भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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१७९ | सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य | [ प्रथम

संयोगादिव्यापारवतोऽग्न्यादेस्तथात्वम् । अस्ति च हस्तादेस्तज्जनकत्वम् । न च हस्ताद्यकरणमेवाभ्युपेयम्, व्यापारवतः करणत्वेन तत्कारकत्वस्यावश्याभ्यु- पेयत्वात् । कर्त्रादिषु दुरन्तर्भावित्वात् सप्तमकारकस्वीकारापत्तेः । न च व्यवधानात् अहेतुत्वमेव तेषाम्, किं नाम हेतुहेतुत्वमिति । कर्तुरप्येवं प्रसङ्गात्, पुंव्यापाराद् देहस्पन्दादिस्तेन कुठारक्रियादिस्ततश्छिदेति परम्पराव्यव- धानात् । सर्वैयं कर्तृव्यापारपरम्परा न तस्य हेतुता हन्तीति चेत् ; तुल्यम् । तस्मात् करणत्वेन अवश्याभ्युपगन्तव्यहस्ताद्यव्यापकत्वादलक्षणमिदम् । एतेनाऽपि कारकान्तरशब्दः कर्तृकर्मव्यतिरिक्तवचन इति पक्षो व्युदास्यः । 'करण' कहते हैं, अतः स्थालीसंयोग आदि व्यापारयुक्त तथा पाकरूप क्रिया का हेतु वह्निरूप कारण भी करण है और हस्त [ स्थालीसंयोगादिरूप वह्नि-व्यापार का ] जनक है । हस्त आदि करण ही नहीं हैं, यह नहीं कह सकते; क्योंकि व्यापार से युक्त तथा पाकक्रिया का जनक होने से हस्त कारक तो अवश्य है, पर उसका कर्ता आदि में अन्तर्भाव नहीं हो सकता । उसे आप करण तो मानते नहीं, अतः सप्तम कारक मानना पड़ेगा । समर्थन—स्थाली-संयोग आदि वह्नि के व्यापार में काष्ठ-व्यापार का व्यवधान होने से हस्त हेतु ही नहीं है, किन्तु वह हेतुभूत काष्ठादि-व्यापार का हेतु है । अतः वह्नि- व्यापार में हस्त कारण ही न होने से हस्त में अव्याप्ति ही नहीं है । खंडन—यदि व्यवधान से हेतुत्व का अभाव मानें, तो छिदादि क्रिया में कर्ता भी हेतु नहीं होगा, क्योंकि पुरुष ( आत्मा ) के यत्नरूप व्यापार से शरीर में उद्यमन-निपतनादि व्यापार होते हैं, उनसे कुठार में काष्ठसंयोगादि व्यापार होता है, उससे छेदन होता है, अतः पुरुष-व्यापार में भी छिदादि का व्यवधान है ही । यदि कहें कि पुरुष में कर्तृत्वग्रह होने पर उसकी सिद्धि के लिए ही शरीरादि के व्यापार होते हैं, फलतः सम्पूर्ण व्यापार कर्ता के ही हैं । अतः उन व्यापारों से कर्ता अन्यथासिद्ध नहीं होता; तो हम भी कहेंगे कि हस्त में करणत्वग्रह होने पर उसकी सिद्धि के लिए ही काष्ठादि व्यापार होते हैं, अतः उन व्यापारों से हस्त अन्यथासिद्ध नहीं हो सकता । तस्मात् हस्त को करण तो मानना ही होगा । उसमें करण का लक्षण नहीं जाता, अतः अव्याप्ति हो जायगी । हस्त में अव्याप्ति होने से 'कारकान्तर' शब्द 'कर्तृकर्मभिन्न कारकपरक है' यह भी खण्डित जानना चाहिए ।