खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अबाधितत्वादि-खण्डनम् अबाधितानुभूतिः प्रमेत्यपि निरस्तम् । तदानीं बाधाविरहस्य अतिप्रसञ्जक- त्वात्, कालान्तरेऽपि च बाधाविरहस्य दुर्निरूपत्वात् । स्वतो बाधाविरहस्य अति- प्रसञ्जकत्वात् । सर्वजनबाधाविरहस्य च दुरवधारकत्वादिति । तर्कसंशयविपर्ययस्मृतिव्यतिरिक्ता प्रतीतिः प्रमेत्यपि न । स्मृतिव्यतिरिक्तत्व- खण्डनन्यायेन निरस्तत्वादिति । जातिसङ्करमिच्छतश्च प्रमात्वलक्षणजात्यभिसम्बन्धात् प्रमेत्यपि दुर्लक्षणम् । अस्याज्ञातस्य तद्व्यवहारजनकत्वे प्रमायामप्रमाभ्रमसंशयौ न स्याताम् । अबाधितत्वादि का खण्डन इसी तरह 'अबाधित अनुभूति प्रमा है' यह लक्षण भी नहीं हो सकता । कारण यदि अबाधितत्व ज्ञानकाल में कहें, तो वह भ्रम में भी है । यदि सभी कालों में अबाधितत्व कहें, तो वह प्रमा में भी नहीं है, क्योंकि सम्भव है कि स्वप्न में प्रमा का भी बाध हो जाय । किञ्च—यह अबाध द्रष्टा का ही अभिप्रेत है या मनुष्यमात्र का ? यदि द्रष्टा का अबाध कहें, तो सम्भव है कि कहीं भ्रान्त मनुष्य को अपने भ्रमज्ञान में कभी उत्तर काल में बाध ही न हो । अतः उस भ्रम से अतिव्याप्ति हो जायगी । यदि सब मनुष्यों का अबाध अभिप्रेत हो, तो वह दुर्ज्ञेय ही है । निर्वचन—तर्क, संशय, विपर्यय और स्मृति से व्यतिरिक्त ज्ञान को ही प्रमा कहेंगे । खण्डन—स्मृति-व्यतिरिक्तत्व के खण्डन की रीति से इस लक्षण का भी खण्डन हो जायगा । अर्थात् यदि यत्किञ्चित् तर्कादिव्यतिरिक्तत्व कहें, तो तद्व्यतिरिक्त तर्कादिव्य- क्तियोंमें अतिव्याप्ति होगी । यदि सम्पूर्ण तर्कादिव्यतिरिक्तत्व कहें, तो हम-आप जैसे असर्वज्ञों को वैसा ज्ञान ही नहीं हो सकता, अतः यह लक्षण संभव नहीं । समर्थन—'प्रमात्वजातिविशिष्ट प्रमा है' ऐसा ही लक्षण करेंगे । खंडन—यह लक्षण भी उचित नहीं है, कारण साक्षात्त्व को छोड़कर प्रमात्व अनुमिति में है और प्रमात्व को छोड़कर साक्षात्त्व भ्रम में है तथा दोनों का समावेश प्रत्यक्ष-प्रमा में है; अतः सङ्कर दोष होने से प्रमात्व जाति ही नहीं हो सकती । समर्थन — संस्कारमात्र से अतिरिक्त अदुष्टकरणजन्य प्रतीतित्व को प्रमात्व का प्रयोजक मानेंगे और इन्द्रियाजन्यप्रतीतित्व को परोक्षत्व का प्रयोजक। एवञ्च व्यंजक उपाधि भिन्न-भिन्न होने से सांकर्य नहीं होगा । खण्डन—प्रमात्वजातिरूप लक्षण 'इयं प्रमा' इस व्यवहार का अज्ञात प्रयोजक है या ज्ञात ? यदि अज्ञात कहें, तो कभी किसी भी