खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
१६६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अबाधितत्वादि-खण्डनम् अबाधितानुभूतिः प्रमेत्यपि निरस्तम् । तदानीं बाधाविरहस्य अतिप्रसञ्जक- त्वात्, कालान्तरेऽपि च बाधाविरहस्य दुर्निरूपत्वात् । स्वतो बाधाविरहस्य अति- प्रसञ्जकत्वात् । सर्वजनबाधाविरहस्य च दुरवधारकत्वादिति । तर्कसंशयविपर्ययस्मृतिव्यतिरिक्ता प्रतीतिः प्रमेत्यपि न । स्मृतिव्यतिरिक्तत्व- खण्डनन्यायेन निरस्तत्वादिति । जातिसङ्करमिच्छतश्च प्रमात्वलक्षणजात्यभिसम्बन्धात् प्रमेत्यपि दुर्लक्षणम् । अस्याज्ञातस्य तद्व्यवहारजनकत्वे प्रमायामप्रमाभ्रमसंशयौ न स्याताम् । अबाधितत्वादि का खण्डन इसी तरह 'अबाधित अनुभूति प्रमा है' यह लक्षण भी नहीं हो सकता । कारण यदि अबाधितत्व ज्ञानकाल में कहें, तो वह भ्रम में भी है । यदि सभी कालों में अबाधितत्व कहें, तो वह प्रमा में भी नहीं है, क्योंकि सम्भव है कि स्वप्न में प्रमा का भी बाध हो जाय । किञ्च—यह अबाध द्रष्टा का ही अभिप्रेत है या मनुष्यमात्र का ? यदि द्रष्टा का अबाध कहें, तो सम्भव है कि कहीं भ्रान्त मनुष्य को अपने भ्रमज्ञान में कभी उत्तर काल में बाध ही न हो । अतः उस भ्रम से अतिव्याप्ति हो जायगी । यदि सब मनुष्यों का अबाध अभिप्रेत हो, तो वह दुर्ज्ञेय ही है । निर्वचन—तर्क, संशय, विपर्यय और स्मृति से व्यतिरिक्त ज्ञान को ही प्रमा कहेंगे । खण्डन—स्मृति-व्यतिरिक्तत्व के खण्डन की रीति से इस लक्षण का भी खण्डन हो जायगा । अर्थात् यदि यत्किञ्चित् तर्कादिव्यतिरिक्तत्व कहें, तो तद्व्यतिरिक्त तर्कादिव्य- क्तियोंमें अतिव्याप्ति होगी । यदि सम्पूर्ण तर्कादिव्यतिरिक्तत्व कहें, तो हम-आप जैसे असर्वज्ञों को वैसा ज्ञान ही नहीं हो सकता, अतः यह लक्षण संभव नहीं । समर्थन—'प्रमात्वजातिविशिष्ट प्रमा है' ऐसा ही लक्षण करेंगे । खंडन—यह लक्षण भी उचित नहीं है, कारण साक्षात्त्व को छोड़कर प्रमात्व अनुमिति में है और प्रमात्व को छोड़कर साक्षात्त्व भ्रम में है तथा दोनों का समावेश प्रत्यक्ष-प्रमा में है; अतः सङ्कर दोष होने से प्रमात्व जाति ही नहीं हो सकती । समर्थन — संस्कारमात्र से अतिरिक्त अदुष्टकरणजन्य प्रतीतित्व को प्रमात्व का प्रयोजक मानेंगे और इन्द्रियाजन्यप्रतीतित्व को परोक्षत्व का प्रयोजक। एवञ्च व्यंजक उपाधि भिन्न-भिन्न होने से सांकर्य नहीं होगा । खण्डन—प्रमात्वजातिरूप लक्षण 'इयं प्रमा' इस व्यवहार का अज्ञात प्रयोजक है या ज्ञात ? यदि अज्ञात कहें, तो कभी किसी भी
