खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
१५० सानुवाद-खण्डनखण्डखाद्ये [ प्रथम भवत्येवेति चेन्न । एवं हि पुरोवर्तित्वादिना रूपेण तथाभावसम्भवात् पुरोवर्तिनीं शुक्तिं रजततयाऽवगाहमानं ज्ञानं प्रमा स्यात् । न च वाच्यमिष्यत एव सा प्रमाऽपीति न व्यभिचारचोदनेयं युक्तिमतीति ; यथार्थताविशेषणवैयर्थ्यप्रसङ्गात् । 'अनुभूतिः प्रमे'त्युक्त एव हि तावन्नास्त्यति- प्रसङ्गः ; सर्वस्य व्यभिचार्यनुभवस्य ( अन्ततोऽन्यथाख्यातिवादिनये ) धर्मिण्यपि प्रमात्वसम्भवेन प्रमायामेव अनुभवत्वस्य स्थैर्यात् । यदि तु अंशतोऽपि व्यभिचारिण्यां मा लक्षणं गमदिति चेतसि निधाय यथार्थत्वं विशेषणं प्रयुक्तम् ; तदा न युक्तम्, उक्तदोषात् । अथोच्यते--प्रकाशमानेन रूपेण सर्वेण विशेषणभावात् यस्यानुभवस्यार्थ- सादृश्यं सा प्रमा। न च तावता धर्मिणो धर्म्यविशेषणतया दोषः, तस्यापि तद्विषयान्तरव्यवच्छेदकत्वादिति । या स्वरूप-सम्बन्ध से जैसे इदमंश ( शुक्ति में ) विशेषण है, वैसे ही ज्ञान में भी विषयता सम्बन्ध से विशेषण है । समर्थन—'इदं रजतम्' यह ज्ञान प्रमा भी है; अतः वहाँ लक्षण का जाना भूषण ही है, दूषण नहीं । खंडन —यदि 'इदं रजतम्' यह भ्रम भी लक्ष्य ही मानें, तो यथार्थ विशेषण व्यर्थ हो जायगा । 'अनुभवः प्रमा' यह कहने पर भीकोई दोष नहीं है । कारण अन्यथा- ख्यातिवादी के मत में सम्पूर्ण व्यभिचारी अनुभव (भ्रम) के अन्ततः धर्मी-अंश में प्रमा होने से अनुभवमात्र प्रमा ही है। यदि अंश से भी व्यभिचारी में लक्षण न जाय, इसलिए यथार्थत्व विशेषण दिया है, तो यह भी युक्त नहीं, कारण उक्त विशेषण देने पर भी पुरोवर्तित्वरूपेण अर्थ का साम्य होने से भ्रम में अतिव्याप्ति तदवस्थ ही है । समर्थन—अर्थ के यावत् विशेषण विषयता सम्बन्ध से जिस ज्ञान में हों, वह ज्ञान प्रमा है । भ्रम में विषयता सम्बन्ध से ज्ञान का विशेषण शुक्तिरूप अर्थ का विशेषण नहीं है, अतः अतिव्याप्ति नहीं । यह भी नहीं कह सकते कि विशेष्य रूप अर्थ ज्ञान का विशेषण है और वह 'स्व' का विशेषण नहीं है; क्योंकि विशेष्य भी स्वगत धर्म का विशेषण ( इतर से व्यावर्तक ) होता ही है, अतः अव्याप्ति नहीं है ।
परिच्छेद ] याथार्थ्य का खण्डन १५१ तर्हि व्यभिचारिज्ञानं धर्मिण्यपि प्रमा न स्यात्, सर्वात्मना सादृश्याभावात् । अव्यभिचारिणं चांशमननुरुद्ध्य तदीयाप्रमितिकोटिनिक्षेपसाहसिक्यादबिभ्यता किमव्यभिचार्यांशानुरोधेन व्यभिचार्यांशस्यापि प्रमाकोटिनिवेशनमेव नाध्यवसीयते भवता ? शक्यन्ते ह्यनुभूतित्वज्ञानत्वादयस्तादृशाभिप्रायाविरोधिनो लक्षणीकर्तुम् । यदि च बाध्यार्थांशा धीरबाध्यार्थांशेऽप्यप्रमैव, तदा सौधाग्रकुम्भादिवद् दूरत्वात् तुहिनद्युतिविद्युदादिपरमाणाग्रहणादवयविनं च तावत्परिमाणाग्रहणा- दल्पपरिमाणमुल्लिखत् प्रत्यक्षं प्रमात्वेन लोकप्रसिद्धमप्रमा स्यात् । क्व च लभ्यं देशकालालोकादिव्यक्तिसहितजलादिज्ञानस्य समस्ततावदर्थप्रवृत्तिसामर्थ्योदा- हरणम्, येन तत्प्रामाण्यं मन्यसे । खण्डन -- ऐसा निवेश होने पर व्यभिचारी ज्ञान ( भ्रम ) धर्मी-अंश में भी प्रमा नहीं होगा, कारण सर्वांश में अर्थ सदृश नहीं है । यदि आप अव्यभिचारी अंश का अनुरोध न कर व्यभिचारी अंश के अनुरोध से सर्वांश में भ्रमज्ञान को अयथार्थ कहने के साहस से न डरते हों, तो व्यभिचारी अंश का अनुरोध न कर अव्यभिचारी अंश के अनुरोध से सर्वांश में भ्रम को प्रमा ही मानने का अध्यवसाय क्यों नहीं करते ? इस अभिप्राय से तो प्रमा के ज्ञानत्व, अनुभूतित्व आदि लक्षण हो ही सकते हैं । किञ्च—यदि अंशतः बाधित बुद्धि अबाधित अंश में भी अप्रमा ही हो, तो चन्द्र, विद्युत् आदि अवयवी को अल्पपरिमाण बतलानेवाला प्रत्यक्ष भी अप्रमा होने लगेगा । कारण प्रासाद-शिखर पर स्थित कुम्भ की तरह दूर होने से उनके अन्य भागों का ग्रहण न हो सकेगा और उनका ग्रहण न होनेसे वास्तविक परिमाण का भी ग्रहण न होगा । इसीलिए उक्त अवयवियों की अल्पपरिमाणत्वेन प्रत्यक्षप्रमा ही होती है। एवञ्च लोक में धर्मी-अंश में प्रमात्वरूप से प्रसिद्ध यह ज्ञान भी अप्रमा हो जायगा । किञ्च—ज्ञान के विषय तो देश, काल, आलोक आदि व्यक्ति से युक्त जलादि यावद् वस्तुएँ हैं । किन्तु वे सभी अर्थ की विशेषण हैं, ऐसा कहीं भी नहीं मिलेगा । कारण ज्ञान के संपूर्ण विषय तभी अर्थ के विशेषण हो सकते, जब कि ज्ञान का विषय सब प्रकार से अबाधित होता । यह अबाधितता प्रवृत्ति-संवाद से गम्य है और सब प्रकारों में प्रवृत्ति-संवाद कहीं नहीं होता । अतः लक्षण में असंभव दोष हो जायगा ।
१५२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम यदि च बाध्यार्थांशे बाधादबाध्येऽप्यंशे तद्बोधमिथ्यात्वं समर्थयसे, तदा यदर्थजातीयं बाध्यं तदर्थजातीयमबाध्यमपि मिथ्येति मन्यमाने किमुत्तरं ते स्यात्, अन्यत्र लोकप्रसिद्धभ्रमोदाहरणत्यागात् । अथोच्यते—प्रकाशमानेन रूपेण विशेषणतया यदर्थसाम्यमनुभवस्य तत्र प्रमात्वमिति विषयविशेषनियमेनैव प्रमात्वं लक्षणीयमित्येतदर्थमेव यथार्थविशेषणोपादानमिति । मैवम्; विशेष्यांशेऽप्यनुभूतिरेवं प्रमा न स्यादिति । व्यवच्छेदकत्वं विशेषणत्वमभिमतं धर्म्यपि च स्वसम्बन्धाद्धर्मं विशिनष्टीति नोक्तदोष इत्युक्तमेवेति चेन्न । विशिष्टे प्रमात्वाभावापत्तेः । अपि च—एवं तर्हि रजतत्वादिकमपि व्यवच्छिनत्त्येव शुक्तिकाम्, या रजततया प्रकाशिता शुक्तिव्यक्तिः सेयमिति । प्रमा-लक्षण के प्रसिद्ध उदाहरण चन्द्रादि-ज्ञान के होते भी एक अंश में बाधित होने से यदि आप अबाधित अंश में भी ज्ञान को अप्रमा नमाते हैं, तो कोई पुरुष यह संदेह करे कि यज्जातीय एक स्थल में बाधित हो, तज्जातीय सर्वत्र बाधित क्यों न हो ? अर्थात् रजतत्व शुक्ति-रजत के ज्ञानस्थल में बाधित है, तो सत्यरजत के ज्ञानस्थल में बाधित क्यों न माना जाय, ऐसा यदि कोई पूछे, तो आप इससे अन्य क्या उत्तर देगे कि ‘प्रसिद्ध उदाहरण को त्यागना पड़ेगा ।’ समर्थन—जिस-ज्ञान का जो विषय अर्थ का विशेषण हो, वह ज्ञान उस विषय में प्रमा है । ज्ञान का विषय रजतत्व शुक्ति में विशेषण नहीं है, अतः उस अंश में ‘इदं रजतम्’ यह ज्ञान अप्रमा है। ज्ञान का विषय इदन्त्व शुक्ति में विशेषण है; अतः उस अंश में प्रमा है । इस तरह विषय-विशेष से नियत प्रमा का लक्षण करने के लिए ही लक्षण में यथार्थत्व का निवेश है । खंडन—ऐसा लक्षण करने पर ज्ञान का विषय विशेष्य अर्थ में विशेषण नहीं है । अतः विशेष्यांश में ज्ञान अप्रमा हो जायगा । समर्थन -- इतरव्यावर्त्तक को ही विशेषण कहते हैं । विशेष्य भी ‘स्व’ में स्थित धर्मी (विशेषणों) का विशेषण है; कारण यदि धर्मी को धर्म का विशेषण न मानें, तो धर्म-अंश में ज्ञानमात्र निर्विकल्पक हो जायँगे । खण्डन—विशिष्ट किसी अर्थ में विशेषण नहीं है, अतः विशिष्ट अंश में ज्ञान अप्रमा हो जायगा ।
