भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 173

१६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम विशेषस्य च भवतु स्वरूपमेव विशेषः ; तथाऽप्यभेदादेव विशेषसहितत्वं नास्तीत्यव्याप्तेरपरिहारात् । यत्तु कश्चिदवोचत्—विशेषशब्देन तेऽभिधीयन्ते, यददर्शने भ्रमसंशयावकाशः, यद्दर्शने च बाधाबाधव्यवस्था तदनभ्युपगमे तत्त्वात्त्वविभागो न स्यात् । भवित- व्यञ्च तेन ; अन्यथा व्याघातादिति । तदयुक्तम् ; न तावदेवंविधो विशेषोऽभिधातुं शक्यो यदवगमस्य न भ्रमत्वादि- सम्भवः, स्वप्नदृशः सर्वविशेषोपलम्भात् । न च व्याघातदण्डभयमात्रादसौ उप- पादयितुमशक्योऽपि अभ्युपगन्तव्य इति युक्तम् । तदुपदर्शनाशक्यत्वेन व्याघात- परिहार एव कश्चिदन्यो निर्वक्तुमशक्योऽस्तीत्येव तदा किं न व्यवस्थाप्यते ? न हि परिदृश्यमानपदार्थगोचरं तदस्ति किञ्चिदनुभूयमानं यत्स्वप्ने वा किञ्च—'यद्यपि विशेष का स्वरूप ही विशेष है, तथापि अभेद होने से ही विशेषसहित विशेष नहीं हैं, अतः विशेष की प्रमा में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—जिसके न जानने से भ्रम या सन्देह होता हो और जिसके दर्शन से बाध या अबाध की व्यवस्था होती हो, वही विशेष है । उसके न मानने पर तत्त्व- अतत्त्व का विभाग नहीं होगा और वह तो होना ही चाहिए, अन्यथा व्याघात हो जायगा । अर्थात् तत्त्व-अतत्त्व का विभाग न होने पर पूछा जा सकता है कि संपूर्ण ज्ञान प्रमा है या अप्रमा ही; किंवा किञ्चित् ज्ञान प्रमा है और किञ्चित् ज्ञान अप्रमा ? यदि प्रथम पक्ष मानें, तो वादी का ज्ञान भी प्रमा होने से उसके खण्डन में प्रवृत्ति व्यर्थ होगी। यदि सब ज्ञान अप्रमा ही मानें, तो आपका ज्ञान भी अप्रमा हुआ; फलतः उसका समर्थन व्यर्थ है। यदि किञ्चित् ज्ञान प्रमा और किञ्चित् अप्रमा हो, तो वह 'प्रमा-अप्रमा का विभाग नहीं होगा' इस पूर्वोक्त कथन से 'मुख में जिह्वा नहीं है' इस कथन के तुल्य व्याहत होगा । खण्डन—ऐसा कोई विशेष नहीं है, जिसका ज्ञान भ्रम न कहा जाय; कारण स्वप्न में सभी विशेष भासते हैं और स्वप्नज्ञान को सभी भ्रम मानते हैं। जिसका समर्थन ही न हो सके, ऐसे विशेष को एकमात्र व्याघात के भय से मान लेना उचित नहीं, कारण ऐसे विशेष को स्वीकार न कर उक्त व्याघात का ही कोई अनिर्वचनीय परिहार क्यों न मान लिया जाय ? समर्थन—विशेष का प्रतिपादन अशक्य है और व्याघात का अन्य परिहार भी अनिर्वचनीय है, अतः एकादेशी प्रमाण के अभाव में हम विशेष को ही क्यों न