१ परिच्छेद ] अबाधितत्त्वादि का खण्डन १६७ दोषाभावसहकृतस्य तथात्वे च अजायमानभ्रमसंशयप्रमादिव्यवहारे ज्ञानमात्राव- गमोदाहरणेऽपि तदापत्तेः । ज्ञातेनानेन लक्षणेन व्यवहारे च कथमिदमेव ज्ञातव्यमिति वक्तव्यम् । न तावत्प्रत्यक्षेण मानसेन ; तथा सति क्वचिज्ज्ञातायां प्रमायामप्रमाविपर्ययसंशया- नवकाशादि स्यात् । धर्मिवत् मनसैव निर्णीतत्वात् । चिह्नान्तरसापेक्षेणैव मनसा संवेदनचिह्नेनैव वा तेनैव लक्षणीभूय ज्ञापन- मित्यपि प्रत्याशामात्रम् । तच्चिह्नेनैव प्रमात्वजातिकल्पनाप्रतिच्छेदापत्तेः । प्रमा में अप्रमात्व का भ्रम या सन्देह नहीं होगा। अर्थात् जब ज्ञात लक्षण को 'इयं प्रमा' इस व्यवहार का प्रयोजक मानें, तब तो कह सकते हैं कि प्रमात्वरूप लक्षण का ज्ञान न होने पर 'इयं प्रमा' यह व्यवहार नहीं होता; प्रमात्व का भ्रम या सन्देह ही होता है । किन्तु जब अज्ञात ( स्वरूपसत् ) ही लक्षण व्यवहार का प्रयोजक हो, तब तो प्रमा में सदा 'इयं प्रमा' यही व्यवहार होना चाहिए । समर्थन — दोषाभाव से सहित, स्वरूपसत् प्रमात्वरूप लक्षण 'इयं प्रमा' इस व्यवहार का प्रयोजक है । अतः जहाँ दोष हो, वहाँ 'इयं प्रमा' यह व्यवहार नहीं होता; किन्तु भ्रम या सन्देह ही होता है । खंडन — जो ज्ञान वस्तुतः प्रमा है, किन्तु प्रमात्व- रूपसे ज्ञात नहीं है केवल ज्ञानत्वरूप से ही अवगत है और जिसमें भ्रम या सन्देह भी नहीं है, वहाँ 'इयं प्रमा' यह व्यवहार होना चाहिए, कारण दोषाभाव से सहित, स्वरूपसत् प्रमात्व वहाँ विद्यमान है । यदि ज्ञात लक्षण व्यवहार का प्रयोजक हो, तो लक्षण का ज्ञान कैसे हुआ, यह पूछना चाहिए । मानस प्रत्यक्ष से लक्षण का ज्ञान होता है, यह तो कह नहीं सकते, कारण कहीं-कहीं प्रमा होने पर भी प्रमात्व का जो सन्देह या भ्रम होता है, वह [ धर्मी- प्रमा के ज्ञान के तुल्य प्रमात्व का भी मानस प्रत्यक्ष हो जाने से ] नहीं होगा । समर्थन — अन्य चिह्न से युक्त मन से प्रमात्व का ज्ञान होता है अथवा चिह्न ही लिङ्गरूप से प्रमात्वरूप लक्षण की अनुमिति का हेतु है । अतः चिह्न रूप सहकारी के अज्ञान में अप्रमात्व का भ्रम हो सकता है । खण्डन — यदि ऐसा है, तो उसी चिह्न से 'इयं प्रमा' यह व्यवहार हो जायगा । फिर प्रमाण के अभाव से प्रमात्वजाति की सिद्धि ही न होगी ।
| १६८ | सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य | [ प्रथम |
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तेषां नानात्वे च कानि तानीति वक्तव्यं स्यात् । तच्चिह्नानां यथोपन्यासं सर्वेषामेव दूषितत्वात् । प्रामाण्यपरतस्त्वव्युदस्तप्रस्तावे च विस्तरेण दूषयिष्यामः । एतेन शक्तिविशेषः प्रमात्वम्, तद्योगः प्रमालक्षणमित्यपास्तम् । दुरव- धारकत्वात् । यच्च किञ्चित्प्रमाया लक्षणमुच्यते तदज्ञातं ज्ञातमात्रं वा यदि तत्त्वव्यवहारकम्, तदा अत्यापत्तिः । प्रमितञ्चेत् प्रमाणवधारणे तद्दुदुरवधारकत्वात् । माऽवधारि