परिच्छेद ] याथार्थ्य का खण्डन १५३ ननु साक्षाद्विशेषणत्वं विवक्षितम् । रजतत्वं तु ज्ञानद्वारा शुक्तिविशेषणमिति नातिप्रसङ्गः । मैवम्, तर्हि 'दीर्घदण्डः पुरुषः' इत्यादौ ह्रस्वदण्डादिभ्यो वैलक्षण्ये विशेष्यस्यानुभूयमाने अनुभूतेर्न प्रमात्वं स्यात्, दीर्घत्वादेर्दण्डादिद्वारा विशेषणत्वा- दिति । ज्ञानरूपद्वारानपेक्षतया विशेषणत्वमिष्टमिति चेन्न । 'साक्षात्कृत' इत्याद्यव- गमानामप्रमात्वापातात् । तज्ज्ञानप्रकाशितरूपेण विशेषणत्वमिष्टमिति तु दूरं तुच्छम् ; रूपादेः समवायेन ज्ञानाविशेषकत्वात् । अर्थविशेषणत्वेऽयं नियमो यत्तज्ज्ञानप्रकाशितेन रूपेणेति, न तु ज्ञानेऽपीति चेन्न । तज्ज्ञानव्यक्तेरन्यत्र असम्भवेनासाधारण्यात् अव्यापकत्वादित्यलम् । किञ्च—‘रजतत्वेन शुक्तिं जानामि' इस ज्ञान में रजतत्व भी शुक्ति का विशेषण होता ही है। अतः 'इदं रजतम्' यह ज्ञान रजतत्व अंश में प्रमा होने से सर्वांश में भी प्रमा हो जायगा । समर्थन—‘जिस ज्ञान का जो विषय अर्थ का साक्षात् विशेषण हो' इत्यादि लक्षण करेंगे। एवञ्च उक्त ज्ञान में रजतत्व शुक्ति में साक्षात् विशेषण नहीं है, किन्तु ज्ञान द्वारा विशेषण है; अतः अतिव्याप्ति नहीं है । खंडन—'दीर्घदण्डः पुरुषः' इस ज्ञान के विशेष्य पुरुष में जहाँ ह्रस्वदण्ड से वैलक्षण्य अनुभूयमान है, वहाँ दीर्घत्व अंश में प्रमात्व नहीं होगा, कारण दीर्घत्व दण्ड द्वारा पुरुष का विशेषण है, साक्षात् नहीं है । समर्थन—‘जिस ज्ञान का जो विषय ज्ञानरूप द्वार की अपेक्षा न कर अर्थ का विशेषण हो' इत्यादि निवेश करेंगे, तो अतिप्रसंग नहीं होगा । खंडन—तब तो ‘साक्षात्कृतो घटः’ इस ज्ञान में साक्षात्त्व ज्ञान द्वारा घट में विशेषण होने से वह ज्ञान भी अप्रमा हो जायगा । समर्थन—‘जिस ज्ञान का जो विषय तद्ज्ञानविषयत्व सम्बन्ध से विशेषण हो' ऐसा कहें, तो कोई दोष न होगा। 'इदं रजतम्' इस ज्ञान का विषय रजतत्व समवाय सम्बन्ध से शुक्ति में विशेषण नहीं है। खंडन—तब तो 'रूपवान् घटः' इस ज्ञान में अव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि वहाँ ज्ञान में रूप समवाय सम्बन्ध से विशेषण नहीं है। यदि कहें कि 'ज्ञानविषयता संबन्ध से विशेषण हो' यह नियम अर्थ में विशेषण के लिए है, ज्ञान में तो विषयता सम्बन्ध से ही विशेषण अभिप्रेत है, तथापि यह लक्षण निर्दोष नहीं। कारण तब तो 'जिस ज्ञान का जो विषय तद्ज्ञानविषयतासंबन्ध से २०
१५४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम सम्यक्त्व-खण्डनम् सम्यक्परिच्छेदः प्रमेत्यपि न युक्तम् । न खलु सम्यक्त्वं तत्त्वविषयता, याथार्थ्यं वा सम्भवति ; उक्तदोषात् । ननु सामस्त्यं सम्यक्त्वमिष्टम् । अभिधीयते हि लोके—'न मया सम्यक् दृष्टम्, सामान्याकारेण तु उपलब्धमि'ति । तदिह समीचोऽर्थस्य परिच्छेदः सम्यक्- परिच्छेदः, सम्यगर्थविषयत्वाद्वा सम्यक्शब्दः परिच्छेदसमानाधिकरण एवायमिति । मैवम् । सामस्त्यमर्थस्य किं सर्वावयवसहितत्वम्, अथवा सर्वधर्मसहितत्वम् ? नाद्यः ; अनवयवपदार्थपरिच्छेदस्येव सावयवपदार्थपरिच्छेदस्यापि मध्यभागाद्य- अर्थ का विशेषण हो, वह ज्ञान उस अंश में प्रमा है' यह परिष्कृत लक्षण भी यत्-तत् घटित हो जायगा । अतः यत् शब्द को यदि एक ज्ञानव्यक्तिपरक मानें, तो जिस घटज्ञान व्यक्ति का यत् शब्द से ग्रहण करेंगे, वह पट में न होने से पट से व्यावृत होकर विषयता संबन्ध से केवल घट में ही रहेगी; इसलिए पटज्ञान में अव्याप्ति हो जायगी । यदि यत् शब्द से ज्ञानसामान्य का ग्रहण करें, तो 'रजतत्वेन शुक्तिं जानामि' इस ज्ञान में रजतत्व विशेषण होने से 'इदं रजतम्' यह ज्ञान भी प्रमा हो जायगा । किञ्च—यत् शब्द का निवेश भी व्यर्थ हो जायगा, कारण 'इदं रजतम्' इस ज्ञान में अतिव्याप्ति के वारणार्थ ही उसका निवेश है । किन्तु वह अतिव्याप्ति यत् शब्द का निवेश करने पर भी तदवस्थ ही है । सम्यक्त्व का खण्डन खंडन—'सम्यक्-परिच्छेद प्रमा है' यह लक्षण भी युक्त नहीं, कारण 'तत्त्वविष- यत्व' या 'याथार्थ्य'रूप सम्यक्त्व हो नहीं सकता, क्योंकि वह उक्त दोषों से खण्डित हो जाता है । समर्थन—इस लक्षण में सामस्त्यरूप सम्यक्त्व ही अभिप्रेत है । लोक में भी यही कहा जाता है कि 'मैंने सम्यक् अर्थात् समस्त रूपों से नहीं देखा, सामान्य आकार से देखा ।' तस्मात् समीचीन अर्थ का परिच्छेद ( अनुभव ) अथवा सम्यक् अर्थ को विषय करने से जो सम्यक् अनुभव है, उसी को 'सम्यक्-परिच्छेद' कह सकते हैं । खंडन—अर्थ में सामस्त्य क्या सर्वावयवसहितत्व है या सर्वधर्मसहितत्व ? यदि सर्वावयवसहितत्व कहें, तो निरवयव आकाशादि पदार्थों के परिच्छेदों तथा मध्यभाग को विषय न करनेवाले सावयव पदार्थों के परिच्छेदों में भी अव्याप्ति हो जायगी । यदि
