खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
परिच्छेदं ] सम्यक्त्व का खण्डन १५७ वाक्याभासे वा प्रतिपत्तुमशक्यमिति प्रतिपत्त्यारूढतया येयमप्रतीयमानकल्पना, ततो वरमनुपलभ्यमानस्य व्याघातपरिहारस्यैव कल्पना भद्रा । बहुशश्च व्याघातो- द्भावनविभीषिकामुन्मूलयिष्यामः । ननु न ब्रूमो विशेषेण सहोपलम्भो विशेषसहितोपलम्भ इति । किं नाम ? विशेषेण सहितस्य पदार्थस्योपलम्भः । तथा च न शुक्तौ रजतत्वं विशेषोऽस्ति । तत्कथं रजतेऽभ्रमेऽपि तत्प्रसङ्ग इति । मैवम् ; उक्तदोषेणैव निरस्तत्वात् । यदि हि विशेषस्य सामान्यतोऽभिधा- नम्, तदा पुरोवर्तित्वादेः सत्त्वान्न प्रसङ्गनिवारणम् । विशेषेण तदभिधाने तु अननुगम इति । 'बाधाबाधव्यवस्थाहेतुरस्ति विशेषः' इति पक्षं यस्तु जडतरो न जहाति, स मानें । खंडन— स्वप्न में न रहनेवाला ऐसा कोई भी ज्ञान अनुभव में नहीं आता, जिसके दृश्यमान पदार्थ विशेष रूप से विषय न हों । इसलिए इस न्याय से सभी विषय स्वाप्न ज्ञानमें आ जाने के कारण अप्रतीयमानता की कल्पना अनुपलब्भ से बाधित, अतएव विरुद्ध है । उसकी अपेक्षा अनुपलभ्यमान व्याघात-परिहार की कल्पना ही अविरुद्ध होने से उचित होगी । अर्थात् अप्रविषयत्व बाधित है, इस प्रकार विशेष कल्पनाकर व्याघात का परिहार करने की अपेक्षा अनुपलभ्यमान- हेतुक व्याघात-परिहार ही उचित है । व्याघातोद्भावनरूप इस विभीषिका का उन्मूलन तो हम सर्वविरोध-खण्डन के प्रस्ताव में अनेक प्रकार से करेंगे । समर्थन— हम विशेष धर्म के साथ उपलम्भ को 'विशेषसहित उपलम्भ' नहीं कहते, किन्तु विशेष के सहित पदार्थ के उपलम्भ को ही विशेषसहित उपलम्भ कहते हैं । एवञ्च शुक्ति में रजतत्वरूप विशेष नहीं है, अतः रजतभ्रम में अतिव्याप्ति नहीं होगी । खंडन—यदि सामान्यरूप से विशेष का उपादान करे, तो पुरोवर्तित्व ( इदन्त्व ) सहित शुक्ति का अवगाहन करने से 'इदं रजतम्' यह ज्ञान भी प्रमा हो जायगा । यदि विशेष रूप से कहें, अर्थात् जो ज्ञान जिस धर्म से विशिष्ट धर्मी का अवगाहन करता हो, उस धर्मविशिष्ट धर्मी-अंश में वह प्रमा है, तो यत्-तत् से घटित होने से लक्षण का अनुगम ही नहीं होगा । फिर भी जो जडतर मनुष्य अपना यह पक्ष छोड़ना नहीं चाहता कि 'बाध-अबाध की व्यवस्था का हेतु विशेष है', तो उसे यह कहकर समझाना चाहिए कि जब आप्त
१५८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम 'आप्तानाप्तवाक्याभ्यां नदीतीरे पञ्च फलानि सन्तीत्येवंरूपाभ्यां प्रतिपाद्यमानेऽर्थे स्थितं किं विशेषमेकत्र पश्यसि, यमपरत्र न पश्यसी'ति पृष्ट्वा प्रतिबोधनीयः । तथाप्यनुपजातप्रबोधस्तु जडतमः कश्चिद्यदि स्यात्, स एवं प्रबोध्यः—'ये ते विशेषान्तरप्रवाहस्वीकारेऽनन्तविशेषापत्तिभयात् त्वया स्वत एव विशेषरूपा इति स्वीकृताः, तेषां स्वरूपं तावत् परस्परव्यावृत्तम्, अतोऽनुगतैकरूपाभावात् अव्यापकत्वं स्यादि'ति । बाधव्यवस्थाहेतुत्वादेव अनुगतिरिति चेन्न । क्वाचित्कबाधव्यवस्थाहेतोर्भ्रमेऽपि प्रकाशात् । तत्र तस्येति चेन्न; व्यावृत्तेः । बाधस्य च तद्विपरीतार्थप्रमात्वेन तदर्थाननुगमात्, प्रमायाश्च अद्याप्यव्य- वस्थापनादिति । और अनाप्त दोनों पुरुष 'नदी-तीर पर पञ्च फल हैं' यह कहें, तो उन दोनों से प्रतिपादित अर्थों में एक स्थल में ( आप्तप्रतिपादनस्थल में ) क्या विशेष देखते हो ! फिर भी कोई इतना जडतम हो, जो यह भी समझ न पाये, उसे इस तरह समझाया जाय कि आप तो विशेष में विशेष और उसमें भी अन्य विशेष स्वीकार नहीं करते; क्योंकि अनन्त विशेषों के स्वीकार में गौरव या अनवस्थादोष हो जायगा । प्रत्युत परस्परव्यावृत्त, विशेषान्तरशून्य अनन्त विशेष ही मानते हैं । अतः कोई उपसंग्राहक रूप न होने से लक्षण में जिस विशेष का निवेश करेंगे, तद्विषयक प्रमा में ही समन्वय हो सकेगा, अन्यविशेषविषयक प्रमा में तो अव्याप्ति ही हो जायगी । समर्थन—'बाध-व्यवस्था-हेतुत्व'रूप से ही सभी विशेषों का संग्रहकर लक्षण बनायेंगे । अर्थात् बाध की व्यवस्था का हेतु जो विशेष तद्विशिष्ट पदार्थके अनुभव को प्रमा कहेंगे । इससे न तो लक्षण का अननुगम होगा और न अव्याप्ति ही । खंडन— सार्वत्रिक बाध की व्यवस्था का हेतुत्व तो कहीं भी संभव नहीं है । यदि क्वचित् बाधव्यवस्था के हेतुत्व को ही विशेष कहें, तो रजतत्व भी वास्तविक रजत में होनेवाले 'इदं रजतम्' इस ज्ञान में बाध-व्यवस्था का हेतु है ही। फलतः शुक्ति में भी 'इदं रजतम्' यह ज्ञान प्रमा हो जायगा । यदि कहें कि जिस स्थल में जो बाध-व्यवस्थापक हो, उसी स्थल में वह विशेष है, तो लक्षण के यत्-तत् से घटित हो जाने से जिस विशेष का यत् शब्द से ग्रहण करेंगे, उससे अन्यत्र लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—विपरीत प्रमामात्र तो बाधक है नहीं, कारण तब तो 'पर्वतो वह्निमान्' इस ज्ञान का 'ह्रदो वह्न्यभाववान्' यह ज्ञान भी बाधक हो जायगा । अतः यही मानना
परिच्छेद ] सम्यक्त्व का खण्डन १५६ शङ्कान्तराणि चात्र अतः पराणि याथार्थ्यविशेषणदूषणदूषितान्येव उपनिप- तन्तीति द्विरभिधानभयान्नोक्तानि। किञ्च—तर्कज्ञानमाहार्यौ च संशयविपर्ययौ परिदृश्यमान एव विशेषे भव- न्तीति तैरतिप्रसङ्गः स्यात्। न चाऽऽहार्यौ तौ नाभ्युपगन्तव्याविति युक्तम्। विप्रलम्भकस्य वाक्यप्रयोगमूलतया आहार्यभ्रमस्य ज्ञाततत्त्वस्य च गुरोः शिष्य- प्रबोधार्थं विचारं प्रवर्तयतश्च आहार्यसंशयानां भवत एव शास्त्रेऽनुमतत्वात्। परिच्छेदशब्दश्च अनुभूतिपर्यायोऽनुभूतिदूषणं नातिक्रामतीत्यलम्। होगा कि जिस धर्मी में जो बाध्य हो, उसमें उस धर्म के अभाव का अवगाही ज्ञान बाधक है। फिर तो लक्षण के यत्-तत् घटित होने से पुनः यदि यत् शब्द से रजतत्व का ग्रहण करें, तो सर्पभ्रम में बाधलक्षण की अव्याप्ति हो जायगी। किञ्च—'सविशेष ज्ञान' को प्रमा कहते हैं, 'बाध-व्यवस्था के हेतु' को विशेष कहते हैं तथा 'तद्विपरीत प्रमा' को बाध कहते हैं—इस रीति से बाध के लक्षण में प्रमा की और प्रमा के लक्षण में विशेष द्वारा बाध की अपेक्षा होने से चक्रक दोष हो जायगा। 