वस्तुतस्तु तथेति चेन्न । वस्तुतो न तथैव किं नेति वादिन्यनुत्तरा- समर्थन—प्रमा के अनेक चिह्न हैं, इसलिए उन चिह्नों से 'इयं प्रमा' इस अनुगत बुद्धि का समर्थन नहीं हो सकता । अतएव अनुगत बुद्धि के समर्थन के लिए प्रमात्व जाति मानी जाती है । खंडन—'तत्त्वानुभूतित्व' आदि उन चिह्नों का खण्डन यथास्थान कर ही आये हैं । अतः चिह्नों के सहकार से प्रमात्व का मानस प्रत्यक्ष होता है, यह कथन असङ्गत है । किञ्च—'प्रमात्व स्वतोग्राह्य है या परतः' इसके खण्डन के प्रस्ताव में प्रमात्व का चिह्न से सहकृत मानस प्रत्यक्ष होता है, इसका विस्तार से खण्डन करेंगे । समर्थन—प्रमा में अर्थावबोध की जो शक्ति है, वह शक्ति ही प्रमात्व है और प्रमात्वयोग ही प्रमा का लक्षण है । खंडन—यदि इस लक्षण को अज्ञातरूपेण व्यवहार का कारण मानें, तो प्रमात्व का भ्रम या सन्देह न होना चाहिए । यदि ज्ञात व्यवहार का कारण मानें, तो जिस चिह्न से वह ज्ञात होता है, वही चिह्न लक्षण हो, शक्ति का स्वीकार व्यर्थ है, इत्यादि पूर्वोक्त दोषों से शक्तिपक्ष भी असङ्गत है । आप प्रमा का कोई भी लक्षण करें, अज्ञात या केवल ज्ञातरूप में प्रमात्वव्यवहार का कारण मानें, तो भ्रमस्थल में भी प्रमात्व का व्यवहार होना चाहिए । कारण यदि अज्ञात प्रयोजक है, तो अज्ञात-दशा में सत्त्व-असत्त्व दोनों एक से हैं, उनमें भेद तो है नहीं । फिर जहाँ असत् है, वहाँ भी व्यवहार होना चाहिए । साथ ही अप्रमा में भी प्रमात्व का भ्रम या सन्देह हो सकता है । यदि कहें कि 'इदं लक्षणं प्रमितम्' ईदृश ज्ञान का विषय लक्षण व्यवहार का जनक है, तो अद्यावधि प्रमा की निरुक्ति न होने से इस कार्यकारणभाव के नियम में प्रमिति विशेषण [ असिद्ध होने से ] नहीं दे सकते । यदि कहें कि लक्षण में प्रमितत्व का अवधारण न हो, किन्तु जो लक्षण स्वरूप से प्रमित है, उससे व्यवहार होता है और जो प्रमित नहीं है, वह व्यवहार का प्रयोजक नहीं है, तो किसीके यह कहने पर कि 'यह लक्षण प्रमित नहीं है', आप क्या उत्तर देंगे, कारण अभीतक प्रमात्व की निरुक्ति न होने से 'इदं प्रमितम्' इस ज्ञान से प्रमितत्व
परिच्छेद ] प्रथम करणत्व-लक्षण का खण्डन १६६ पत्तेः, प्रमात्वनिरूपणवैयर्थ्यापाताच्च । वस्तुतस्तु प्रमयैव घटादितत्त्वव्यवहारोऽपि तर्ह्यस्तु इत्यास्तां विस्तरः । प्रमाणसामान्य-लक्षणखण्डनम् एवं प्रमितेरनिरुक्त्या प्रमाकरणं प्रमाणमित्यप्ययुक्तम्; करणार्थानिरुक्तेश्च । प्रथम-करणत्वलक्षण-खण्डनम् ननु कारकान्तरेऽचरितार्थस्य हेतुत्वं करणत्वम् । कर्तुर्हि करणं निष्पादयतः कारकान्तरे चरितार्थत्वम्, स्वरूपतोऽनिष्पादनेऽपि व्यापारवतया निष्पादनात् । तादृशस्य च तस्य करणत्वात् । की सिद्धि आप नहीं कर सकते । किञ्च—जैसे