खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 188, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] प्रथम-करणत्व-लक्षण का खण्डन १७१ 'करणादि'ति समभिव्याहारात् लभ्येत, यथा 'अन्य आत्मा शरीरमन्यद्' इत्यादौ । तथा सति करणव्यतिरिक्तकारकाभिप्रायेण प्रयुक्तः स्यात् । तच्च न ; करणस्यैव अद्यापि निरूप्यमाणत्वादतिव्याप्तेश्च । नापि कर्तृकर्मणोः स्वरूपोपादानपरोऽयमन्तरशब्दः ; ताभ्यामेवातिव्याप्त्या- पत्तेः । नापि कर्तृकर्मणी अपेक्ष्यान्यदन्तरशब्दार्थः ; वैयर्थ्यापातात् । कारकेऽचरि- तार्थत्वमेवोच्यताम् । नाप्यनधिकार्थ एवायमिति न प्रयोक्तव्योऽन्तरशब्दः ; तथा सति करणजनकं हस्तादि न करणं स्यात् । व्यापारवद्धि कारणं करणमुच्यते । अस्ति च स्थाली- आत्मा शरीरमन्यत्,' इस स्थल में 'शरीर से अन्य आत्मा और आत्मा से अन्य शरीर, ऐसा अर्थ समभिव्याहार से लब्ध होता है। इसी तरह 'कारकान्तर' शब्द का अर्थ भी 'करण से अन्य कारक' यह हुआ । किन्तु वह हो नहीं सकता, क्योंकि अभी करण का निरूपण ही चल रहा है; अतः करण शब्द का अर्थ अज्ञात ही है । इसी प्रकार करण के लक्षण में करण के प्रविष्ट होने से आत्माश्रय भी है । किञ्च—करण से अन्य कारक में अचरितार्थ कर्ता भी है, अतः कर्ता में अति- व्याप्ति भी हो जायगी । समर्थन—'कारकान्तर' शब्द कर्तृकर्मपरक है, अतः 'कर्ता-कर्म में अचरितार्थ सार्वत्रिक हेतु करण है' यह निष्कृष्ट लक्षण हुआ । खंडन—कर्ता में कर्ता अचरितार्थ है तथा कर्म में कर्म, अतः उन दोनों में ही इस लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'अन्तर शब्द का 'कर्ता-कर्म से अन्य' अर्थ है। एवञ्च 'कर्ता-कर्म से अन्य कारक में अचरितार्थ सार्वत्रिक हेतु करण है' यह लक्षण सम्पन्न हुआ । खंडन— 'करण में अचरितार्थ' इत्यादि कहने से ही कर्ता-कर्म में अतिव्याप्ति का वारण हो जाने से 'अन्तर' शब्द का निवेश व्यर्थ हो जायगा । किञ्च—कर्तृ-कर्म से अन्य कारक ( बहिरूप करण ) में हस्तरूप करण वक्ष्यमाण प्रकार से चरितार्थ है, अतः हस्तरूप करण में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'अन्तर' शब्द का कुछ अधिक अर्थ नहीं है, अतः उसका निवेश आप न करें । अर्थात् 'कारक में अचरितार्थ सार्वत्रिक हेतु करण है', इतना ही लक्षण करें, तो क्या हानि है ? खंडन – ऐसा कहेंगे, तो बहिरूप करण के व्यापार के जनक हस्तादि में लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । देखिए—'व्यापारवान् कारण' को