परिच्छेद ] सम्यक्त्व का खण्डन १५५ विषयस्य अप्रमात्वापातात्। नापि द्वितीयः; असर्ववित्परिच्छित्तीनां सर्वासाम- प्रमात्वापत्तेः। अथ मन्यसे— सम्यक्शब्दः सविशेषार्थः। यदपि लोकेऽभिधीयते 'न मया सम्यक् दृष्टम्', तस्यापि न मया विशेषतो दृष्टमित्यर्थः। तस्माद्विशेषसहितधर्मि- परिच्छित्तिः प्रमेत्युक्तं भवति। विभ्रमादयो हि विशेषमपश्यतो जायन्त इति तद्व्यावृत्त्यर्थं विशेषणमिदम्। विशेषाणां च सर्वेषां विशेषान्तरानभ्युपगमेऽपि स्वरूपमेव केषाञ्चिद्विशेष इति। नैतद्युक्तम्; विशेषपदेन विशेषमात्राभिधाने रजतत्वादिना विशेषेण सहैव शुक्तिव्यक्त्यादेर्भ्रमेणावगाहनात् तस्यापि प्रमात्वं स्यात्। प्रत्यर्थं व्यावृत्ताकाराणां च विशेषाणामुपादाने अननुगमप्रसङ्गात्, सामान्यतश्चातिप्रसङ्गात् उभयथाऽप्य- सङ्गततापत्तेः। सर्वधर्मसहितत्व कहें, तो जो परिच्छेद सर्वधर्मों के विषय नहीं होते, उनमें अव्याप्ति हो जायगी। समर्थन—यहाँ 'सम्यक्' शब्द का अर्थ 'विशेष' है। लोक में जो कहा जाता है कि 'मैंने सम्यक् नहीं देखा', उसका भी यही अर्थ होता है कि मैंने 'उसे विशेषरूप से नहीं देखा।' तस्मात् 'विशेष से सहित धर्मी का परिच्छेद प्रमा है' यह लक्षण हुआ। विभ्रम या सन्देह विशेष धर्म की अज्ञानदशा में होते हैं, अतः उनमें अव्याप्ति के वारणार्थ सम्यक्त्व-निवेश है। यद्यपि विशेष धर्मों में अनवस्था-भय से अन्य विशेष धर्म नहीं रहते, तथापि उनका स्वरूप ही विशेष धर्म है; अतः विशेष धर्म की प्रमा में अव्याप्ति नहीं है। खंडन—यदि लक्षण में विशेष का सामान्यरूप से प्रवेश करें, तो 'इदं रजतम्' इस भ्रम में अतिव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि यह भ्रम भी रजतत्वरूप विशेष का ही शुक्ति में अवगाहन करता है। यदि विशेषरूप से विशेष का निवेश करें, अर्थात् 'जहाँ जो विशेष हो, वहाँ उस विशेष का अवगाहन करनेवाला ज्ञान प्रमा है' ऐसा कहें, तो यत्-तत् का अर्थविशेष प्रतिव्यक्ति व्यावृत्त होने से जिस विशेष का यत् शब्द से उपादान करेंगे, उसका अवगाहन करनेवाली प्रमा से अन्य ज्ञान में अव्याप्ति हो जायगी। यदि विशेष-भेद से लक्षण का भेद मानें, तो अनेक लक्षण होने से लक्षणों का अननुगम हो जायगा।
१६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम विशेषस्य च भवतु स्वरूपमेव विशेषः ; तथाऽप्यभेदादेव विशेषसहितत्वं नास्तीत्यव्याप्तेरपरिहारात् । यत्तु कश्चिदवोचत्—विशेषशब्देन तेऽभिधीयन्ते, यददर्शने भ्रमसंशयावकाशः, यद्दर्शने च बाधाबाधव्यवस्था तदनभ्युपगमे तत्त्वात्त्वविभागो न स्यात् । भवित- व्यञ्च तेन ; अन्यथा व्याघातादिति । तदयुक्तम् ; न तावदेवंविधो विशेषोऽभिधातुं शक्यो यदवगमस्य न भ्रमत्वादि- सम्भवः, स्वप्नदृशः सर्वविशेषोपलम्भात् । न च व्याघातदण्डभयमात्रादसौ उप- पादयितुमशक्योऽपि अभ्युपगन्तव्य इति युक्तम् । तदुपदर्शनाशक्यत्वेन व्याघात- परिहार एव कश्चिदन्यो निर्वक्तुमशक्योऽस्तीत्येव तदा किं न व्यवस्थाप्यते ? न हि परिदृश्यमानपदार्थगोचरं तदस्ति किञ्चिदनुभूयमानं यत्स्वप्ने वा किञ्च—'यद्यपि विशेष का स्वरूप ही विशेष है, तथापि अभेद होने से ही विशेषसहित विशेष नहीं हैं, अतः विशेष की प्रमा में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—जिसके न जानने से भ्रम या सन्देह होता हो और जिसके दर्शन से बाध या अबाध की व्यवस्था होती हो, वही विशेष है । उसके न मानने पर तत्त्व- अतत्त्व का विभाग नहीं होगा और वह तो होना ही चाहिए, अन्यथा व्याघात हो जायगा । अर्थात् तत्त्व-अतत्त्व का विभाग न होने पर पूछा जा सकता है कि संपूर्ण ज्ञान प्रमा है या अप्रमा ही; किंवा किञ्चित् ज्ञान प्रमा है और किञ्चित् ज्ञान अप्रमा ? यदि प्रथम पक्ष मानें, तो वादी का ज्ञान भी प्रमा होने से उसके खण्डन में प्रवृत्ति व्यर्थ होगी। यदि सब ज्ञान अप्रमा ही मानें, तो आपका ज्ञान भी अप्रमा हुआ; फलतः उसका समर्थन व्यर्थ है। यदि किञ्चित् ज्ञान प्रमा और किञ्चित् अप्रमा हो, तो वह 'प्रमा-अप्रमा का विभाग नहीं होगा' इस पूर्वोक्त कथन से 'मुख में जिह्वा नहीं है' इस कथन के तुल्य व्याहत होगा । खण्डन—ऐसा कोई विशेष नहीं है, जिसका ज्ञान भ्रम न कहा जाय; कारण स्वप्न में सभी विशेष भासते हैं और स्वप्नज्ञान को सभी भ्रम मानते हैं। जिसका समर्थन ही न हो सके, ऐसे विशेष को एकमात्र व्याघात के भय से मान लेना उचित नहीं, कारण ऐसे विशेष को स्वीकार न कर उक्त व्याघात का ही कोई अनिर्वचनीय परिहार क्यों न मान लिया जाय ? समर्थन—विशेष का प्रतिपादन अशक्य है और व्याघात का अन्य परिहार भी अनिर्वचनीय है, अतः एकादेशी प्रमाण के अभाव में हम विशेष को ही क्यों न
परिच्छेदं ] सम्यक्त्व का खण्डन १५७ वाक्याभासे वा प्रतिपत्तुमशक्यमिति प्रतिपत्त्यारूढतया येयमप्रतीयमानकल्पना, ततो वरमनुपलभ्यमानस्य व्याघातपरिहारस्यैव कल्पना भद्रा । बहुशश्च व्याघातो- द्भावनविभीषिकामुन्मूलयिष्यामः । ननु न ब्रूमो विशेषेण सहोपलम्भो विशेषसहितोपलम्भ इति । किं नाम ? विशेषेण सहितस्य पदार्थस्योपलम्भः । तथा च न शुक्तौ रजतत्वं विशेषोऽस्ति । तत्कथं रजतेऽभ्रमेऽपि तत्प्रसङ्ग इति । मैवम् ; उक्तदोषेणैव निरस्तत्वात् । यदि हि विशेषस्य सामान्यतोऽभिधा- नम्, तदा पुरोवर्तित्वादेः सत्त्वान्न प्रसङ्गनिवारणम् । विशेषेण तदभिधाने तु अननुगम इति । 'बाधाबाधव्यवस्थाहेतुरस्ति विशेषः' इति पक्षं यस्तु जडतरो न जहाति, स मानें । खंडन— स्वप्न में न रहनेवाला ऐसा कोई भी ज्ञान अनुभव में नहीं आता, जिसके दृश्यमान पदार्थ विशेष रूप से विषय न हों । इसलिए इस न्याय से सभी विषय स्वाप्न ज्ञानमें आ जाने के कारण अप्रतीयमानता की कल्पना अनुपलब्भ से बाधित, अतएव विरुद्ध है । उसकी अपेक्षा अनुपलभ्यमान व्याघात-परिहार की कल्पना ही अविरुद्ध होने से उचित होगी । अर्थात् अप्रविषयत्व बाधित है, इस प्रकार विशेष कल्पनाकर व्याघात का परिहार करने की अपेक्षा अनुपलभ्यमान- हेतुक व्याघात-परिहार ही उचित है । व्याघातोद्भावनरूप इस विभीषिका का उन्मूलन तो हम सर्वविरोध-खण्डन के प्रस्ताव में अनेक प्रकार से करेंगे । समर्थन— हम विशेष धर्म के साथ उपलम्भ को 'विशेषसहित उपलम्भ' नहीं कहते, किन्तु विशेष के सहित पदार्थ के उपलम्भ को ही विशेषसहित उपलम्भ कहते हैं । एवञ्च शुक्ति में रजतत्वरूप विशेष नहीं है, अतः रजतभ्रम में अतिव्याप्ति नहीं होगी । खंडन—यदि सामान्यरूप से विशेष का उपादान करे, तो पुरोवर्तित्व ( इदन्त्व ) सहित शुक्ति का अवगाहन करने से 'इदं रजतम्' यह ज्ञान भी प्रमा हो जायगा । यदि विशेष रूप से कहें, अर्थात् जो ज्ञान जिस धर्म से विशिष्ट धर्मी का अवगाहन करता हो, उस धर्मविशिष्ट धर्मी-अंश में वह प्रमा है, तो यत्-तत् से घटित होने से लक्षण का अनुगम ही नहीं होगा । फिर भी जो जडतर मनुष्य अपना यह पक्ष छोड़ना नहीं चाहता कि 'बाध-अबाध की व्यवस्था का हेतु विशेष है', तो उसे यह कहकर समझाना चाहिए कि जब आप्त