लक्षण प्रमितत्व से अनवगत-स्वरूप सत् लक्ष्य के व्यवहार का कारण है, वैसे ही प्रमा भी स्वरूपसत् ही घटादि-व्यव- हार की प्रयोजक होगी । फिर प्रमात्व से प्रमा के अवगम के लिए प्रमा के लक्षण का निरूपण व्यर्थ ही हो जायगा । किञ्च—लक्षण व्यतिरेकी हेतु है और व्याप्तिपक्ष- धर्मतया प्रमितस्वरूप से अवगत ही हेतु अनुमिति का जनक होता है । अतः 'प्रमितत्व से अनवगत लक्षण व्यवहार का प्रयोजक है,' यह कथन असङ्गत है । ऐसे अनेक दूषण हैं, अतः विस्तार न कर एतावत् खण्डन ही पर्याप्त है । प्रमाण-सामान्य के लक्षण का खण्डन पूर्वोक्त रीति से प्रमा का लक्षण न हो सकने पर 'प्रमितिकरणं प्रमाणम्' यह प्रमाण-लक्षण भी अयुक्त हुआ, कारण विशेषण की निरुक्ति के बिना विशिष्ट की निरुक्ति ही नहीं हो सकती । किञ्च—'करण' शब्द के अर्थ की निरुक्ति भी असम्भव है । प्रथम करणत्व-लक्षण का खण्डन समर्थन—जो हेतु कारकान्तर में अचरितार्थ ( अनुपयुक्त ) होकर क्रिया का जनक हो, वह करण है । कर्ता करण का निष्पादन करता है, अतः कारकान्तर में चरितार्थ है । यद्यपि वह करण का स्वरूप से निष्पादन नहीं करता, तथापि व्यापार- वत्त्वरूप से निष्पादन करता ही है । क्योंकि व्यापारयुक्त को ही 'करण' कहते हैं और विशेषण का निष्पादक विशिष्ट का भी निष्पादक होता है । २२
१७० . सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य. [ प्रथम एवं कर्मापि करणनिष्पादने चरितार्थम् । करणव्यापारो हि कर्मविषयो भवति, कर्माभावे विषयाभावात् करणव्यापार एव न निष्पद्यत इति तन्निर्वाहे तस्यापि चरितार्थत्वमिति । एवमधिकरणस्यापि करणव्यापारनिर्वाहकत्वम् । सम्प्रदानापादानयोश्च असार्वत्रिकत्वम् । करणं तु सार्वत्रिकमेवेति कारकान्तरेऽ- चरितार्थः सार्वत्रिको हेतुः करणमिति । मैवम् ; अस्तु तावदविचारितरमणीयमिदं व्याख्यानम् । अन्तरशब्दो यदि विशेषमात्रवचनस्तदा न व्यवच्छेदकः, न हि विशेषमपास्य कारकमात्रं केन- चिज्जन्यन्ते यद् व्यवच्छिद्येत । नापि चान्तरशब्दोऽन्यवचनः ; तथा सति 'कस्मादन्यदि'ति विशेषानिर्देशे इसी तरह कर्म भी करण के निष्पादन में चरितार्थ है। कारण करण का व्यापार कर्म में ही होता है, कर्म के अभाव में आश्रय का अभाव होने से करण का व्यापार नहीं हो सकता । अतः करण के निष्पादन में कर्म भी चरितार्थ है। इसी प्रकार अधिकरण भी करण के व्यापार का जनक है। क्योंकि करण का व्यापार किसी देश-कालरूप अधिकरण में ही होता है । सम्प्रदान प्रायः दानरूप क्रिया का और अपादान विभागरूप क्रिया का ही जनक होता है, अतः वे दोनों सार्वत्रिक नहीं हैं, जब कि करण क्रियामात्र का जनक होने से सार्वत्रिक है। अतः 'कारकान्तर में अचरितार्थ, सार्वत्रिक हेतुं करण है', यही करण का दोषरहित