खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम यदि च बाध्यार्थांशे बाधादबाध्येऽप्यंशे तद्बोधमिथ्यात्वं समर्थयसे, तदा यदर्थजातीयं बाध्यं तदर्थजातीयमबाध्यमपि मिथ्येति मन्यमाने किमुत्तरं ते स्यात्, अन्यत्र लोकप्रसिद्धभ्रमोदाहरणत्यागात् । अथोच्यते—प्रकाशमानेन रूपेण विशेषणतया यदर्थसाम्यमनुभवस्य तत्र प्रमात्वमिति विषयविशेषनियमेनैव प्रमात्वं लक्षणीयमित्येतदर्थमेव यथार्थविशेषणोपादानमिति । मैवम्; विशेष्यांशेऽप्यनुभूतिरेवं प्रमा न स्यादिति । व्यवच्छेदकत्वं विशेषणत्वमभिमतं धर्म्यपि च स्वसम्बन्धाद्धर्मं विशिनष्टीति नोक्तदोष इत्युक्तमेवेति चेन्न । विशिष्टे प्रमात्वाभावापत्तेः । अपि च—एवं तर्हि रजतत्वादिकमपि व्यवच्छिनत्त्येव शुक्तिकाम्, या रजततया प्रकाशिता शुक्तिव्यक्तिः सेयमिति । प्रमा-लक्षण के प्रसिद्ध उदाहरण चन्द्रादि-ज्ञान के होते भी एक अंश में बाधित होने से यदि आप अबाधित अंश में भी ज्ञान को अप्रमा नमाते हैं, तो कोई पुरुष यह संदेह करे कि यज्जातीय एक स्थल में बाधित हो, तज्जातीय सर्वत्र बाधित क्यों न हो ? अर्थात् रजतत्व शुक्ति-रजत के ज्ञानस्थल में बाधित है, तो सत्यरजत के ज्ञानस्थल में बाधित क्यों न माना जाय, ऐसा यदि कोई पूछे, तो आप इससे अन्य क्या उत्तर देगे कि ‘प्रसिद्ध उदाहरण को त्यागना पड़ेगा ।’ समर्थन—जिस-ज्ञान का जो विषय अर्थ का विशेषण हो, वह ज्ञान उस विषय में प्रमा है । ज्ञान का विषय रजतत्व शुक्ति में विशेषण नहीं है, अतः उस अंश में ‘इदं रजतम्’ यह ज्ञान अप्रमा है। ज्ञान का विषय इदन्त्व शुक्ति में विशेषण है; अतः उस अंश में प्रमा है । इस तरह विषय-विशेष से नियत प्रमा का लक्षण करने के लिए ही लक्षण में यथार्थत्व का निवेश है । खंडन—ऐसा लक्षण करने पर ज्ञान का विषय विशेष्य अर्थ में विशेषण नहीं है । अतः विशेष्यांश में ज्ञान अप्रमा हो जायगा । समर्थन -- इतरव्यावर्त्तक को ही विशेषण कहते हैं । विशेष्य भी ‘स्व’ में स्थित धर्मी (विशेषणों) का विशेषण है; कारण यदि धर्मी को धर्म का विशेषण न मानें, तो धर्म-अंश में ज्ञानमात्र निर्विकल्पक हो जायँगे । खण्डन—विशिष्ट किसी अर्थ में विशेषण नहीं है, अतः विशिष्ट अंश में ज्ञान अप्रमा हो जायगा ।