१५८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम 'आप्तानाप्तवाक्याभ्यां नदीतीरे पञ्च फलानि सन्तीत्येवंरूपाभ्यां प्रतिपाद्यमानेऽर्थे स्थितं किं विशेषमेकत्र पश्यसि, यमपरत्र न पश्यसी'ति पृष्ट्वा प्रतिबोधनीयः । तथाप्यनुपजातप्रबोधस्तु जडतमः कश्चिद्यदि स्यात्, स एवं प्रबोध्यः—'ये ते विशेषान्तरप्रवाहस्वीकारेऽनन्तविशेषापत्तिभयात् त्वया स्वत एव विशेषरूपा इति स्वीकृताः, तेषां स्वरूपं तावत् परस्परव्यावृत्तम्, अतोऽनुगतैकरूपाभावात् अव्यापकत्वं स्यादि'ति । बाधव्यवस्थाहेतुत्वादेव अनुगतिरिति चेन्न । क्वाचित्कबाधव्यवस्थाहेतोर्भ्रमेऽपि प्रकाशात् । तत्र तस्येति चेन्न; व्यावृत्तेः । बाधस्य च तद्विपरीतार्थप्रमात्वेन तदर्थाननुगमात्, प्रमायाश्च अद्याप्यव्य- वस्थापनादिति । और अनाप्त दोनों पुरुष 'नदी-तीर पर पञ्च फल हैं' यह कहें, तो उन दोनों से प्रतिपादित अर्थों में एक स्थल में ( आप्तप्रतिपादनस्थल में ) क्या विशेष देखते हो ! फिर भी कोई इतना जडतम हो, जो यह भी समझ न पाये, उसे इस तरह समझाया जाय कि आप तो विशेष में विशेष और उसमें भी अन्य विशेष स्वीकार नहीं करते; क्योंकि अनन्त विशेषों के स्वीकार में गौरव या अनवस्थादोष हो जायगा । प्रत्युत परस्परव्यावृत्त, विशेषान्तरशून्य अनन्त विशेष ही मानते हैं । अतः कोई उपसंग्राहक रूप न होने से लक्षण में जिस विशेष का निवेश करेंगे, तद्विषयक प्रमा में ही समन्वय हो सकेगा, अन्यविशेषविषयक प्रमा में तो अव्याप्ति ही हो जायगी । समर्थन—'बाध-व्यवस्था-हेतुत्व'रूप से ही सभी विशेषों का संग्रहकर लक्षण बनायेंगे । अर्थात् बाध की व्यवस्था का हेतु जो विशेष तद्विशिष्ट पदार्थके अनुभव को प्रमा कहेंगे । इससे न तो लक्षण का अननुगम होगा और न अव्याप्ति ही । खंडन— सार्वत्रिक बाध की व्यवस्था का हेतुत्व तो कहीं भी संभव नहीं है । यदि क्वचित् बाधव्यवस्था के हेतुत्व को ही विशेष कहें, तो रजतत्व भी वास्तविक रजत में होनेवाले 'इदं रजतम्' इस ज्ञान में बाध-व्यवस्था का हेतु है ही। फलतः शुक्ति में भी 'इदं रजतम्' यह ज्ञान प्रमा हो जायगा । यदि कहें कि जिस स्थल में जो बाध-व्यवस्थापक हो, उसी स्थल में वह विशेष है, तो लक्षण के यत्-तत् से घटित हो जाने से जिस विशेष का यत् शब्द से ग्रहण करेंगे, उससे अन्यत्र लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—विपरीत प्रमामात्र तो बाधक है नहीं, कारण तब तो 'पर्वतो वह्निमान्' इस ज्ञान का 'ह्रदो वह्न्यभाववान्' यह ज्ञान भी बाधक हो जायगा । अतः यही मानना
परिच्छेद ] सम्यक्त्व का खण्डन १५६ शङ्कान्तराणि चात्र अतः पराणि याथार्थ्यविशेषणदूषणदूषितान्येव उपनिप- तन्तीति द्विरभिधानभयान्नोक्तानि। किञ्च—तर्कज्ञानमाहार्यौ च संशयविपर्ययौ परिदृश्यमान एव विशेषे भव- न्तीति तैरतिप्रसङ्गः स्यात्। न चाऽऽहार्यौ तौ नाभ्युपगन्तव्याविति युक्तम्। विप्रलम्भकस्य वाक्यप्रयोगमूलतया आहार्यभ्रमस्य ज्ञाततत्त्वस्य च गुरोः शिष्य- प्रबोधार्थं विचारं प्रवर्तयतश्च आहार्यसंशयानां भवत एव शास्त्रेऽनुमतत्वात्। परिच्छेदशब्दश्च अनुभूतिपर्यायोऽनुभूतिदूषणं नातिक्रामतीत्यलम्। होगा कि जिस धर्मी में जो बाध्य हो, उसमें उस धर्म के अभाव का अवगाही ज्ञान बाधक है। फिर तो लक्षण के यत्-तत् घटित होने से पुनः यदि यत् शब्द से रजतत्व का ग्रहण करें, तो सर्पभ्रम में बाधलक्षण की अव्याप्ति हो जायगी। किञ्च—'सविशेष ज्ञान' को प्रमा कहते हैं, 'बाध-व्यवस्था के हेतु' को विशेष कहते हैं तथा 'तद्विपरीत प्रमा' को बाध कहते हैं—इस रीति से बाध के लक्षण में प्रमा की और प्रमा के लक्षण में विशेष द्वारा बाध की अपेक्षा होने से चक्रक दोष हो जायगा। 'जिस विशेष धर्म से सहित धर्मी हो, उस विशेष से सहित धर्मी का अनुभव प्रमा है,' 'साक्षात् विशेष से सहित धर्मी का अनुभव प्रमा है' या 'भासमान यावद् विशेषों से सहित धर्मी का अनुभव प्रमा है' इन सारी शङ्काओं का खण्डन तो 'यथार्था- नुभवः प्रमा' इस लक्षण के याथार्थ्य-विशेषण के दूषण-प्रस्ताव में हो ही चुका है। अतः पुनरुक्ति के भय से यहाँ फिर इसे नहीं कहते। किञ्च—'यदि वह्निर्न स्यात्तदा धूमोऽपि न स्यात्' यह तर्क 'पर्वतो वह्निमान्' ऐसा विशेष ज्ञान होने पर ही होता है। आहार्य-भ्रम और संशय भी विशेष ज्ञान होने पर ही होते हैं। अतः उनमें लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी। इसपर यह नहीं कह सकते कि 'आहार्य-भ्रम और सन्देह होता ही नहीं, कारण वञ्चक पुरुष को आहार्य-भ्रम होता ही है। अन्यथा वह असत्यार्थक वाक्य कैसे कहता, यह आप भी मानते हैं। साथ ही शिष्य के प्रबोधनार्थ शास्त्रार्थारम्भ करनेवाले तत्त्वज्ञ गुरु का आहार्य-सन्देह भी आपके शास्त्र में स्वीकृत ही है। 'परिच्छेद' शब्द का अर्थ अनुभूति है, अतः वह अनुभूति के दूषणों का अतिक्रमण नहीं कर सकता। अर्थात् अनुभूतित्व जाति या स्मृत्यन्यज्ञानत्व आदि उपाधिरूप नहीं हो सकता, इसका खण्डन हो ही चुका है।