निर्वचन हो सकता है । खण्डन—'करण'-शब्दार्थ का यह व्याख्यान अविचारित-रमणीय है । अर्थात् विचार करके देखा जाय, तो कुछ भी नहीं है। कारण 'अनयोर्महदन्तरम्' की तरह यदि 'अन्तर' शब्द का 'विशेष' अर्थ करें, तो व्यवच्छेद्य न होने से उसका निवेश व्यर्थ हो जायगा । यदि कोई कारक-विशेष को छोड़कर कारक-सामान्य का जनक होता, तो कह सकते कि 'अन्तर शब्द को त्यागकर कारक में अचरितार्थ आदि लक्षण करने पर कारक-सामान्य के जनक का निषेध हो जायगा । वह न हो, अतः अन्तर शब्द का निवेश है।' किन्तु जब विशेष को त्यागकर सामान्य कारक का कोई जनक ही नहीं है, तो 'अन्तर' शब्द का निवेश व्यर्थ ही है। यदि अन्तर शब्द का 'अन्य' अर्थ करें, तो 'किससे अन्य' यह अपेक्षा होने पर समभिव्याहार से 'करण से अन्य' यही अर्थ होगा । जैसे 'अन्य
परिच्छेद ] प्रथम-करणत्व-लक्षण का खण्डन १७१ 'करणादि'ति समभिव्याहारात् लभ्येत, यथा 'अन्य आत्मा शरीरमन्यद्' इत्यादौ । तथा सति करणव्यतिरिक्तकारकाभिप्रायेण प्रयुक्तः स्यात् । तच्च न ; करणस्यैव अद्यापि निरूप्यमाणत्वादतिव्याप्तेश्च । नापि कर्तृकर्मणोः स्वरूपोपादानपरोऽयमन्तरशब्दः ; ताभ्यामेवातिव्याप्त्या- पत्तेः । नापि कर्तृकर्मणी अपेक्ष्यान्यदन्तरशब्दार्थः ; वैयर्थ्यापातात् । कारकेऽचरि- तार्थत्वमेवोच्यताम् । नाप्यनधिकार्थ एवायमिति न प्रयोक्तव्योऽन्तरशब्दः ; तथा सति करणजनकं हस्तादि न करणं स्यात् । व्यापारवद्धि कारणं करणमुच्यते । अस्ति च स्थाली- आत्मा शरीरमन्यत्,' इस स्थल में 'शरीर से अन्य आत्मा और आत्मा से अन्य शरीर, ऐसा अर्थ समभिव्याहार से लब्ध होता है। इसी तरह 'कारकान्तर' शब्द का अर्थ भी 'करण से अन्य कारक' यह हुआ । किन्तु वह हो नहीं सकता, क्योंकि अभी करण का निरूपण ही चल रहा है; अतः करण शब्द का अर्थ अज्ञात ही है । इसी प्रकार करण के लक्षण में करण के प्रविष्ट होने से आत्माश्रय भी है । किञ्च—करण से अन्य कारक में अचरितार्थ कर्ता भी है, अतः कर्ता में अति- व्याप्ति भी हो जायगी । समर्थन—'कारकान्तर' शब्द कर्तृकर्मपरक है, अतः 'कर्ता-कर्म में अचरितार्थ सार्वत्रिक हेतु करण है' यह निष्कृष्ट लक्षण हुआ । खंडन—कर्ता में कर्ता अचरितार्थ है तथा कर्म में कर्म, अतः उन दोनों में ही इस लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'अन्तर शब्द का 'कर्ता-कर्म से अन्य' अर्थ है। एवञ्च 'कर्ता-कर्म से अन्य कारक में अचरितार्थ सार्वत्रिक हेतु करण है' यह लक्षण सम्पन्न हुआ । खंडन— 'करण में अचरितार्थ' इत्यादि कहने से ही कर्ता-कर्म में अतिव्याप्ति का वारण हो जाने से 'अन्तर' शब्द का निवेश व्यर्थ हो जायगा । किञ्च—कर्तृ-कर्म से अन्य कारक ( बहिरूप करण ) में हस्तरूप करण वक्ष्यमाण प्रकार से