'जिस विशेष धर्म से सहित धर्मी हो, उस विशेष से सहित धर्मी का अनुभव प्रमा है,' 'साक्षात् विशेष से सहित धर्मी का अनुभव प्रमा है' या 'भासमान यावद् विशेषों से सहित धर्मी का अनुभव प्रमा है' इन सारी शङ्काओं का खण्डन तो 'यथार्था- नुभवः प्रमा' इस लक्षण के याथार्थ्य-विशेषण के दूषण-प्रस्ताव में हो ही चुका है। अतः पुनरुक्ति के भय से यहाँ फिर इसे नहीं कहते। किञ्च—'यदि वह्निर्न स्यात्तदा धूमोऽपि न स्यात्' यह तर्क 'पर्वतो वह्निमान्' ऐसा विशेष ज्ञान होने पर ही होता है। आहार्य-भ्रम और संशय भी विशेष ज्ञान होने पर ही होते हैं। अतः उनमें लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी। इसपर यह नहीं कह सकते कि 'आहार्य-भ्रम और सन्देह होता ही नहीं, कारण वञ्चक पुरुष को आहार्य-भ्रम होता ही है। अन्यथा वह असत्यार्थक वाक्य कैसे कहता, यह आप भी मानते हैं। साथ ही शिष्य के प्रबोधनार्थ शास्त्रार्थारम्भ करनेवाले तत्त्वज्ञ गुरु का आहार्य-सन्देह भी आपके शास्त्र में स्वीकृत ही है। 'परिच्छेद' शब्द का अर्थ अनुभूति है, अतः वह अनुभूति के दूषणों का अतिक्रमण नहीं कर सकता। अर्थात् अनुभूतित्व जाति या स्मृत्यन्यज्ञानत्व आदि उपाधिरूप नहीं हो सकता, इसका खण्डन हो ही चुका है।
१६० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [प्रथम अव्यभिचारित्व-खण्डनम् नापि अव्यभिचार्यनुभवः प्रमेति युक्तम् । अव्यभिचारिपदस्य यदि तत्त्व- विषयाद्यर्थत्वम्, तदा दूषणान्युक्तान्येवानुवर्तन्ते । अथैवमुच्यते अव्यभिचारित्वमर्थाविनाभूतत्वम् ; तदा प्रष्टव्यं कोऽस्यार्थः— किं यदैवार्थस्तदैव ज्ञानम्, उत यत्रार्थस्तत्रैव देशे ज्ञानम्, अथ यादृगर्थस्तादृगेव ज्ञानं यत्तत्प्रमितिरिति ? नाद्यः, अतीतानागतानुमित्याद्यव्यापनात् । न द्वितीयः ; ज्ञानसमानदेशार्थ- प्रमितीनामव्यापनात् । ज्ञानसमानदेशमर्थमन्यत्र आरोपयतोऽप्यनुभवस्य प्रमा- त्वापत्तेः । नापि तृतीयः; ज्ञानार्थभेदवादे सर्वाकारेण तत्साम्यानुपपत्तेः । अभेदवादे तु भ्रमस्याऽपि तदभ्युपगन्तव्यत्वप्रसङ्गेन विशेषणवैयर्थ्यापातात् । अव्यभिचारित्व का खण्डन खंडन — 'अव्यभिचारी अनुभव प्रमा है' यह लक्षण भी युक्त नहीं, कारण यदि अव्यभिचारी पद का तत्त्वविषयकत्व आदि अर्थ करें, तो उक्त दूषणों की ही आवृत्ति होगी । समर्थन — हम अव्यभिचारी' पद का 'ज्ञान में विषय का अविनाभाव' यह अर्थ करेंगे । खंडन — 'अविनाभाव' शब्द का क्या अर्थ है, क्या समुद्रवृद्धि-चन्द्रोदय के तुल्य जिस काल में अर्थ हो, उसी काल में ज्ञान, हो — यह अर्थ है अथवा धूम-वह्निके तुल्य जिस देश में अर्थ हो, उसी देश में ज्ञान हो — यह अर्थ है, किंवा जैसा अर्थ हो, वैसा ही ज्ञान हो — यह अर्थ है ? यदि प्रथम अर्थ मानें, तो अतीत-अनागत विषयों की अनुमितियों में अव्याप्ति हो जायगी । द्वितीय अर्थ मानें, तो समवाय सम्बन्ध से ज्ञान का देश आत्मा है और वह घट- पटादि अर्थों का देश नहीं है; अतः घटपटादि प्रमा में लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । साथ ही ज्ञान के देश में स्थित आत्मत्व का जो अन्यत्र ( शरीर में ) भ्रम होता है, उस भ्रम में अतिव्याप्ति हो जायगी । यदि तृतीय अर्थ मानें, तो ज्ञान का अर्थ के साथ भेद माननेवाले के मत में ज्ञान तथा अर्थ का सर्वथा सादृश्य न होने से अस- म्भव हो जायगा । ज्ञान तथा अर्थ के अभेदवाद में भ्रमज्ञान में अतिव्याप्ति हो जायगी । व्यवच्छेद न होने से विशेषण भी व्यर्थ हो जायगा ।
परिच्छेद ] अविसंवादित्व का खण्डन १६१ तैस्तैश्च विशेषैः सादृश्यस्य विवक्षितत्वे यथार्थताप्रस्तावोक्तान्येव दूषणानि आवर्तन्त इति । अविसंवादित्व-खण्डनम् अविसंवाद्यनुभवः प्रमेत्यपि न युक्तम् । अविसंवादित्वं हि ज्ञानान्तरेण तथैवोल्लिख्यमानार्थत्वं वा, ज्ञानान्तरेण विपरीततया अप्रतीयमानार्थत्वं वा, प्रती- यमानव्याप्यविषयत्वं वा, अन्यदेव वा किञ्चित् ? न प्रथमः ; धारावाहिनो भ्रमस्य प्रमात्वप्रसङ्गात् । न च प्रमाभूतं ज्ञानान्तरं विवक्षितमिति वाच्यम् ; प्रमाया एव लक्ष्यमाणत्वात् । नापि द्वितीयः ; अज्ञातबाधभ्रमव्यापनात्, स्वस्थदशोत्पन्नस्य शुक्लशङ्खज्ञानादेः 'जो धर्म अर्थ में हो, वही ज्ञान में भासता है' इस तरह का अर्थसाम्य अनुभव में मानें, तो याथार्थ्य-प्रकरण में उक्त दोष हो जायँगे । अर्थात् विशेषमात्र का अभिधान करेंगे, तो भ्रमादि में अतिव्याप्ति होगी । तत्तत् विशेष व्यक्ति कहेंगे, तो अननुगम होगा, ये सभी दोष आ जायँगे । अविसंवादित्व का खण्डन 'अविसंवादी अनुभव प्रमा है' यह लक्षण भी युक्त नहीं है, कारण 'अविसंवादी' शब्द का कुछ अर्थ ही नहीं हो सकता । देखिए—क्या जिस ज्ञान का विषय उत्तर- ज्ञान से उल्लिख्यमान हो, वह अनुभव अविसंवादी है; जिस अनुभव के विषय का अभाव उत्तर-ज्ञान का विषय न हो, वह अनुभव अविसंवादी है; जिस अनुभव के विषय का व्याप्य प्रतीयमान हो, वह अनुभव अविसंवादी है अथवा और ही कुछ अविसंवादित्व है ? इनमें प्रथम कल्प युक्त नहीं है; कारण धारावाही भ्रम में पूर्व-पूर्व भ्रम का विषय उत्तर-उत्तर ज्ञान का विषय होता ही है, अतः उसमें अतिव्याप्ति हो जायगी । यदि कहें कि प्रमात्मक ज्ञानान्तर से जिस अनुभव का विषय उल्लिख्यमान हो, वह अविसंवादी है, तो वह भी उचित नहीं; कारण प्रमा का अभीतक निर्वचन ही नहीं हो पाया है । अतः प्रमा से प्रमा की निरुक्ति होने के कारण आत्माश्रय तथा प्रमा से अविसंवादित्व की निरुक्ति तथा अविसंवादित्व से प्रमा की निरुक्ति होने के कारण अन्योन्याश्रय हो जायगा । द्वितीय कल्प भी उचित नहीं, कारण जिस भ्रम का बाध नहीं हुआ है, उस भ्रम में अतिव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—स्वस्थ-दशा में उत्पन्न 'शुक्लः शंखः' इस २१