१६० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [प्रथम अव्यभिचारित्व-खण्डनम् नापि अव्यभिचार्यनुभवः प्रमेति युक्तम् । अव्यभिचारिपदस्य यदि तत्त्व- विषयाद्यर्थत्वम्, तदा दूषणान्युक्तान्येवानुवर्तन्ते । अथैवमुच्यते अव्यभिचारित्वमर्थाविनाभूतत्वम् ; तदा प्रष्टव्यं कोऽस्यार्थः— किं यदैवार्थस्तदैव ज्ञानम्, उत यत्रार्थस्तत्रैव देशे ज्ञानम्, अथ यादृगर्थस्तादृगेव ज्ञानं यत्तत्प्रमितिरिति ? नाद्यः, अतीतानागतानुमित्याद्यव्यापनात् । न द्वितीयः ; ज्ञानसमानदेशार्थ- प्रमितीनामव्यापनात् । ज्ञानसमानदेशमर्थमन्यत्र आरोपयतोऽप्यनुभवस्य प्रमा- त्वापत्तेः । नापि तृतीयः; ज्ञानार्थभेदवादे सर्वाकारेण तत्साम्यानुपपत्तेः । अभेदवादे तु भ्रमस्याऽपि तदभ्युपगन्तव्यत्वप्रसङ्गेन विशेषणवैयर्थ्यापातात् । अव्यभिचारित्व का खण्डन खंडन — 'अव्यभिचारी अनुभव प्रमा है' यह लक्षण भी युक्त नहीं, कारण यदि अव्यभिचारी पद का तत्त्वविषयकत्व आदि अर्थ करें, तो उक्त दूषणों की ही आवृत्ति होगी । समर्थन — हम अव्यभिचारी' पद का 'ज्ञान में विषय का अविनाभाव' यह अर्थ करेंगे । खंडन — 'अविनाभाव' शब्द का क्या अर्थ है, क्या समुद्रवृद्धि-चन्द्रोदय के तुल्य जिस काल में अर्थ हो, उसी काल में ज्ञान, हो — यह अर्थ है अथवा धूम-वह्निके तुल्य जिस देश में अर्थ हो, उसी देश में ज्ञान हो — यह अर्थ है, किंवा जैसा अर्थ हो, वैसा ही ज्ञान हो — यह अर्थ है ? यदि प्रथम अर्थ मानें, तो अतीत-अनागत विषयों की अनुमितियों में अव्याप्ति हो जायगी । द्वितीय अर्थ मानें, तो समवाय सम्बन्ध से ज्ञान का देश आत्मा है और वह घट- पटादि अर्थों का देश नहीं है; अतः घटपटादि प्रमा में लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । साथ ही ज्ञान के देश में स्थित आत्मत्व का जो अन्यत्र ( शरीर में ) भ्रम होता है, उस भ्रम में अतिव्याप्ति हो जायगी । यदि तृतीय अर्थ मानें, तो ज्ञान का अर्थ के साथ भेद माननेवाले के मत में ज्ञान तथा अर्थ का सर्वथा सादृश्य न होने से अस- म्भव हो जायगा । ज्ञान तथा अर्थ के अभेदवाद में भ्रमज्ञान में अतिव्याप्ति हो जायगी । व्यवच्छेद न होने से विशेषण भी व्यर्थ हो जायगा ।
परिच्छेद ] अविसंवादित्व का खण्डन १६१ तैस्तैश्च विशेषैः सादृश्यस्य विवक्षितत्वे यथार्थताप्रस्तावोक्तान्येव दूषणानि आवर्तन्त इति । अविसंवादित्व-खण्डनम् अविसंवाद्यनुभवः प्रमेत्यपि न युक्तम् । अविसंवादित्वं हि ज्ञानान्तरेण तथैवोल्लिख्यमानार्थत्वं वा, ज्ञानान्तरेण विपरीततया अप्रतीयमानार्थत्वं वा, प्रती- यमानव्याप्यविषयत्वं वा, अन्यदेव वा किञ्चित् ? न प्रथमः ; धारावाहिनो भ्रमस्य प्रमात्वप्रसङ्गात् । न च प्रमाभूतं ज्ञानान्तरं विवक्षितमिति वाच्यम् ; प्रमाया एव लक्ष्यमाणत्वात् । नापि द्वितीयः ; अज्ञातबाधभ्रमव्यापनात्, स्वस्थदशोत्पन्नस्य शुक्लशङ्खज्ञानादेः 'जो धर्म अर्थ में हो, वही ज्ञान में भासता है' इस तरह का अर्थसाम्य अनुभव में मानें, तो याथार्थ्य-प्रकरण में उक्त दोष हो जायँगे । अर्थात् विशेषमात्र का अभिधान करेंगे, तो भ्रमादि में अतिव्याप्ति होगी । तत्तत् विशेष व्यक्ति कहेंगे, तो अननुगम होगा, ये सभी दोष आ जायँगे । अविसंवादित्व का खण्डन 'अविसंवादी अनुभव प्रमा है' यह लक्षण भी युक्त नहीं है, कारण 'अविसंवादी' शब्द का कुछ अर्थ ही नहीं हो सकता । देखिए—क्या जिस ज्ञान का विषय उत्तर- ज्ञान से उल्लिख्यमान हो, वह अनुभव अविसंवादी है; जिस अनुभव के विषय का अभाव उत्तर-ज्ञान का विषय न हो, वह अनुभव अविसंवादी है; जिस अनुभव के विषय का व्याप्य प्रतीयमान हो, वह अनुभव अविसंवादी है अथवा और ही कुछ अविसंवादित्व है ? इनमें प्रथम कल्प युक्त नहीं है; कारण धारावाही भ्रम में पूर्व-पूर्व भ्रम का विषय उत्तर-उत्तर ज्ञान का विषय होता ही है, अतः उसमें अतिव्याप्ति हो जायगी । यदि कहें कि प्रमात्मक ज्ञानान्तर से जिस अनुभव का विषय उल्लिख्यमान हो, वह अविसंवादी है, तो वह भी उचित नहीं; कारण प्रमा का अभीतक निर्वचन ही नहीं हो पाया है । अतः प्रमा से प्रमा की निरुक्ति होने के कारण आत्माश्रय तथा प्रमा से अविसंवादित्व की निरुक्ति तथा अविसंवादित्व से प्रमा की निरुक्ति होने के कारण अन्योन्याश्रय हो जायगा । द्वितीय कल्प भी उचित नहीं, कारण जिस भ्रम का बाध नहीं हुआ है, उस भ्रम में अतिव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—स्वस्थ-दशा में उत्पन्न 'शुक्लः शंखः' इस २१
१६२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम दुष्टेन्द्रियदशोत्पन्नतत्पीतमज्ञानाद्युल्लिखितविषयवैपरीत्यस्य अप्रमात्वप्रसङ्गाच्च । प्रमित्यानुल्लिखितार्थवैपरीत्यमात्रविवक्षायां तु प्रमाया एव लक्ष्यमाणत्त्वादि- त्युक्तमनुषज्जति । अदुष्टकरणकज्ञानेनाबाधितत्वं विवक्षितमिति चेत् ; तदेव तर्हि प्रमालक्षणमस्तु । किञ्च—दुष्टत्वनिरूपणमन्तरेण अदुष्टत्वस्य दुर्निंरूपत्वात् । ननु किमेतावता ? दुष्टत्वं विपरीतज्ञानप्रयोजकस्तद्धेतुगतो विशेष इति सुवचमेवेति । न; विपरीतपदव्यवच्छेद्याप्रमितौ तदुपादानवैयर्थ्यात् । तदनुपादाने च ज्ञानजनकत्वमात्रं दुष्टत्वमिति अदुष्टकरणजं ज्ञानं नास्त्येवेति स्यात् । विपरीतपदव्यवच्छेद्या प्रमैवेति चेन्न । तस्या एव लक्ष्यमाणत्वात् । तदीय- ज्ञान का भी पित्तरोग से दूषित दशा में उत्पन्न 'पीतः शंखः' इस ज्ञान से बाध होने के कारण 'शुक्लः शंखः' यह ज्ञान भी प्रमा न होगा। यदि कहें कि जिस अनुभव के विषय का अभाव प्रमा से उल्लिख्यमान न हो, वह अविसंवादी है, तो प्रमा से प्रमा की निरुक्ति होने के कारण आत्माश्रय और प्रमा से अविसंवादित्व की तथा अविसंवादित्व से प्रमा की निरुक्ति होने के कारण अन्योन्याश्रय हो जायगा । समर्थन—'अदुष्ट-इन्द्रियजन्य ज्ञान से जो ज्ञान बाधित न हो, वह अविसंवादी है' ऐसा कहेंगे, तब तो 'शुक्लः शंखः' इस प्रमा में न अव्याप्ति है और न आत्माश्रय ही है । खण्डन—फिर तो लाघव होने से 'अदुष्ट-इन्द्रियजन्य अनुभव' ही प्रमा का लक्षण मानिये । किञ्च—जबतक दुष्टत्व की निरुक्ति न हो, तबतक अदुष्टत्व का निरूपण भी असंभव ही है । समर्थन—विपरीत ज्ञान का प्रयोजक तथा हेतुगत विशेष को ही दोष कहा जा सकता है । खण्डन—'विपरीत' पद के निवेश से किसका व्यवच्छेद होगा ? यदि व्यवच्छेद्य की प्रतीति न हो, तो विपरीत पद का निवेश व्यर्थ ही हो जायगा । यदि विपरीत पद का निवेश न करें, तो ज्ञानमात्रजनकत्व ही दुष्टत्व होगा । तब कोई भी ज्ञान अदुष्ट इन्द्रियजन्य न होगा । समर्थन—'विपरीत' पद का व्यवच्छेद्य प्रमा ही है, अतः निवेश व्यर्थ नहीं है । खंडन—अभी तो प्रमा का लक्षण ही कर रहे हैं, अतः इतरव्यावृत्त रूप से उसका स्वरूप-निर्धारित ही नहीं हुआ है। फिर उसका व्यवच्छेद कैसे होगा ? इसके अतिरिक्त, इतर-व्यावृत्त प्रमा की प्रतीति के बिना लक्षण द्वारा इतरव्यावृत्त प्रमा की