चरितार्थ है, अतः हस्तरूप करण में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'अन्तर' शब्द का कुछ अधिक अर्थ नहीं है, अतः उसका निवेश आप न करें । अर्थात् 'कारक में अचरितार्थ सार्वत्रिक हेतु करण है', इतना ही लक्षण करें, तो क्या हानि है ? खंडन – ऐसा कहेंगे, तो बहिरूप करण के व्यापार के जनक हस्तादि में लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । देखिए—'व्यापारवान् कारण' को
१७९ | सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य | [ प्रथम
संयोगादिव्यापारवतोऽग्न्यादेस्तथात्वम् । अस्ति च हस्तादेस्तज्जनकत्वम् । न च हस्ताद्यकरणमेवाभ्युपेयम्, व्यापारवतः करणत्वेन तत्कारकत्वस्यावश्याभ्यु- पेयत्वात् । कर्त्रादिषु दुरन्तर्भावित्वात् सप्तमकारकस्वीकारापत्तेः । न च व्यवधानात् अहेतुत्वमेव तेषाम्, किं नाम हेतुहेतुत्वमिति । कर्तुरप्येवं प्रसङ्गात्, पुंव्यापाराद् देहस्पन्दादिस्तेन कुठारक्रियादिस्ततश्छिदेति परम्पराव्यव- धानात् । सर्वैयं कर्तृव्यापारपरम्परा न तस्य हेतुता हन्तीति चेत् ; तुल्यम् । तस्मात् करणत्वेन अवश्याभ्युपगन्तव्यहस्ताद्यव्यापकत्वादलक्षणमिदम् । एतेनाऽपि कारकान्तरशब्दः कर्तृकर्मव्यतिरिक्तवचन इति पक्षो व्युदास्यः । 'करण' कहते हैं, अतः स्थालीसंयोग आदि व्यापारयुक्त तथा पाकरूप क्रिया का हेतु वह्निरूप कारण भी करण है और हस्त [ स्थालीसंयोगादिरूप वह्नि-व्यापार का ] जनक है । हस्त आदि करण ही नहीं हैं, यह नहीं कह सकते; क्योंकि व्यापार से युक्त तथा पाकक्रिया का जनक होने से हस्त कारक तो अवश्य है, पर उसका कर्ता आदि में अन्तर्भाव नहीं हो सकता । उसे आप करण तो मानते नहीं, अतः सप्तम कारक मानना पड़ेगा । समर्थन—स्थाली-संयोग आदि वह्नि के व्यापार में काष्ठ-व्यापार का व्यवधान होने से हस्त हेतु ही नहीं है, किन्तु वह हेतुभूत काष्ठादि-व्यापार का हेतु है । अतः वह्नि- व्यापार में हस्त कारण ही न होने से हस्त में अव्याप्ति ही नहीं है । खंडन—यदि व्यवधान से हेतुत्व का अभाव मानें, तो छिदादि क्रिया में कर्ता भी हेतु नहीं होगा, क्योंकि पुरुष ( आत्मा ) के यत्नरूप व्यापार से शरीर में उद्यमन-निपतनादि व्यापार होते हैं, उनसे कुठार में काष्ठसंयोगादि व्यापार होता है, उससे छेदन होता है, अतः पुरुष-व्यापार में भी छिदादि का व्यवधान है ही । यदि कहें कि पुरुष में कर्तृत्वग्रह होने पर उसकी सिद्धि के लिए ही शरीरादि के व्यापार होते हैं, फलतः सम्पूर्ण व्यापार कर्ता के ही हैं । अतः उन व्यापारों से कर्ता अन्यथासिद्ध नहीं होता; तो हम भी कहेंगे कि हस्त में करणत्वग्रह होने पर उसकी सिद्धि के लिए ही काष्ठादि व्यापार होते हैं, अतः उन व्यापारों से हस्त अन्यथासिद्ध नहीं हो सकता । तस्मात् हस्त को करण तो मानना ही होगा । उसमें करण का लक्षण नहीं जाता, अतः अव्याप्ति हो जायगी । हस्त में अव्याप्ति होने से 'कारकान्तर' शब्द 'कर्तृकर्मभिन्न कारकपरक है' यह भी खण्डित जानना चाहिए ।