१६२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम दुष्टेन्द्रियदशोत्पन्नतत्पीतमज्ञानाद्युल्लिखितविषयवैपरीत्यस्य अप्रमात्वप्रसङ्गाच्च । प्रमित्यानुल्लिखितार्थवैपरीत्यमात्रविवक्षायां तु प्रमाया एव लक्ष्यमाणत्त्वादि- त्युक्तमनुषज्जति । अदुष्टकरणकज्ञानेनाबाधितत्वं विवक्षितमिति चेत् ; तदेव तर्हि प्रमालक्षणमस्तु । किञ्च—दुष्टत्वनिरूपणमन्तरेण अदुष्टत्वस्य दुर्निंरूपत्वात् । ननु किमेतावता ? दुष्टत्वं विपरीतज्ञानप्रयोजकस्तद्धेतुगतो विशेष इति सुवचमेवेति । न; विपरीतपदव्यवच्छेद्याप्रमितौ तदुपादानवैयर्थ्यात् । तदनुपादाने च ज्ञानजनकत्वमात्रं दुष्टत्वमिति अदुष्टकरणजं ज्ञानं नास्त्येवेति स्यात् । विपरीतपदव्यवच्छेद्या प्रमैवेति चेन्न । तस्या एव लक्ष्यमाणत्वात् । तदीय- ज्ञान का भी पित्तरोग से दूषित दशा में उत्पन्न 'पीतः शंखः' इस ज्ञान से बाध होने के कारण 'शुक्लः शंखः' यह ज्ञान भी प्रमा न होगा। यदि कहें कि जिस अनुभव के विषय का अभाव प्रमा से उल्लिख्यमान न हो, वह अविसंवादी है, तो प्रमा से प्रमा की निरुक्ति होने के कारण आत्माश्रय और प्रमा से अविसंवादित्व की तथा अविसंवादित्व से प्रमा की निरुक्ति होने के कारण अन्योन्याश्रय हो जायगा । समर्थन—'अदुष्ट-इन्द्रियजन्य ज्ञान से जो ज्ञान बाधित न हो, वह अविसंवादी है' ऐसा कहेंगे, तब तो 'शुक्लः शंखः' इस प्रमा में न अव्याप्ति है और न आत्माश्रय ही है । खण्डन—फिर तो लाघव होने से 'अदुष्ट-इन्द्रियजन्य अनुभव' ही प्रमा का लक्षण मानिये । किञ्च—जबतक दुष्टत्व की निरुक्ति न हो, तबतक अदुष्टत्व का निरूपण भी असंभव ही है । समर्थन—विपरीत ज्ञान का प्रयोजक तथा हेतुगत विशेष को ही दोष कहा जा सकता है । खण्डन—'विपरीत' पद के निवेश से किसका व्यवच्छेद होगा ? यदि व्यवच्छेद्य की प्रतीति न हो, तो विपरीत पद का निवेश व्यर्थ ही हो जायगा । यदि विपरीत पद का निवेश न करें, तो ज्ञानमात्रजनकत्व ही दुष्टत्व होगा । तब कोई भी ज्ञान अदुष्ट इन्द्रियजन्य न होगा । समर्थन—'विपरीत' पद का व्यवच्छेद्य प्रमा ही है, अतः निवेश व्यर्थ नहीं है । खंडन—अभी तो प्रमा का लक्षण ही कर रहे हैं, अतः इतरव्यावृत्त रूप से उसका स्वरूप-निर्धारित ही नहीं हुआ है। फिर उसका व्यवच्छेद कैसे होगा ? इसके अतिरिक्त, इतर-व्यावृत्त प्रमा की प्रतीति के बिना लक्षण द्वारा इतरव्यावृत्त प्रमा की
परिच्छेद ] अविसंवादित्व का खण्डन १६३ स्वरूपस्येतरव्यावृत्तस्य अद्याप्यप्रतीतेः कुतो व्यवच्छेदः प्रत्येत्तव्य इति व्यवच्छिन्नतज्ज्ञानमन्तरेण व्यवच्छिन्नतज्ज्ञानमशक्यमिति आत्माश्रयान्योन्याश्रयौ अनवस्था वा । एकोऽनेकविशेषेऽर्थे विशेषो यत्र लक्ष्यते । तद्विशेषान्तरान्यत्वाद् दोषस्तत्रैव धावति ॥ ३२ ॥ नापि तृतीयः ; व्याप्यशब्देन व्याप्यमात्रम्, तद्विशेषो वा कश्चिदभिप्रेतः स्यात् ? आद्ये सधूमाग्निविषयस्य स्वप्नज्ञानस्य अनाप्तवाक्यजबोधस्य वा नाप्र- मात्वं स्यात् । नापि द्वितीयः ; स ह्यर्थक्रिया वा, सामग्री वा ? उभयत्रापि पूर्वदोषानिवृत्तेः । प्रतीति अशक्य होने से आत्माश्रय होगा; इतरव्यावृत्त प्रमा के अधीन दुष्टत्व का ज्ञान और दुष्टत्वज्ञान के अधीन अदुष्ट-इन्द्रियजन्य ज्ञान से अबाधितरूप अविसंवादित्व के ज्ञान द्वारा प्रमा का ज्ञान होने से अन्योन्याश्रय होगा अथवा प्रमाज्ञान के अधीन दुष्टत्व का ज्ञान और दुष्टत्वज्ञान के अधीन अदुष्ट-इन्द्रियजन्य-ज्ञान, उससे अबाधितत्वरूप अविसंवादित्व का ज्ञान तथा उक्त अविसंवादित्व के ज्ञान के अधीन प्रमा का ज्ञान इस प्रकार चक्रक भी हो जायगा । यदि विपरीत पद से व्यवच्छेद्य प्रमा की और ही कुछ निरुक्ति करें, तो आत्माश्रय आदि तो न होगा, किन्तु उस प्रमा की निरुक्ति में भी अन्य प्रमा की अपेक्षा होगी और उसके लिए अन्य प्रमा की, इस तरह अनवस्था हो जायगी । इसी प्रकार जिस ज्ञान आदि पदार्थों के अनुभव, स्मरण आदि अनेक विशेष हैं और एक विशेष अन्य विशेष से अन्यत्वरूप से लक्षित होता है, अर्थात् अनुभव स्मरणान्यत्व से तथा स्मरण अनुभवान्यत्व से लक्षित होता है, वहाँ सर्वत्र आत्माश्रय आदि दोष होंगे । देखिये—अनुभव से अन्य ज्ञान स्मरण है और स्मरण से अन्य ज्ञान अनुभव । अतः स्मरण का निष्कृष्ट लक्षण हुआ—‘स्मरणान्यज्ञानान्यज्ञानत्वम्’ । इस लक्षण में स्मरण पद का प्रक्षेप होने से आत्माश्रय है । साथ ही स्मृति के लक्षण में अनुभव की और अनुभव के लक्षण में स्मृति की अपेक्षा होने से अन्योन्याश्रय भी है । ‘जिस ज्ञान के विषय का व्याप्य प्रतीयमान हो, वह ज्ञान अविसंवादी है’ यह तृतीय पक्ष भी उचित नहीं; कारण ‘व्याप्य’ शब्द से यदि व्याप्यमात्र का ग्रहण करें, तो सधूम वह्नि का स्वप्नज्ञान तथा अनाप्तवाक्य से जात ज्ञान भी प्रमा हो जायगा । यदि ‘व्याप्य’ शब्द से व्याप्य-विशेष ( अर्थक्रिया या सामग्री ) का ग्रहण करें, तो भी धूम-सहित वह्नि के स्वप्नज ज्ञान में या अनाप्तवाक्य से जनित ज्ञान में ही अतिव्याप्ति हो जायगी ।
२. द्वितीय परिच्छेद: न्यायोक्त प्रमा, भ्रम, संशय एवं तर्क-लक्षण खण्डन
१६४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [प्रथम एकदा च सर्वत्र प्रमाणासम्भवेन क्रमाश्रयणे तत्तदर्थक्रियातत्तत्सामग्रीपर- म्परावगमनियमाभ्युपगमे एकस्मिन्नेव विषये पुरुषायुषः पर्यवसानप्रसङ्गात् । विच्छेदाभ्युपगमे त्वन्तिमावगमस्याप्रामाण्यात् आप्रथममप्रमात्वापत्तेः । वास्तव- तदर्थक्रियात्वस्य च दुर्निरूपत्वेन व्यवहारानर्हत्वात् । तथाप्रतीतिमात्रस्य भ्रमासाधारण्यात् । नन्वेवं चतुर्थः पक्षोऽस्तु । तथा हि—अर्थक्रियाकारिविषयत्वं वाऽविसंवादि- त्वमिति । यथाऽऽह—'प्रमाणमविसंवादिज्ञानमर्थक्रियास्थितिश्वाऽविसंवादः' इति । न ; सामान्यतो विवक्षायां भ्रान्तावपि प्रसङ्गात् । प्रतीयमानरूपेणार्थक्रियाकारित्वमर्थस्य विवक्षितमिति चेन्न । दुरवधारणत्वात् । किञ्च—युगपद् अनेक ज्ञान नहीं होते, अतः व्यापक के प्रतीतिकाल में व्याप्य की प्रतीति नहीं होगी, वह क्रम से ही होगी । अर्थात् व्यापक की प्रतीति के उत्तर- काल में ही व्याप्य की प्रतीति होगी । ऐसा मानने पर पूर्वज्ञानगत प्रमात्व उत्तरक्षण में उत्पन्न अर्थक्रिया की प्रतीति या सामग्री की प्रतीति से गृहीत होगा, वह अर्थक्रिया- प्रतीतिगत प्रमात्व भी उससे उत्तरक्षण में उत्पन्न अर्थक्रिया की प्रतीति से गृहीत होगा, इस तरह