परिच्छेद ] अविसंवादित्व का खण्डन १६३ स्वरूपस्येतरव्यावृत्तस्य अद्याप्यप्रतीतेः कुतो व्यवच्छेदः प्रत्येत्तव्य इति व्यवच्छिन्नतज्ज्ञानमन्तरेण व्यवच्छिन्नतज्ज्ञानमशक्यमिति आत्माश्रयान्योन्याश्रयौ अनवस्था वा । एकोऽनेकविशेषेऽर्थे विशेषो यत्र लक्ष्यते । तद्विशेषान्तरान्यत्वाद् दोषस्तत्रैव धावति ॥ ३२ ॥ नापि तृतीयः ; व्याप्यशब्देन व्याप्यमात्रम्, तद्विशेषो वा कश्चिदभिप्रेतः स्यात् ? आद्ये सधूमाग्निविषयस्य स्वप्नज्ञानस्य अनाप्तवाक्यजबोधस्य वा नाप्र- मात्वं स्यात् । नापि द्वितीयः ; स ह्यर्थक्रिया वा, सामग्री वा ? उभयत्रापि पूर्वदोषानिवृत्तेः । प्रतीति अशक्य होने से आत्माश्रय होगा; इतरव्यावृत्त प्रमा के अधीन दुष्टत्व का ज्ञान और दुष्टत्वज्ञान के अधीन अदुष्ट-इन्द्रियजन्य ज्ञान से अबाधितरूप अविसंवादित्व के ज्ञान द्वारा प्रमा का ज्ञान होने से अन्योन्याश्रय होगा अथवा प्रमाज्ञान के अधीन दुष्टत्व का ज्ञान और दुष्टत्वज्ञान के अधीन अदुष्ट-इन्द्रियजन्य-ज्ञान, उससे अबाधितत्वरूप अविसंवादित्व का ज्ञान तथा उक्त अविसंवादित्व के ज्ञान के अधीन प्रमा का ज्ञान इस प्रकार चक्रक भी हो जायगा । यदि विपरीत पद से व्यवच्छेद्य प्रमा की और ही कुछ निरुक्ति करें, तो आत्माश्रय आदि तो न होगा, किन्तु उस प्रमा की निरुक्ति में भी अन्य प्रमा की अपेक्षा होगी और उसके लिए अन्य प्रमा की, इस तरह अनवस्था हो जायगी । इसी प्रकार जिस ज्ञान आदि पदार्थों के अनुभव, स्मरण आदि अनेक विशेष हैं और एक विशेष अन्य विशेष से अन्यत्वरूप से लक्षित होता है, अर्थात् अनुभव स्मरणान्यत्व से तथा स्मरण अनुभवान्यत्व से लक्षित होता है, वहाँ सर्वत्र आत्माश्रय आदि दोष होंगे । देखिये—अनुभव से अन्य ज्ञान स्मरण है और स्मरण से अन्य ज्ञान अनुभव । अतः स्मरण का निष्कृष्ट लक्षण हुआ—‘स्मरणान्यज्ञानान्यज्ञानत्वम्’ । इस लक्षण में स्मरण पद का प्रक्षेप होने से आत्माश्रय है । साथ ही स्मृति के लक्षण में अनुभव की और अनुभव के लक्षण में स्मृति की अपेक्षा होने से अन्योन्याश्रय भी है । ‘जिस ज्ञान के विषय का व्याप्य प्रतीयमान हो, वह ज्ञान अविसंवादी है’ यह तृतीय पक्ष भी उचित नहीं; कारण ‘व्याप्य’ शब्द से यदि व्याप्यमात्र का ग्रहण करें, तो सधूम वह्नि का स्वप्नज्ञान तथा अनाप्तवाक्य से जात ज्ञान भी प्रमा हो जायगा । यदि ‘व्याप्य’ शब्द से व्याप्य-विशेष ( अर्थक्रिया या सामग्री ) का ग्रहण करें, तो भी धूम-सहित वह्नि के स्वप्नज ज्ञान में या अनाप्तवाक्य से जनित ज्ञान में ही अतिव्याप्ति हो जायगी ।
२. द्वितीय परिच्छेद: न्यायोक्त प्रमा, भ्रम, संशय एवं तर्क-लक्षण खण्डन
१६४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [प्रथम एकदा च सर्वत्र प्रमाणासम्भवेन क्रमाश्रयणे तत्तदर्थक्रियातत्तत्सामग्रीपर- म्परावगमनियमाभ्युपगमे एकस्मिन्नेव विषये पुरुषायुषः पर्यवसानप्रसङ्गात् । विच्छेदाभ्युपगमे त्वन्तिमावगमस्याप्रामाण्यात् आप्रथममप्रमात्वापत्तेः । वास्तव- तदर्थक्रियात्वस्य च दुर्निरूपत्वेन व्यवहारानर्हत्वात् । तथाप्रतीतिमात्रस्य भ्रमासाधारण्यात् । नन्वेवं चतुर्थः पक्षोऽस्तु । तथा हि—अर्थक्रियाकारिविषयत्वं वाऽविसंवादि- त्वमिति । यथाऽऽह—'प्रमाणमविसंवादिज्ञानमर्थक्रियास्थितिश्वाऽविसंवादः' इति । न ; सामान्यतो विवक्षायां भ्रान्तावपि प्रसङ्गात् । प्रतीयमानरूपेणार्थक्रियाकारित्वमर्थस्य विवक्षितमिति चेन्न । दुरवधारणत्वात् । किञ्च—युगपद् अनेक ज्ञान नहीं होते, अतः व्यापक के प्रतीतिकाल में व्याप्य की प्रतीति नहीं होगी, वह क्रम से ही होगी । अर्थात् व्यापक की प्रतीति के उत्तर- काल में ही व्याप्य की प्रतीति होगी । ऐसा मानने पर पूर्वज्ञानगत प्रमात्व उत्तरक्षण में उत्पन्न अर्थक्रिया की प्रतीति या सामग्री की प्रतीति से गृहीत होगा, वह अर्थक्रिया- प्रतीतिगत प्रमात्व भी उससे उत्तरक्षण में उत्पन्न अर्थक्रिया की प्रतीति से गृहीत होगा, इस तरह पूर्व पूर्वप्रतीति के प्रमात्व में अपर-अपर प्रतीति की अपेक्षा होने से अन- वस्था हो जायगी । यदि अर्थक्रिया की प्रतीति की धारा का कहीं विच्छेद मानें, तो अन्तिम अर्थक्रिया की प्रतीति के अप्रमा होने से मूलपर्यन्त अप्रमात्व हो जायगा । किञ्च--यदि अर्थक्रिया वास्तविक लें, तो प्रमितित्व से इतर वास्तविकत्व हो नहीं सकता और प्रमिति का अभीतक निर्वचन ही नहीं हुआ है । यदि केवल अर्थक्रिया की प्रतीति का ही ग्रहण करें, तो भ्रमस्थल में भी अर्थक्रिया की प्रतीति होने से अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'अर्थक्रियाकारित्व अविसंवाद है' यह चतुर्थ पक्ष ही मानेंगे । धर्मकीर्ति ( बौद्ध आचार्य ) ने भी कहा है कि 'अविसंवादी ज्ञान प्रमा है और अर्थक्रियाकारित्व ही अविसंवाद है।' खंडन—यदि अर्थक्रियाकारित्व सामान्यरूप से अभिप्रेत हो, तो शुक्तिरूप से अर्थक्रियाकारित्व भ्रम में भी है, अतः भ्रम में अतिव्याप्ति हो जायगी । यदि कहें कि प्रतीयमान धर्म से अर्थक्रियाकारित्व अभिप्रेत है । एवञ्च भ्रम में प्रतीयमान रजतत्वरूप से अर्थक्रियाकारित्व न होनेसे अतिव्याप्ति नहीं है, तो वह भी ठीक नहीं; क्योंकि रजतमें दृष्ट भी अङ्गुलीयरूप अर्थक्रियाका कर्तृत्व रजतत्वरूपसे
