भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेदं ] सम्यक्त्व का खण्डन १५७ वाक्याभासे वा प्रतिपत्तुमशक्यमिति प्रतिपत्त्यारूढतया येयमप्रतीयमानकल्पना, ततो वरमनुपलभ्यमानस्य व्याघातपरिहारस्यैव कल्पना भद्रा । बहुशश्च व्याघातो- द्भावनविभीषिकामुन्मूलयिष्यामः । ननु न ब्रूमो विशेषेण सहोपलम्भो विशेषसहितोपलम्भ इति । किं नाम ? विशेषेण सहितस्य पदार्थस्योपलम्भः । तथा च न शुक्तौ रजतत्वं विशेषोऽस्ति । तत्कथं रजतेऽभ्रमेऽपि तत्प्रसङ्ग इति । मैवम् ; उक्तदोषेणैव निरस्तत्वात् । यदि हि विशेषस्य सामान्यतोऽभिधा- नम्, तदा पुरोवर्तित्वादेः सत्त्वान्न प्रसङ्गनिवारणम् । विशेषेण तदभिधाने तु अननुगम इति । 'बाधाबाधव्यवस्थाहेतुरस्ति विशेषः' इति पक्षं यस्तु जडतरो न जहाति, स मानें । खंडन— स्वप्न में न रहनेवाला ऐसा कोई भी ज्ञान अनुभव में नहीं आता, जिसके दृश्यमान पदार्थ विशेष रूप से विषय न हों । इसलिए इस न्याय से सभी विषय स्वाप्न ज्ञानमें आ जाने के कारण अप्रतीयमानता की कल्पना अनुपलब्भ से बाधित, अतएव विरुद्ध है । उसकी अपेक्षा अनुपलभ्यमान व्याघात-परिहार की कल्पना ही अविरुद्ध होने से उचित होगी । अर्थात् अप्रविषयत्व बाधित है, इस प्रकार विशेष कल्पनाकर व्याघात का परिहार करने की अपेक्षा अनुपलभ्यमान- हेतुक व्याघात-परिहार ही उचित है । व्याघातोद्भावनरूप इस विभीषिका का उन्मूलन तो हम सर्वविरोध-खण्डन के प्रस्ताव में अनेक प्रकार से करेंगे । समर्थन— हम विशेष धर्म के साथ उपलम्भ को 'विशेषसहित उपलम्भ' नहीं कहते, किन्तु विशेष के सहित पदार्थ के उपलम्भ को ही विशेषसहित उपलम्भ कहते हैं । एवञ्च शुक्ति में रजतत्वरूप विशेष नहीं है, अतः रजतभ्रम में अतिव्याप्ति नहीं होगी । खंडन—यदि सामान्यरूप से विशेष का उपादान करे, तो पुरोवर्तित्व ( इदन्त्व ) सहित शुक्ति का अवगाहन करने से 'इदं रजतम्' यह ज्ञान भी प्रमा हो जायगा । यदि विशेष रूप से कहें, अर्थात् जो ज्ञान जिस धर्म से विशिष्ट धर्मी का अवगाहन करता हो, उस धर्मविशिष्ट धर्मी-अंश में वह प्रमा है, तो यत्-तत् से घटित होने से लक्षण का अनुगम ही नहीं होगा । फिर भी जो जडतर मनुष्य अपना यह पक्ष छोड़ना नहीं चाहता कि 'बाध-अबाध की व्यवस्था का हेतु विशेष है', तो उसे यह कहकर समझाना चाहिए कि जब आप्त