पूर्व पूर्वप्रतीति के प्रमात्व में अपर-अपर प्रतीति की अपेक्षा होने से अन- वस्था हो जायगी । यदि अर्थक्रिया की प्रतीति की धारा का कहीं विच्छेद मानें, तो अन्तिम अर्थक्रिया की प्रतीति के अप्रमा होने से मूलपर्यन्त अप्रमात्व हो जायगा । किञ्च--यदि अर्थक्रिया वास्तविक लें, तो प्रमितित्व से इतर वास्तविकत्व हो नहीं सकता और प्रमिति का अभीतक निर्वचन ही नहीं हुआ है । यदि केवल अर्थक्रिया की प्रतीति का ही ग्रहण करें, तो भ्रमस्थल में भी अर्थक्रिया की प्रतीति होने से अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'अर्थक्रियाकारित्व अविसंवाद है' यह चतुर्थ पक्ष ही मानेंगे । धर्मकीर्ति ( बौद्ध आचार्य ) ने भी कहा है कि 'अविसंवादी ज्ञान प्रमा है और अर्थक्रियाकारित्व ही अविसंवाद है।' खंडन—यदि अर्थक्रियाकारित्व सामान्यरूप से अभिप्रेत हो, तो शुक्तिरूप से अर्थक्रियाकारित्व भ्रम में भी है, अतः भ्रम में अतिव्याप्ति हो जायगी । यदि कहें कि प्रतीयमान धर्म से अर्थक्रियाकारित्व अभिप्रेत है । एवञ्च भ्रम में प्रतीयमान रजतत्वरूप से अर्थक्रियाकारित्व न होनेसे अतिव्याप्ति नहीं है, तो वह भी ठीक नहीं; क्योंकि रजतमें दृष्ट भी अङ्गुलीयरूप अर्थक्रियाका कर्तृत्व रजतत्वरूपसे
परिच्छेद ] अविसंवादित्व का खण्डन १६५ तदर्थक्रियादर्शनात् तदवधारणमिति चेन्न । विनाप्यर्थक्रियां तद्दर्शनसम्भवात् । अर्थक्रियाप्रमितिरभिधित्सितेति तु दूषितमेव, प्रमाया एव निरूप्यमाणत्वात् । अभिप्रायविसंवादात् प्रमायां सर्वमुच्यत इति चेन्न । तदा अभिप्रायविसंवादस्य स्वप्नादिप्रत्ययेऽपि सम्भवात् । कालान्तराविसंवादस्य च दुरवधारणत्वात् । एतेन 'प्राप्त्यादियोग्यता अविसंवादार्थ इत्यपि निरस्तम् । दुराबाध इव चायं धर्मकीर्तेः पन्था इत्यवहितेन भाव्यमिहेति । है या मुद्रादिरूपसे, इसका अवधारण नहीं हो सकता। अतः रजत में होनेवाले 'इदं रजतम्' इस ज्ञान में भी अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—अङ्गुलीयरूप अर्थक्रिया के दर्शन से ही रजतत्व का अवधारण करेंगे । खंडन—जैसे रजतत्व के बिना भी रजतत्व का भ्रम होता है, वैसे ही अर्थक्रियाकारित्व के बिना भी अर्थक्रियाकारित्व का भ्रम हो सकता है । अतः अर्थक्रिया के दर्शन मात्र से रजतत्व का अनुमान नहीं हो सकता । यदि कहें कि अर्थक्रिया की प्रमिति से रजतत्व का अवधारण करेंगे, तो वह भी नहीं कह सकते, कारण प्रमिति का अभीतक निर्धारण ही नहीं हुआ है । समर्थन—अभिप्राय ( इच्छा या प्रवृत्ति ) के अविसंवाद से सम्पूर्ण ज्ञान प्रमा कहे जाते हैं । खण्डन—वह अविसंवाद ज्ञानकाल में अभिप्रेत है या सभी कालों में ? यदि कहें कि ज्ञानकाल में, तो भ्रमस्थल में भी ज्ञानकाल में अविसंवाद होने से भ्रम में अतिव्याप्ति हो जायगी । यदि कहें कि सभी कालों में अविसंवाद अभिप्रेत है, तो 'इस ज्ञान में कदापि अविसंवाद नहीं होगा' यह बात दुर्ज्ञेय है । प्रत्युत सम्भव है कि स्वप्नकाल में सर्वविध ज्ञानों में विसंवाद हो, अतः लक्षण में असम्भव दोष हो जायगा । समर्थन—प्राप्तियोग्यता अविसंवाद है और उससे युक्त अनुभव प्रमा है । खंडन—यदि ज्ञानकालमें प्राप्ति की योग्यता कहें, तो वह भ्रम में भी है, अतः उसमें अतिव्याप्ति हो जायगी । यदि सर्वकाल में प्राप्ति की योग्यता कहें, तो उसका अवधारण प्रमा में भी नहीं हो सकता, अतः असंभव हो जायगा । इसलिए प्राप्ति की योग्यता को प्रमा मानना भी असङ्गत है । धर्मकीर्ति के इस प्रमालक्षण का खण्डन मन्दबुद्धियों को अशक्य-सा प्रतीत होता है । अतः इससे सावधान रहना चाहिए ।
१६६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अबाधितत्वादि-खण्डनम् अबाधितानुभूतिः प्रमेत्यपि निरस्तम् । तदानीं बाधाविरहस्य अतिप्रसञ्जक- त्वात्, कालान्तरेऽपि च बाधाविरहस्य दुर्निरूपत्वात् । स्वतो बाधाविरहस्य अति- प्रसञ्जकत्वात् । सर्वजनबाधाविरहस्य च दुरवधारकत्वादिति । तर्कसंशयविपर्ययस्मृतिव्यतिरिक्ता प्रतीतिः प्रमेत्यपि न । स्मृतिव्यतिरिक्तत्व- खण्डनन्यायेन निरस्तत्वादिति । जातिसङ्करमिच्छतश्च प्रमात्वलक्षणजात्यभिसम्बन्धात् प्रमेत्यपि दुर्लक्षणम् । अस्याज्ञातस्य तद्व्यवहारजनकत्वे प्रमायामप्रमाभ्रमसंशयौ न स्याताम् । अबाधितत्वादि का खण्डन इसी तरह 'अबाधित अनुभूति प्रमा है' यह लक्षण भी नहीं हो सकता । कारण यदि अबाधितत्व ज्ञानकाल में कहें, तो वह भ्रम में भी है । यदि सभी कालों में अबाधितत्व कहें, तो वह प्रमा में भी नहीं है, क्योंकि सम्भव है कि स्वप्न में प्रमा का भी बाध हो जाय । किञ्च—यह अबाध द्रष्टा का ही अभिप्रेत है या मनुष्यमात्र का ? यदि द्रष्टा का अबाध कहें, तो सम्भव है कि कहीं भ्रान्त मनुष्य को अपने भ्रमज्ञान में कभी उत्तर काल में बाध ही न हो । अतः उस भ्रम से अतिव्याप्ति हो जायगी । यदि सब मनुष्यों का अबाध अभिप्रेत हो, तो वह दुर्ज्ञेय ही है । निर्वचन—तर्क, संशय, विपर्यय और स्मृति से व्यतिरिक्त ज्ञान को ही प्रमा कहेंगे । खण्डन—स्मृति-व्यतिरिक्तत्व के खण्डन की रीति से इस लक्षण का भी खण्डन हो जायगा । अर्थात् यदि यत्किञ्चित् तर्कादिव्यतिरिक्तत्व कहें, तो तद्व्यतिरिक्त तर्कादिव्य- क्तियोंमें अतिव्याप्ति होगी । यदि सम्पूर्ण तर्कादिव्यतिरिक्तत्व कहें, तो हम-आप जैसे असर्वज्ञों को वैसा ज्ञान ही नहीं हो सकता, अतः यह लक्षण संभव नहीं । समर्थन—'प्रमात्वजातिविशिष्ट प्रमा है' ऐसा ही लक्षण करेंगे । खंडन—यह लक्षण भी उचित नहीं है, कारण साक्षात्त्व को छोड़कर प्रमात्व अनुमिति में है और प्रमात्व को छोड़कर साक्षात्त्व भ्रम में है तथा दोनों का समावेश प्रत्यक्ष-प्रमा में है; अतः सङ्कर दोष होने से प्रमात्व जाति ही नहीं हो सकती । समर्थन — संस्कारमात्र से अतिरिक्त अदुष्टकरणजन्य प्रतीतित्व को प्रमात्व का प्रयोजक मानेंगे और इन्द्रियाजन्यप्रतीतित्व को परोक्षत्व का प्रयोजक। एवञ्च व्यंजक उपाधि भिन्न-भिन्न होने से सांकर्य नहीं होगा । खण्डन—प्रमात्वजातिरूप लक्षण 'इयं प्रमा' इस व्यवहार का अज्ञात प्रयोजक है या ज्ञात ? यदि अज्ञात कहें, तो कभी किसी भी