परिच्छेद ] अविसंवादित्व का खण्डन १६५ तदर्थक्रियादर्शनात् तदवधारणमिति चेन्न । विनाप्यर्थक्रियां तद्दर्शनसम्भवात् । अर्थक्रियाप्रमितिरभिधित्सितेति तु दूषितमेव, प्रमाया एव निरूप्यमाणत्वात् । अभिप्रायविसंवादात् प्रमायां सर्वमुच्यत इति चेन्न । तदा अभिप्रायविसंवादस्य स्वप्नादिप्रत्ययेऽपि सम्भवात् । कालान्तराविसंवादस्य च दुरवधारणत्वात् । एतेन 'प्राप्त्यादियोग्यता अविसंवादार्थ इत्यपि निरस्तम् । दुराबाध इव चायं धर्मकीर्तेः पन्था इत्यवहितेन भाव्यमिहेति । है या मुद्रादिरूपसे, इसका अवधारण नहीं हो सकता। अतः रजत में होनेवाले 'इदं रजतम्' इस ज्ञान में भी अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—अङ्गुलीयरूप अर्थक्रिया के दर्शन से ही रजतत्व का अवधारण करेंगे । खंडन—जैसे रजतत्व के बिना भी रजतत्व का भ्रम होता है, वैसे ही अर्थक्रियाकारित्व के बिना भी अर्थक्रियाकारित्व का भ्रम हो सकता है । अतः अर्थक्रिया के दर्शन मात्र से रजतत्व का अनुमान नहीं हो सकता । यदि कहें कि अर्थक्रिया की प्रमिति से रजतत्व का अवधारण करेंगे, तो वह भी नहीं कह सकते, कारण प्रमिति का अभीतक निर्धारण ही नहीं हुआ है । समर्थन—अभिप्राय ( इच्छा या प्रवृत्ति ) के अविसंवाद से सम्पूर्ण ज्ञान प्रमा कहे जाते हैं । खण्डन—वह अविसंवाद ज्ञानकाल में अभिप्रेत है या सभी कालों में ? यदि कहें कि ज्ञानकाल में, तो भ्रमस्थल में भी ज्ञानकाल में अविसंवाद होने से भ्रम में अतिव्याप्ति हो जायगी । यदि कहें कि सभी कालों में अविसंवाद अभिप्रेत है, तो 'इस ज्ञान में कदापि अविसंवाद नहीं होगा' यह बात दुर्ज्ञेय है । प्रत्युत सम्भव है कि स्वप्नकाल में सर्वविध ज्ञानों में विसंवाद हो, अतः लक्षण में असम्भव दोष हो जायगा । समर्थन—प्राप्तियोग्यता अविसंवाद है और उससे युक्त अनुभव प्रमा है । खंडन—यदि ज्ञानकालमें प्राप्ति की योग्यता कहें, तो वह भ्रम में भी है, अतः उसमें अतिव्याप्ति हो जायगी । यदि सर्वकाल में प्राप्ति की योग्यता कहें, तो उसका अवधारण प्रमा में भी नहीं हो सकता, अतः असंभव हो जायगा । इसलिए प्राप्ति की योग्यता को प्रमा मानना भी असङ्गत है । धर्मकीर्ति के इस प्रमालक्षण का खण्डन मन्दबुद्धियों को अशक्य-सा प्रतीत होता है । अतः इससे सावधान रहना चाहिए ।
१६६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अबाधितत्वादि-खण्डनम् अबाधितानुभूतिः प्रमेत्यपि निरस्तम् । तदानीं बाधाविरहस्य अतिप्रसञ्जक- त्वात्, कालान्तरेऽपि च बाधाविरहस्य दुर्निरूपत्वात् । स्वतो बाधाविरहस्य अति- प्रसञ्जकत्वात् । सर्वजनबाधाविरहस्य च दुरवधारकत्वादिति । तर्कसंशयविपर्ययस्मृतिव्यतिरिक्ता प्रतीतिः प्रमेत्यपि न । स्मृतिव्यतिरिक्तत्व- खण्डनन्यायेन निरस्तत्वादिति । जातिसङ्करमिच्छतश्च प्रमात्वलक्षणजात्यभिसम्बन्धात् प्रमेत्यपि दुर्लक्षणम् । अस्याज्ञातस्य तद्व्यवहारजनकत्वे प्रमायामप्रमाभ्रमसंशयौ न स्याताम् । अबाधितत्वादि का खण्डन इसी तरह 'अबाधित अनुभूति प्रमा है' यह लक्षण भी नहीं हो सकता । कारण यदि अबाधितत्व ज्ञानकाल में कहें, तो वह भ्रम में भी है । यदि सभी कालों में अबाधितत्व कहें, तो वह प्रमा में भी नहीं है, क्योंकि सम्भव है कि स्वप्न में प्रमा का भी बाध हो जाय । किञ्च—यह अबाध द्रष्टा का ही अभिप्रेत है या मनुष्यमात्र का ? यदि द्रष्टा का अबाध कहें, तो सम्भव है कि कहीं भ्रान्त मनुष्य को अपने भ्रमज्ञान में कभी उत्तर काल में बाध ही न हो । अतः उस भ्रम से अतिव्याप्ति हो जायगी । यदि सब मनुष्यों का अबाध अभिप्रेत हो, तो वह दुर्ज्ञेय ही है । निर्वचन—तर्क, संशय, विपर्यय और स्मृति से व्यतिरिक्त ज्ञान को ही प्रमा कहेंगे । खण्डन—स्मृति-व्यतिरिक्तत्व के खण्डन की रीति से इस लक्षण का भी खण्डन हो जायगा । अर्थात् यदि यत्किञ्चित् तर्कादिव्यतिरिक्तत्व कहें, तो तद्व्यतिरिक्त तर्कादिव्य- क्तियोंमें अतिव्याप्ति होगी । यदि सम्पूर्ण तर्कादिव्यतिरिक्तत्व कहें, तो हम-आप जैसे असर्वज्ञों को वैसा ज्ञान ही नहीं हो सकता, अतः यह लक्षण संभव नहीं । समर्थन—'प्रमात्वजातिविशिष्ट प्रमा है' ऐसा ही लक्षण करेंगे । खंडन—यह लक्षण भी उचित नहीं है, कारण साक्षात्त्व को छोड़कर प्रमात्व अनुमिति में है और प्रमात्व को छोड़कर साक्षात्त्व भ्रम में है तथा दोनों का समावेश प्रत्यक्ष-प्रमा में है; अतः सङ्कर दोष होने से प्रमात्व जाति ही नहीं हो सकती । समर्थन — संस्कारमात्र से अतिरिक्त अदुष्टकरणजन्य प्रतीतित्व को प्रमात्व का प्रयोजक मानेंगे और इन्द्रियाजन्यप्रतीतित्व को परोक्षत्व का प्रयोजक। एवञ्च व्यंजक उपाधि भिन्न-भिन्न होने से सांकर्य नहीं होगा । खण्डन—प्रमात्वजातिरूप लक्षण 'इयं प्रमा' इस व्यवहार का अज्ञात प्रयोजक है या ज्ञात ? यदि अज्ञात कहें, तो कभी किसी भी
१ परिच्छेद ] अबाधितत्त्वादि का खण्डन १६७ दोषाभावसहकृतस्य तथात्वे च अजायमानभ्रमसंशयप्रमादिव्यवहारे ज्ञानमात्राव- गमोदाहरणेऽपि तदापत्तेः । ज्ञातेनानेन लक्षणेन व्यवहारे च कथमिदमेव ज्ञातव्यमिति वक्तव्यम् । न तावत्प्रत्यक्षेण मानसेन ; तथा सति क्वचिज्ज्ञातायां प्रमायामप्रमाविपर्ययसंशया- नवकाशादि स्यात् । धर्मिवत् मनसैव निर्णीतत्वात् । चिह्नान्तरसापेक्षेणैव मनसा संवेदनचिह्नेनैव वा तेनैव लक्षणीभूय ज्ञापन- मित्यपि प्रत्याशामात्रम् । तच्चिह्नेनैव प्रमात्वजातिकल्पनाप्रतिच्छेदापत्तेः । प्रमा में अप्रमात्व का भ्रम या सन्देह नहीं होगा। अर्थात् जब ज्ञात लक्षण को 'इयं प्रमा' इस व्यवहार का प्रयोजक मानें, तब तो कह सकते हैं कि प्रमात्वरूप लक्षण का ज्ञान न होने पर 'इयं प्रमा' यह व्यवहार नहीं होता; प्रमात्व का भ्रम या सन्देह ही होता है । किन्तु जब अज्ञात ( स्वरूपसत् ) ही लक्षण व्यवहार का प्रयोजक हो, तब तो प्रमा में सदा 'इयं प्रमा' यही व्यवहार होना चाहिए । समर्थन — दोषाभाव से