रमितिकोटिनिक्षेपसाहसिक्यादबिभ्यता किमव्यभिचार्यांशानुरोधेन व्यभिचार्यांशस्यापि प्रमाकोटिनिवेशनमेव नाध्यवसीयते भवता ? शक्यन्ते ह्यनुभूतित्वज्ञानत्वादयस्तादृशाभिप्रायाविरोधिनो लक्षणीकर्तुम् । यदि च बाध्यार्थांशा धीरबाध्यार्थांशेऽप्यप्रमैव, तदा सौधाग्रकुम्भादिवद् दूरत्वात् तुहिनद्युतिविद्युदादिपरमाणाग्रहणादवयविनं च तावत्परिमाणाग्रहणा- दल्पपरिमाणमुल्लिखत् प्रत्यक्षं प्रमात्वेन लोकप्रसिद्धमप्रमा स्यात् । क्व च लभ्यं देशकालालोकादिव्यक्तिसहितजलादिज्ञानस्य समस्ततावदर्थप्रवृत्तिसामर्थ्योदा- हरणम्, येन तत्प्रामाण्यं मन्यसे । खण्डन -- ऐसा निवेश होने पर व्यभिचारी ज्ञान ( भ्रम ) धर्मी-अंश में भी प्रमा नहीं होगा, कारण सर्वांश में अर्थ सदृश नहीं है । यदि आप अव्यभिचारी अंश का अनुरोध न कर व्यभिचारी अंश के अनुरोध से सर्वांश में भ्रमज्ञान को अयथार्थ कहने के साहस से न डरते हों, तो व्यभिचारी अंश का अनुरोध न कर अव्यभिचारी अंश के अनुरोध से सर्वांश में भ्रम को प्रमा ही मानने का अध्यवसाय क्यों नहीं करते ? इस अभिप्राय से तो प्रमा के ज्ञानत्व, अनुभूतित्व आदि लक्षण हो ही सकते हैं । किञ्च—यदि अंशतः बाधित बुद्धि अबाधित अंश में भी अप्रमा ही हो, तो चन्द्र, विद्युत् आदि अवयवी को अल्पपरिमाण बतलानेवाला प्रत्यक्ष भी अप्रमा होने लगेगा । कारण प्रासाद-शिखर पर स्थित कुम्भ की तरह दूर होने से उनके अन्य भागों का ग्रहण न हो सकेगा और उनका ग्रहण न होनेसे वास्तविक परिमाण का भी ग्रहण न होगा । इसीलिए उक्त अवयवियों की अल्पपरिमाणत्वेन प्रत्यक्षप्रमा ही होती है। एवञ्च लोक में धर्मी-अंश में प्रमात्वरूप से प्रसिद्ध यह ज्ञान भी अप्रमा हो जायगा । किञ्च—ज्ञान के विषय तो देश, काल, आलोक आदि व्यक्ति से युक्त जलादि यावद् वस्तुएँ हैं । किन्तु वे सभी अर्थ की विशेषण हैं, ऐसा कहीं भी नहीं मिलेगा । कारण ज्ञान के संपूर्ण विषय तभी अर्थ के विशेषण हो सकते, जब कि ज्ञान का विषय सब प्रकार से अबाधित होता । यह अबाधितता प्रवृत्ति-संवाद से गम्य है और सब प्रकारों में प्रवृत्ति-संवाद कहीं नहीं होता । अतः लक्षण में असंभव दोष हो जायगा ।