१ परिच्छेद ] अबाधितत्त्वादि का खण्डन १६७ दोषाभावसहकृतस्य तथात्वे च अजायमानभ्रमसंशयप्रमादिव्यवहारे ज्ञानमात्राव- गमोदाहरणेऽपि तदापत्तेः । ज्ञातेनानेन लक्षणेन व्यवहारे च कथमिदमेव ज्ञातव्यमिति वक्तव्यम् । न तावत्प्रत्यक्षेण मानसेन ; तथा सति क्वचिज्ज्ञातायां प्रमायामप्रमाविपर्ययसंशया- नवकाशादि स्यात् । धर्मिवत् मनसैव निर्णीतत्वात् । चिह्नान्तरसापेक्षेणैव मनसा संवेदनचिह्नेनैव वा तेनैव लक्षणीभूय ज्ञापन- मित्यपि प्रत्याशामात्रम् । तच्चिह्नेनैव प्रमात्वजातिकल्पनाप्रतिच्छेदापत्तेः । प्रमा में अप्रमात्व का भ्रम या सन्देह नहीं होगा। अर्थात् जब ज्ञात लक्षण को 'इयं प्रमा' इस व्यवहार का प्रयोजक मानें, तब तो कह सकते हैं कि प्रमात्वरूप लक्षण का ज्ञान न होने पर 'इयं प्रमा' यह व्यवहार नहीं होता; प्रमात्व का भ्रम या सन्देह ही होता है । किन्तु जब अज्ञात ( स्वरूपसत् ) ही लक्षण व्यवहार का प्रयोजक हो, तब तो प्रमा में सदा 'इयं प्रमा' यही व्यवहार होना चाहिए । समर्थन — दोषाभाव से सहित, स्वरूपसत् प्रमात्वरूप लक्षण 'इयं प्रमा' इस व्यवहार का प्रयोजक है । अतः जहाँ दोष हो, वहाँ 'इयं प्रमा' यह व्यवहार नहीं होता; किन्तु भ्रम या सन्देह ही होता है । खंडन — जो ज्ञान वस्तुतः प्रमा है, किन्तु प्रमात्व- रूपसे ज्ञात नहीं है केवल ज्ञानत्वरूप से ही अवगत है और जिसमें भ्रम या सन्देह भी नहीं है, वहाँ 'इयं प्रमा' यह व्यवहार होना चाहिए, कारण दोषाभाव से सहित, स्वरूपसत् प्रमात्व वहाँ विद्यमान है । यदि ज्ञात लक्षण व्यवहार का प्रयोजक हो, तो लक्षण का ज्ञान कैसे हुआ, यह पूछना चाहिए । मानस प्रत्यक्ष से लक्षण का ज्ञान होता है, यह तो कह नहीं सकते, कारण कहीं-कहीं प्रमा होने पर भी प्रमात्व का जो सन्देह या भ्रम होता है, वह [ धर्मी- प्रमा के ज्ञान के तुल्य प्रमात्व का भी मानस प्रत्यक्ष हो जाने से ] नहीं होगा । समर्थन — अन्य चिह्न से युक्त मन से प्रमात्व का ज्ञान होता है अथवा चिह्न ही लिङ्गरूप से प्रमात्वरूप लक्षण की अनुमिति का हेतु है । अतः चिह्न रूप सहकारी के अज्ञान में अप्रमात्व का भ्रम हो सकता है । खण्डन — यदि ऐसा है, तो उसी चिह्न से 'इयं प्रमा' यह व्यवहार हो जायगा । फिर प्रमाण के अभाव से प्रमात्वजाति की सिद्धि ही न होगी ।
| १६८ | सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य | [ प्रथम |
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तेषां नानात्वे च कानि तानीति वक्तव्यं स्यात् । तच्चिह्नानां यथोपन्यासं सर्वेषामेव दूषितत्वात् । प्रामाण्यपरतस्त्वव्युदस्तप्रस्तावे च विस्तरेण दूषयिष्यामः । एतेन शक्तिविशेषः प्रमात्वम्, तद्योगः प्रमालक्षणमित्यपास्तम् । दुरव- धारकत्वात् । यच्च किञ्चित्प्रमाया लक्षणमुच्यते तदज्ञातं ज्ञातमात्रं वा यदि तत्त्वव्यवहारकम्, तदा अत्यापत्तिः । प्रमितञ्चेत् प्रमाणवधारणे तद्दुदुरवधारकत्वात् । माऽवधारि वस्तुतस्तु तथेति चेन्न । वस्तुतो न तथैव किं नेति वादिन्यनुत्तरा- समर्थन—प्रमा के अनेक चिह्न हैं, इसलिए उन चिह्नों से 'इयं प्रमा' इस अनुगत बुद्धि का समर्थन नहीं हो सकता । अतएव अनुगत बुद्धि के समर्थन के लिए प्रमात्व जाति मानी जाती है । खंडन—'तत्त्वानुभूतित्व' आदि उन चिह्नों का खण्डन यथास्थान कर ही आये हैं । अतः चिह्नों के सहकार से प्रमात्व का मानस प्रत्यक्ष होता है, यह कथन असङ्गत है । किञ्च—'प्रमात्व स्वतोग्राह्य है या परतः' इसके खण्डन के प्रस्ताव में प्रमात्व का चिह्न से सहकृत मानस प्रत्यक्ष होता है, इसका विस्तार से खण्डन करेंगे । समर्थन—प्रमा में अर्थावबोध की जो शक्ति है, वह शक्ति ही प्रमात्व है और प्रमात्वयोग ही प्रमा का लक्षण है । खंडन—यदि इस लक्षण को अज्ञातरूपेण व्यवहार का कारण मानें, तो प्रमात्व का भ्रम या सन्देह न होना चाहिए । यदि ज्ञात व्यवहार का कारण मानें, तो जिस चिह्न से वह ज्ञात होता है, वही चिह्न लक्षण हो, शक्ति का स्वीकार व्यर्थ है, इत्यादि पूर्वोक्त दोषों से शक्तिपक्ष भी असङ्गत है । आप प्रमा का कोई भी लक्षण करें, अज्ञात या केवल ज्ञातरूप में प्रमात्वव्यवहार का कारण मानें, तो भ्रमस्थल में भी प्रमात्व का व्यवहार होना चाहिए । कारण यदि अज्ञात प्रयोजक है, तो अज्ञात-दशा में सत्त्व-असत्त्व दोनों एक से हैं, उनमें भेद तो है नहीं । फिर जहाँ असत् है, वहाँ भी व्यवहार होना चाहिए । साथ ही अप्रमा में भी प्रमात्व का भ्रम या सन्देह हो सकता है । यदि कहें कि 'इदं लक्षणं प्रमितम्' ईदृश ज्ञान का विषय लक्षण व्यवहार का जनक है, तो अद्यावधि प्रमा की निरुक्ति न होने से इस कार्यकारणभाव के नियम में प्रमिति विशेषण [ असिद्ध होने से ] नहीं दे सकते । यदि कहें कि लक्षण में प्रमितत्व का अवधारण न हो, किन्तु जो लक्षण स्वरूप से प्रमित है, उससे व्यवहार होता है और जो प्रमित नहीं है, वह व्यवहार का प्रयोजक नहीं है, तो किसीके यह कहने पर कि 'यह लक्षण प्रमित नहीं है', आप क्या उत्तर देंगे, कारण अभीतक प्रमात्व की निरुक्ति न होने से 'इदं प्रमितम्' इस ज्ञान से प्रमितत्व