सहित, स्वरूपसत् प्रमात्वरूप लक्षण 'इयं प्रमा' इस व्यवहार का प्रयोजक है । अतः जहाँ दोष हो, वहाँ 'इयं प्रमा' यह व्यवहार नहीं होता; किन्तु भ्रम या सन्देह ही होता है । खंडन — जो ज्ञान वस्तुतः प्रमा है, किन्तु प्रमात्व- रूपसे ज्ञात नहीं है केवल ज्ञानत्वरूप से ही अवगत है और जिसमें भ्रम या सन्देह भी नहीं है, वहाँ 'इयं प्रमा' यह व्यवहार होना चाहिए, कारण दोषाभाव से सहित, स्वरूपसत् प्रमात्व वहाँ विद्यमान है । यदि ज्ञात लक्षण व्यवहार का प्रयोजक हो, तो लक्षण का ज्ञान कैसे हुआ, यह पूछना चाहिए । मानस प्रत्यक्ष से लक्षण का ज्ञान होता है, यह तो कह नहीं सकते, कारण कहीं-कहीं प्रमा होने पर भी प्रमात्व का जो सन्देह या भ्रम होता है, वह [ धर्मी- प्रमा के ज्ञान के तुल्य प्रमात्व का भी मानस प्रत्यक्ष हो जाने से ] नहीं होगा । समर्थन — अन्य चिह्न से युक्त मन से प्रमात्व का ज्ञान होता है अथवा चिह्न ही लिङ्गरूप से प्रमात्वरूप लक्षण की अनुमिति का हेतु है । अतः चिह्न रूप सहकारी के अज्ञान में अप्रमात्व का भ्रम हो सकता है । खण्डन — यदि ऐसा है, तो उसी चिह्न से 'इयं प्रमा' यह व्यवहार हो जायगा । फिर प्रमाण के अभाव से प्रमात्वजाति की सिद्धि ही न होगी ।
| १६८ | सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य | [ प्रथम |
|---|
तेषां नानात्वे च कानि तानीति वक्तव्यं स्यात् । तच्चिह्नानां यथोपन्यासं सर्वेषामेव दूषितत्वात् । प्रामाण्यपरतस्त्वव्युदस्तप्रस्तावे च विस्तरेण दूषयिष्यामः । एतेन शक्तिविशेषः प्रमात्वम्, तद्योगः प्रमालक्षणमित्यपास्तम् । दुरव- धारकत्वात् । यच्च किञ्चित्प्रमाया लक्षणमुच्यते तदज्ञातं ज्ञातमात्रं वा यदि तत्त्वव्यवहारकम्, तदा अत्यापत्तिः । प्रमितञ्चेत् प्रमाणवधारणे तद्दुदुरवधारकत्वात् । माऽवधारि वस्तुतस्तु तथेति चेन्न । वस्तुतो न तथैव किं नेति वादिन्यनुत्तरा- समर्थन—प्रमा के अनेक चिह्न हैं, इसलिए उन चिह्नों से 'इयं प्रमा' इस अनुगत बुद्धि का समर्थन नहीं हो सकता । अतएव अनुगत बुद्धि के समर्थन के लिए प्रमात्व जाति मानी जाती है । खंडन—'तत्त्वानुभूतित्व' आदि उन चिह्नों का खण्डन यथास्थान कर ही आये हैं । अतः चिह्नों के सहकार से प्रमात्व का मानस प्रत्यक्ष होता है, यह कथन असङ्गत है । किञ्च—'प्रमात्व स्वतोग्राह्य है या परतः' इसके खण्डन के प्रस्ताव में प्रमात्व का चिह्न से सहकृत मानस प्रत्यक्ष होता है, इसका विस्तार से खण्डन करेंगे । समर्थन—प्रमा में अर्थावबोध की जो शक्ति है, वह शक्ति ही प्रमात्व है और प्रमात्वयोग ही प्रमा का लक्षण है । खंडन—यदि इस लक्षण को अज्ञातरूपेण व्यवहार का कारण मानें, तो प्रमात्व का भ्रम या सन्देह न होना चाहिए । यदि ज्ञात व्यवहार का कारण मानें, तो जिस चिह्न से वह ज्ञात होता है, वही चिह्न लक्षण हो, शक्ति का स्वीकार व्यर्थ है, इत्यादि पूर्वोक्त दोषों से शक्तिपक्ष भी असङ्गत है । आप प्रमा का कोई भी लक्षण करें, अज्ञात या केवल ज्ञातरूप में प्रमात्वव्यवहार का कारण मानें, तो भ्रमस्थल में भी प्रमात्व का व्यवहार होना चाहिए । कारण यदि अज्ञात प्रयोजक है, तो अज्ञात-दशा में सत्त्व-असत्त्व दोनों एक से हैं, उनमें भेद तो है नहीं । फिर जहाँ असत् है, वहाँ भी व्यवहार होना चाहिए । साथ ही अप्रमा में भी प्रमात्व का भ्रम या सन्देह हो सकता है । यदि कहें कि 'इदं लक्षणं प्रमितम्' ईदृश ज्ञान का विषय लक्षण व्यवहार का जनक है, तो अद्यावधि प्रमा की निरुक्ति न होने से इस कार्यकारणभाव के नियम में प्रमिति विशेषण [ असिद्ध होने से ] नहीं दे सकते । यदि कहें कि लक्षण में प्रमितत्व का अवधारण न हो, किन्तु जो लक्षण स्वरूप से प्रमित है, उससे व्यवहार होता है और जो प्रमित नहीं है, वह व्यवहार का प्रयोजक नहीं है, तो किसीके यह कहने पर कि 'यह लक्षण प्रमित नहीं है', आप क्या उत्तर देंगे, कारण अभीतक प्रमात्व की निरुक्ति न होने से 'इदं प्रमितम्' इस ज्ञान से प्रमितत्व
परिच्छेद ] प्रथम करणत्व-लक्षण का खण्डन १६६ पत्तेः, प्रमात्वनिरूपणवैयर्थ्यापाताच्च । वस्तुतस्तु प्रमयैव घटादितत्त्वव्यवहारोऽपि तर्ह्यस्तु इत्यास्तां विस्तरः । प्रमाणसामान्य-लक्षणखण्डनम् एवं प्रमितेरनिरुक्त्या प्रमाकरणं प्रमाणमित्यप्ययुक्तम्; करणार्थानिरुक्तेश्च । प्रथम-करणत्वलक्षण-खण्डनम् ननु कारकान्तरेऽचरितार्थस्य हेतुत्वं करणत्वम् । कर्तुर्हि करणं निष्पादयतः कारकान्तरे चरितार्थत्वम्, स्वरूपतोऽनिष्पादनेऽपि व्यापारवतया निष्पादनात् । तादृशस्य च तस्य करणत्वात् । की सिद्धि आप नहीं कर सकते । किञ्च—जैसे लक्षण प्रमितत्व से अनवगत-स्वरूप सत् लक्ष्य के व्यवहार का कारण है, वैसे ही प्रमा भी स्वरूपसत् ही घटादि-व्यव- हार की प्रयोजक होगी । फिर प्रमात्व से प्रमा के अवगम के लिए प्रमा के लक्षण का निरूपण व्यर्थ ही हो जायगा । किञ्च—लक्षण व्यतिरेकी हेतु है और व्याप्तिपक्ष- धर्मतया प्रमितस्वरूप से अवगत ही हेतु अनुमिति का जनक होता है । अतः 'प्रमितत्व से अनवगत लक्षण व्यवहार का प्रयोजक है,' यह कथन असङ्गत है । ऐसे अनेक दूषण हैं, अतः विस्तार न कर एतावत् खण्डन ही पर्याप्त है । प्रमाण-सामान्य के लक्षण का खण्डन पूर्वोक्त रीति से प्रमा का लक्षण न हो सकने पर 'प्रमितिकरणं प्रमाणम्' यह प्रमाण-लक्षण भी अयुक्त हुआ, कारण विशेषण की निरुक्ति के बिना विशिष्ट की निरुक्ति ही नहीं हो सकती । किञ्च—'करण' शब्द के अर्थ की निरुक्ति भी असम्भव है । प्रथम करणत्व-लक्षण का खण्डन समर्थन—जो हेतु कारकान्तर में अचरितार्थ ( अनुपयुक्त ) होकर क्रिया का जनक हो, वह करण है । कर्ता करण का निष्पादन करता है, अतः कारकान्तर में चरितार्थ है । यद्यपि वह करण का स्वरूप से निष्पादन नहीं करता, तथापि व्यापार- वत्त्वरूप से निष्पादन करता ही है । क्योंकि व्यापारयुक्त को ही 'करण' कहते हैं और विशेषण का निष्पादक विशिष्ट का भी निष्पादक होता है । २२