परिच्छेद ] प्रथम करणत्व-लक्षण का खण्डन १६६ पत्तेः, प्रमात्वनिरूपणवैयर्थ्यापाताच्च । वस्तुतस्तु प्रमयैव घटादितत्त्वव्यवहारोऽपि तर्ह्यस्तु इत्यास्तां विस्तरः । प्रमाणसामान्य-लक्षणखण्डनम् एवं प्रमितेरनिरुक्त्या प्रमाकरणं प्रमाणमित्यप्ययुक्तम्; करणार्थानिरुक्तेश्च । प्रथम-करणत्वलक्षण-खण्डनम् ननु कारकान्तरेऽचरितार्थस्य हेतुत्वं करणत्वम् । कर्तुर्हि करणं निष्पादयतः कारकान्तरे चरितार्थत्वम्, स्वरूपतोऽनिष्पादनेऽपि व्यापारवतया निष्पादनात् । तादृशस्य च तस्य करणत्वात् । की सिद्धि आप नहीं कर सकते । किञ्च—जैसे लक्षण प्रमितत्व से अनवगत-स्वरूप सत् लक्ष्य के व्यवहार का कारण है, वैसे ही प्रमा भी स्वरूपसत् ही घटादि-व्यव- हार की प्रयोजक होगी । फिर प्रमात्व से प्रमा के अवगम के लिए प्रमा के लक्षण का निरूपण व्यर्थ ही हो जायगा । किञ्च—लक्षण व्यतिरेकी हेतु है और व्याप्तिपक्ष- धर्मतया प्रमितस्वरूप से अवगत ही हेतु अनुमिति का जनक होता है । अतः 'प्रमितत्व से अनवगत लक्षण व्यवहार का प्रयोजक है,' यह कथन असङ्गत है । ऐसे अनेक दूषण हैं, अतः विस्तार न कर एतावत् खण्डन ही पर्याप्त है । प्रमाण-सामान्य के लक्षण का खण्डन पूर्वोक्त रीति से प्रमा का लक्षण न हो सकने पर 'प्रमितिकरणं प्रमाणम्' यह प्रमाण-लक्षण भी अयुक्त हुआ, कारण विशेषण की निरुक्ति के बिना विशिष्ट की निरुक्ति ही नहीं हो सकती । किञ्च—'करण' शब्द के अर्थ की निरुक्ति भी असम्भव है । प्रथम करणत्व-लक्षण का खण्डन समर्थन—जो हेतु कारकान्तर में अचरितार्थ ( अनुपयुक्त ) होकर क्रिया का जनक हो, वह करण है । कर्ता करण का निष्पादन करता है, अतः कारकान्तर में चरितार्थ है । यद्यपि वह करण का स्वरूप से निष्पादन नहीं करता, तथापि व्यापार- वत्त्वरूप से निष्पादन करता ही है । क्योंकि व्यापारयुक्त को ही 'करण' कहते हैं और विशेषण का निष्पादक विशिष्ट का भी निष्पादक होता है । २२
१७० . सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य. [ प्रथम एवं कर्मापि करणनिष्पादने चरितार्थम् । करणव्यापारो हि कर्मविषयो भवति, कर्माभावे विषयाभावात् करणव्यापार एव न निष्पद्यत इति तन्निर्वाहे तस्यापि चरितार्थत्वमिति । एवमधिकरणस्यापि करणव्यापारनिर्वाहकत्वम् । सम्प्रदानापादानयोश्च असार्वत्रिकत्वम् । करणं तु सार्वत्रिकमेवेति कारकान्तरेऽ- चरितार्थः सार्वत्रिको हेतुः करणमिति । मैवम् ; अस्तु तावदविचारितरमणीयमिदं व्याख्यानम् । अन्तरशब्दो यदि विशेषमात्रवचनस्तदा न व्यवच्छेदकः, न हि विशेषमपास्य कारकमात्रं केन- चिज्जन्यन्ते यद् व्यवच्छिद्येत । नापि चान्तरशब्दोऽन्यवचनः ; तथा सति 'कस्मादन्यदि'ति विशेषानिर्देशे इसी तरह कर्म भी करण के निष्पादन में चरितार्थ है। कारण करण का व्यापार कर्म में ही होता है, कर्म के अभाव में आश्रय का अभाव होने से करण का व्यापार नहीं हो सकता । अतः करण के निष्पादन में कर्म भी चरितार्थ है। इसी प्रकार अधिकरण भी करण के व्यापार का जनक है। क्योंकि करण का व्यापार किसी देश-कालरूप अधिकरण में ही होता है । सम्प्रदान प्रायः दानरूप क्रिया का और अपादान विभागरूप क्रिया का ही जनक होता है, अतः वे दोनों सार्वत्रिक नहीं हैं, जब कि करण क्रियामात्र का जनक होने से सार्वत्रिक है। अतः 'कारकान्तर में अचरितार्थ, सार्वत्रिक हेतुं करण है', यही करण का दोषरहित निर्वचन हो सकता है । खण्डन—'करण'-शब्दार्थ का यह व्याख्यान अविचारित-रमणीय है । अर्थात् विचार करके देखा जाय, तो कुछ भी नहीं है। कारण 'अनयोर्महदन्तरम्' की तरह यदि 'अन्तर' शब्द का 'विशेष' अर्थ करें, तो व्यवच्छेद्य न होने से उसका निवेश व्यर्थ हो जायगा । यदि कोई कारक-विशेष को छोड़कर कारक-सामान्य का जनक होता, तो कह सकते कि 'अन्तर शब्द को त्यागकर कारक में अचरितार्थ आदि लक्षण करने पर कारक-सामान्य के जनक का निषेध हो जायगा । वह न हो, अतः अन्तर शब्द का निवेश है।' किन्तु जब विशेष को त्यागकर सामान्य कारक का कोई जनक ही नहीं है, तो 'अन्तर' शब्द का निवेश व्यर्थ ही है। यदि अन्तर शब्द का 'अन्य' अर्थ करें, तो 'किससे अन्य' यह अपेक्षा होने पर समभिव्याहार से 'करण से अन्य' यही अर्थ होगा । जैसे 'अन्य
परिच्छेद ] प्रथम-करणत्व-लक्षण का खण्डन १७१ 'करणादि'ति समभिव्याहारात् लभ्येत, यथा 'अन्य आत्मा शरीरमन्यद्' इत्यादौ । तथा सति करणव्यतिरिक्तकारकाभिप्रायेण प्रयुक्तः स्यात् । तच्च न ; करणस्यैव अद्यापि निरूप्यमाणत्वादतिव्याप्तेश्च । नापि कर्तृकर्मणोः स्वरूपोपादानपरोऽयमन्तरशब्दः ; ताभ्यामेवातिव्याप्त्या- पत्तेः । नापि कर्तृकर्मणी अपेक्ष्यान्यदन्तरशब्दार्थः ; वैयर्थ्यापातात् । कारकेऽचरि- तार्थत्वमेवोच्यताम् । नाप्यनधिकार्थ एवायमिति न प्रयोक्तव्योऽन्तरशब्दः ; तथा सति करणजनकं हस्तादि न करणं स्यात् । व्यापारवद्धि कारणं करणमुच्यते । अस्ति च स्थाली- आत्मा शरीरमन्यत्,' इस स्थल में 'शरीर से अन्य आत्मा और आत्मा से अन्य शरीर, ऐसा अर्थ समभिव्याहार से लब्ध होता है। इसी तरह 'कारकान्तर' शब्द का अर्थ भी 'करण से अन्य कारक' यह हुआ । किन्तु वह हो नहीं सकता, क्योंकि अभी करण का निरूपण ही चल रहा है; अतः करण शब्द का अर्थ अज्ञात ही है । इसी प्रकार करण के लक्षण में करण के प्रविष्ट होने से आत्माश्रय भी है । किञ्च—करण से अन्य कारक में अचरितार्थ कर्ता भी है, अतः कर्ता में अति- व्याप्ति भी हो जायगी । समर्थन—'कारकान्तर' शब्द कर्तृकर्मपरक है, अतः 'कर्ता-कर्म में अचरितार्थ सार्वत्रिक हेतु करण है' यह निष्कृष्ट लक्षण हुआ । खंडन—कर्ता में कर्ता अचरितार्थ है तथा कर्म में कर्म, अतः उन दोनों में ही इस लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'अन्तर शब्द का 'कर्ता-कर्म से अन्य' अर्थ है। एवञ्च 'कर्ता-कर्म से अन्य कारक में अचरितार्थ सार्वत्रिक हेतु करण है' यह लक्षण सम्पन्न हुआ । खंडन— 'करण में अचरितार्थ' इत्यादि कहने से ही कर्ता-कर्म में अतिव्याप्ति का वारण हो जाने से 'अन्तर' शब्द का निवेश व्यर्थ हो जायगा । किञ्च—कर्तृ-कर्म से अन्य कारक ( बहिरूप करण ) में हस्तरूप करण वक्ष्यमाण प्रकार से चरितार्थ है, अतः हस्तरूप करण में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'अन्तर' शब्द का कुछ अधिक अर्थ नहीं है, अतः उसका निवेश आप न करें । अर्थात् 'कारक में अचरितार्थ सार्वत्रिक हेतु करण है', इतना ही लक्षण करें, तो क्या हानि है ? खंडन – ऐसा कहेंगे, तो बहिरूप करण के व्यापार के जनक हस्तादि में लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । देखिए—'व्यापारवान् कारण' को
१७९ | सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य | [ प्रथम
संयोगादिव्यापारवतोऽग्न्यादेस्तथात्वम् । अस्ति च हस्तादेस्तज्जनकत्वम् । न च हस्ताद्यकरणमेवाभ्युपेयम्, व्यापारवतः करणत्वेन तत्कारकत्वस्यावश्याभ्यु- पेयत्वात् । कर्त्रादिषु दुरन्तर्भावित्वात् सप्तमकारकस्वीकारापत्तेः । न च व्यवधानात् अहेतुत्वमेव तेषाम्, किं नाम हेतुहेतुत्वमिति । कर्तुरप्येवं प्रसङ्गात्, पुंव्यापाराद् देहस्पन्दादिस्तेन कुठारक्रियादिस्ततश्छिदेति परम्पराव्यव- धानात् । सर्वैयं कर्तृव्यापारपरम्परा न तस्य हेतुता हन्तीति चेत् ; तुल्यम् । तस्मात् करणत्वेन अवश्याभ्युपगन्तव्यहस्ताद्यव्यापकत्वादलक्षणमिदम् । एतेनाऽपि कारकान्तरशब्दः कर्तृकर्मव्यतिरिक्तवचन इति पक्षो व्युदास्यः । 'करण' कहते हैं, अतः स्थालीसंयोग आदि व्यापारयुक्त तथा पाकरूप क्रिया का हेतु वह्निरूप कारण भी करण है और हस्त [ स्थालीसंयोगादिरूप वह्नि-व्यापार का ] जनक है । हस्त आदि करण ही नहीं हैं, यह नहीं कह सकते; क्योंकि व्यापार से युक्त तथा पाकक्रिया का जनक होने से हस्त कारक तो अवश्य है, पर उसका कर्ता आदि में अन्तर्भाव नहीं हो सकता । उसे आप करण तो मानते नहीं, अतः सप्तम कारक मानना पड़ेगा । समर्थन—स्थाली-संयोग आदि वह्नि के व्यापार में काष्ठ-व्यापार का व्यवधान होने से हस्त हेतु ही नहीं है, किन्तु वह हेतुभूत काष्ठादि-व्यापार का हेतु है । अतः वह्नि- व्यापार में हस्त कारण ही न होने से हस्त में अव्याप्ति ही नहीं है । खंडन—यदि व्यवधान से हेतुत्व का अभाव मानें, तो छिदादि क्रिया में कर्ता भी हेतु नहीं होगा, क्योंकि पुरुष ( आत्मा ) के यत्नरूप व्यापार से शरीर में उद्यमन-निपतनादि व्यापार होते हैं, उनसे कुठार में काष्ठसंयोगादि व्यापार होता है, उससे छेदन होता है, अतः पुरुष-व्यापार में भी छिदादि का व्यवधान है ही । यदि कहें कि पुरुष में कर्तृत्वग्रह होने पर उसकी सिद्धि के लिए ही शरीरादि के व्यापार होते हैं, फलतः सम्पूर्ण व्यापार कर्ता के ही हैं । अतः उन व्यापारों से कर्ता अन्यथासिद्ध नहीं होता; तो हम भी कहेंगे कि हस्त में करणत्वग्रह होने पर उसकी सिद्धि के लिए ही काष्ठादि व्यापार होते हैं, अतः उन व्यापारों से हस्त अन्यथासिद्ध नहीं हो सकता । तस्मात् हस्त को करण तो मानना ही होगा । उसमें करण का लक्षण नहीं जाता, अतः अव्याप्ति हो जायगी । हस्त में अव्याप्ति होने से 'कारकान्तर' शब्द 'कर्तृकर्मभिन्न कारकपरक है' यह भी खण्डित जानना चाहिए ।
परिच्छेद ] द्वितीय करणत्व-लक्षण का खण्डन १७३ द्वितीय-करणत्वलक्षण-खण्डनम् कर्तृव्यापारविषयः करणमित्यपि न । शरीरचालनाय प्रयतमानस्य निष्पाद्या शरीरक्रिया, क्रियाविशिष्टं वा शरीरं प्रयत्नलक्षणकर्तृव्यापारविषयीभवतीति तस्यां क्रियायां करणं स्यात् । न चैतत् शक्याङ्गीकारम्, भविष्यतः स्वं प्रति च कार- कत्वानुपपत्तेः । न च साक्षात्कर्तृव्यापारविषय इति विशेषोपादानेऽप्यस्य परिहारः, साक्षाद्व्यापार्यमनःप्रभृतिक्रियायां प्रसङ्गतादवस्थ्यात्, अव्यापकत्वाच्च । अथ तत्क्रियाहेतुस्तत्क्रियाकर्तृव्यापारस्य विषयस्तत्क्रियाकरणमिति मन्यसे । द्वितीय करणत्व-लक्षण का खण्डन 'कर्ता के व्यापार का विषय करण है' यह लक्षण भी अयुक्त है, कारण शरीर की चलनक्रिया के लिए यत्नवाले कर्ता के यत्नरूप व्यापार का विषय चलनरूप क्रिया या क्रियाविशिष्ट शरीर होता है । अतः शरीर की चलनरूप क्रिया में चलनरूप क्रिया या क्रियाविशिष्ट शरीर करण हो जायगा । अर्थात् जैसे वृक्षच्छेदन के लिए प्रयतमान कर्ता के व्यापार का विषय होने से क्रियाविशिष्ट कुठार या उद्यमन-निपतनादि क्रियाएँ छेदनरूप क्रिया की करण हैं, वैसे ही शरीर-चलन के लिए प्रयतमान पुरुष के व्यापार का विषय होने से क्रियाविशिष्ट शरीर या शरीरक्रिया शरीर-चलनरूप क्रिया की करण हो जायगी । भेद यह है कि प्रकृत में अन्य कोई क्रिया नहीं है, अतः शरीरक्रिया ही शरीर या तत्क्रिया की करण हो जायगी । किन्तु इसे आप अङ्गीकार नहीं कर सकते, क्योंकि करण नियतपूर्ववर्ती होने से भावी पदार्थ करण नहीं हो सकता और न वह स्वयं स्व के प्रति करण होता है । खंडन —कर्ता के व्यापार का साक्षात् विषय करण है, शरीर मनोव्यापार ( सङ्कल्प ) द्वारा कर्तृव्यापार का विषय है; अतः अतिव्याप्ति नहीं है । खंडन—ऐसा लक्षण करने पर तो सङ्कल्पविशिष्ट मन या संकल्प भी करण हो जायगा, कारण वह कर्तृव्यापार का साक्षात् विषय है । किञ्च—कुठारादि भी शरीर-व्यापार द्वारा ही कर्तृव्यापार का विषय होता है, अतः साक्षात् निवेश करने पर कुठारादि में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—जो तत्क्रिया का हेतु होकर तत्क्रिया के कर्तृव्यापार का विषय हो, वह तत्क्रिया में करण है, ऐसा करण-लक्षण करेंगे । एवञ्च शरीरक्रिया शरीरक्रिया में हेतु नहीं है, अतः उसमें अतिव्याप्ति नहीं होगी । खंडन—अनीश्वरवाद में अङ्कुर
१७४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [प्रथम मैवम्; अनीश्वरवादे अङ्कुरादीनामकरणकत्वप्रसङ्गात् । सुषुप्त्यनन्तरभाविन्याः प्रमायाः परिगणितकरणोपाधिभेदपरिसङ्ख्यातेषु प्रमाराशिषु बहिर्भावप्रसङ्गात् । अचेतनस्यापि कर्तृत्वे चातिप्रसङ्गात् । सेश्वरवादे तु ईश्वरव्यापारविषयः सर्वं कारणमिति नाकरणं कारणं स्यात् । ओमित्यभिधाने च अकारणमात्रं व्यवच्छेद्यमिति कारणं करणमित्ये- वोच्यताम्, वृथा विशेषणपूरणप्रयासः । अथ मन्यसे – न धर्म्यन्तरव्यवच्छेदाय विशेषणानि, किन्तु एकस्यापि धर्मिणो रूपभेदेन करणपदाभिधेयतोपदर्शनायेति । एवं तर्हि एतद्रूपालिङ्गितस्य का करण कर्तृव्यापार का विषय नहीं है, अतः अंकुर के करण में लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । यदि कहें कि अङ्कुर करणरहित ही हैं, तो 'कार्यं करणपूर्वकम्' इस व्याप्ति के न होने से रूपादिविषयक ज्ञानरूप कार्य से चक्षुरादि करण की अनुमिति न होगी, जो अनीश्वरवादी के लिए अपसिद्धान्त हो जायगा । किञ्च सुषुप्ति के अनन्तर-क्षण में उत्पन्न प्रमा का करण भी कर्तृव्यापार का अविषय होने से करण न होगा । यदि कहें कि वह प्रमा अकरणक ही है, तो परिगणित करणरूप निमित्त से उत्पन्न पञ्च या षट्-प्रमाराशि में उसका अन्तर्भाव न होगा और एक सप्तम प्रमा माननी पड़ेगी । यदि ज्ञानरहित जीव या शरीर को ही सुषुप्त्यनन्तर जात प्रमा का कर्ता मानें, तो जीव ही अङ्कुर का भी कर्ता हो जायगा । फिर 'अंकुर अकर्तृक है,' तुम्हारा यह कथन असङ्गत हो जायगा । 'उपादान-गोचर-अपरोक्ष-ज्ञानादिमान् ही कर्ता होता है और अंकुर का उपादान-गोचर अपरोक्षज्ञान जीव को नहीं है, अतः जीव अंकुर का कर्ता नहीं है', यह तो अचेतन को कर्ता माननेवाले आप नहीं कह सकते । यदि सेश्वरवाद मानें, तो ईश्वररूप कर्ता के व्यापार के विषय तो सभी कारक होते हैं । अतः सम्पूर्ण कारक करण हो जायेंगे । यदि कहें कि ठीक है, कारणमात्र करण ही है, तो 'कारणं करणम्' यही लक्षण करें, व्यर्थ ही विशेषण का पूरण-प्रयास क्यों करते हैं ? समर्थन—यह विशेषण कर्ता, कर्म आदि अन्य कारकों की व्यावृत्ति के लिए नहीं हैं, किन्तु एक ही कारक की रूप भेद ( प्रवृत्तिनिमित्त ) से करणपद-वाच्यता प्रदर्शन करने के लिए है । खंडन—तब तो लक्षण की निरुक्ति में प्रवृत्त आपने 'तत्क्रिया का हेतु तथा तत्क्रिया के कर्तृव्यापार का विषय तत्क्रिया का करण है' इस कथन द्वारा प्रवृत्ति- निमित्त ही कहा । एवञ्च प्रश्न का उत्तर न देकर अप्रस्तुत का अभिधान करने से अर्थान्तर
परिच्छेद ] द्वितीय करणत्व-लक्षण का खण्डन १७५ करणत्वात् लक्षणोक्तिप्रवृत्तेन त्वया लक्ष्यमात्रमुक्तं भवेत् । न च लक्ष्यपदप्रवृत्ति- निमित्तमेव लक्षणार्थः ; गन्धवत्त्वादेः पृथिव्याद्यलक्षणत्वापत्तेः । अपि चैवं वस्तुमात्रं करणमित्यभिधायैव किं न करणपदप्रवृत्तिनिमित्तमुपा- दर्शि । स्यादेवं यदि सर्वत्र वस्तुनि करणव्यवहारः स्यादिति चेत् ; तर्हि त्वदुक्त- लक्षणमपि भवेत् यदि सर्वत्र कारणे करणव्यवहारः स्यादित्यपि पश्य । नहि कर्तरि कर्मणि वा कस्यचित्करणव्यवहारः । कर्तरि तावदस्ति लोके 'प्रमाणमिह देवदत्तः' इति । शास्त्रेऽपि 'मन्त्रायुर्वेदप्रा- माण्यवच्च तत्प्रामाण्यमाप्तप्रामाण्याद्' इतीति चेन्न । किमयं माणवकेऽग्निव्यवहार इव गौणो मुख्य एव वेति संशये यदि त्वत्परिकल्पितान्निमित्तात् मुख्यः स्यात्ततः कर्मण्यपि स्यात्तत एव निमित्तादिति बाधकदर्शनेन पारिशेष्यात् गौणतयैव तद्व्यवस्थापनाया युक्तत्वात् । का प्रसङ्ग हुआ । यदि कहें कि लक्षण तथा प्रवृत्तिनिमित्त एक ही है, अतः प्रवृत्तिनिमित्त के अभिधान से अर्थान्तर नहीं है, तो गन्धवत्त्व पृथिवी का लक्षण नहीं हो सकेगा । कारण जब आप प्रवृत्तिनिमित्त को ही लक्षण मानते हैं, तो गन्धवत्त्वरूप उपाधि की अपेक्षा लाघव होने से पृथिवीत्व जाति ही प्रवृत्तिनिमित्त होती है, गन्धवत्त्व नहीं । अतः गन्धवत्त्व लक्षण नहीं होगा । अपि च—'वस्तुमात्र करण है' यह कहकर आपने करणपद के प्रवृत्तिनिमित्त का प्रदर्शन क्यों नहीं किया ? यदि कहें कि 'ऐसा तभी कह सकते थे, जब कि वस्तुमात्र में करण व्यवहार होता,' तो हम भी कह सकते हैं कि 'तभी आपका यह लक्षण भी हो पाता, यदि कारणमात्र में करण व्यवहार होता ।' आप भी यही देखें कि कर्ता या कर्म के बीच किसीक करण में भी व्यवहार नहीं होता । समर्थन—लोक में 'प्रमाणमिह देवदत्तः' इस स्थल में कर्ता में करण-व्यवहार देखा ही जाता है। शास्त्र में भी 'मन्त्रायुर्वेदप्रामाण्यवच्च तत्प्रामाण्यमाप्तप्रामाण्यात्' इस स्थलमें कर्ता में करण व्यवहार देखा जाता है। खंडन—'क्या यह व्यवहार 'अग्निर्मााणवकः' के तुल्य गौण है या मुख्य ?, ऐसा सन्देह होने पर यदि तुम्हारे कल्पित निमित्त से इस व्यवहार को मुख्य मानें, तो उसी तुम्हारे कल्पित निमित्त से कर्म में भी करण-व्यवहार होना चाहिए किन्तु कर्म में तो करण-व्यवहार का बाध (अभाव) देखा ही जाता है । अतः परिशेष से कर्म या कर्ता में गौणता से करण-व्यवहार होता है, यही व्यवस्था युक्त है ।
१७६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अस्त्येव कर्मण्यपि तेन रूपेणेति चेन्न । न तावदयं शक्योपदर्शनोदाहरणः शास्त्रलोकयोः । क्व दृश्यते 'घटं पश्यती'त्यर्थे 'घटेन पश्यती'ति । यदि तु त्वच्चेतसि केवलं स्यात्, तन्न च नादरं विधातुमुत्सहामहे । प्रमेयमात्रं करणमिति वदतो वामबुद्धेर्मनसि विपरिवर्तमानं प्रमेयमात्र एव करणव्यवहारास्तित्वमेव- मनुरोद्धव्यं स्यादिति । 'घटेन पश्यती'त्याद्यनभिधानवशान्न प्रयोगः, न हि सर्वं लाक्षणिकं प्रयुज्यत इति चेन्न माऽस्तु, तदभावे काऽन्याऽस्ति तेषु करणव्यवहार इति वक्तव्यः स स्यात्, न चासौ शक्यदर्शन इति । क्रियया अयोगव्यवच्छेदेन सम्बन्धि करणमित्यपि न । तथा हि—अयोग- व्यवच्छेदो योग एव पर्यवस्येदित सम्बन्धेन सम्बन्धीत्युक्तं स्यादिति पौनरुक्त्यम् । समर्थन—कर्म में भी कर्तृव्यापार-विषयत्वरूप से करणत्व-व्यवहार होता ही है । खण्डन—नहीं, लोक या वेद में कहीं भी 'घटं पश्यति' के स्थान पर 'घटेन पश्यति' ऐसा व्यवहार नहीं देखा गया है । यदि केवल आपके चित्त में 'घटं पश्यति' के स्थान पर 'घटेन पश्यति' ऐसा व्यवहार हो, तो उसका आदर करने में हमें उत्साह नहीं होता । कारण यदि आपके वचन का आदर करें, तो 'प्रमेयमात्र करण है' यह कहनेवाले वामबुद्धि आपके वचन का आदरकर प्रमेयमात्र को करण मानना पड़ेगा । समर्थन—अभिधान न होने से 'घटेन पश्यति' यह प्रयोग नहीं होता । कारण यह निश्चय नहीं है कि लक्षण से युक्त या सिद्ध सबका प्रयोग हो । खंडन—कर्म में करण शब्द या विभक्ति का प्रयोग न होने पर उसमें करणत्वप्रयुक्त कौन-सा व्यव- हार होता है, यह कहना होगा किन्तु आप उसको कह नहीं सकते । समर्थन—जो कुठारादि प्रधान क्रिया ( छिदादिरूप फल ) से अयोगव्यवच्छेद ( सम्बन्धाभावका अभाव ) द्वारा सम्बद्ध हो, वह करण है । कुठार का व्यापार होने पर छेदन अवश्य होता है, अतः कुठार में छेदन के अयोग का व्यवच्छेद है । कर्ता का व्यापार होने पर भी सम्भव है कि कदाचित् छेदन न हो । अतः कर्ता में छेदन का सम्बन्ध तो है, किन्तु छिदा के अयोग का व्यवच्छेद नहीं है, इसलिए न कुठार में अव्याप्ति है और न कर्ता में अतिव्याप्ति । खंडन—अभाव का अभाव प्रतियोगि- रूप होता है । अतः अयोग का व्यवच्छेद योगरूप होने से उक्त लक्षणवाक्य का अर्थ हुआ सम्बन्धयुक्त सम्बन्धी । फलतः पुनरुक्तिदोष होने से उक्त लक्षण असङ्गत है ।