परिच्छेद ] द्वितीय करणत्व-लक्षण का खण्डन १७३ द्वितीय-करणत्वलक्षण-खण्डनम् कर्तृव्यापारविषयः करणमित्यपि न । शरीरचालनाय प्रयतमानस्य निष्पाद्या शरीरक्रिया, क्रियाविशिष्टं वा शरीरं प्रयत्नलक्षणकर्तृव्यापारविषयीभवतीति तस्यां क्रियायां करणं स्यात् । न चैतत् शक्याङ्गीकारम्, भविष्यतः स्वं प्रति च कार- कत्वानुपपत्तेः । न च साक्षात्कर्तृव्यापारविषय इति विशेषोपादानेऽप्यस्य परिहारः, साक्षाद्व्यापार्यमनःप्रभृतिक्रियायां प्रसङ्गतादवस्थ्यात्, अव्यापकत्वाच्च । अथ तत्क्रियाहेतुस्तत्क्रियाकर्तृव्यापारस्य विषयस्तत्क्रियाकरणमिति मन्यसे । द्वितीय करणत्व-लक्षण का खण्डन 'कर्ता के व्यापार का विषय करण है' यह लक्षण भी अयुक्त है, कारण शरीर की चलनक्रिया के लिए यत्नवाले कर्ता के यत्नरूप व्यापार का विषय चलनरूप क्रिया या क्रियाविशिष्ट शरीर होता है । अतः शरीर की चलनरूप क्रिया में चलनरूप क्रिया या क्रियाविशिष्ट शरीर करण हो जायगा । अर्थात् जैसे वृक्षच्छेदन के लिए प्रयतमान कर्ता के व्यापार का विषय होने से क्रियाविशिष्ट कुठार या उद्यमन-निपतनादि क्रियाएँ छेदनरूप क्रिया की करण हैं, वैसे ही शरीर-चलन के लिए प्रयतमान पुरुष के व्यापार का विषय होने से क्रियाविशिष्ट शरीर या शरीरक्रिया शरीर-चलनरूप क्रिया की करण हो जायगी । भेद यह है कि प्रकृत में अन्य कोई क्रिया नहीं है, अतः शरीरक्रिया ही शरीर या तत्क्रिया की करण हो जायगी । किन्तु इसे आप अङ्गीकार नहीं कर सकते, क्योंकि करण नियतपूर्ववर्ती होने से भावी पदार्थ करण नहीं हो सकता और न वह स्वयं स्व के प्रति करण होता है । खंडन —कर्ता के व्यापार का साक्षात् विषय करण है, शरीर मनोव्यापार ( सङ्कल्प ) द्वारा कर्तृव्यापार का विषय है; अतः अतिव्याप्ति नहीं है । खंडन—ऐसा लक्षण करने पर तो सङ्कल्पविशिष्ट मन या संकल्प भी करण हो जायगा, कारण वह कर्तृव्यापार का साक्षात् विषय है । किञ्च—कुठारादि भी शरीर-व्यापार द्वारा ही कर्तृव्यापार का विषय होता है, अतः साक्षात् निवेश करने पर कुठारादि में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—जो तत्क्रिया का हेतु होकर तत्क्रिया के कर्तृव्यापार का विषय हो, वह तत्क्रिया में करण है, ऐसा करण-लक्षण करेंगे । एवञ्च शरीरक्रिया शरीरक्रिया में हेतु नहीं है, अतः उसमें अतिव्याप्ति नहीं होगी । खंडन—अनीश्वरवाद में अङ्कुर
१७४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [प्रथम मैवम्; अनीश्वरवादे अङ्कुरादीनामकरणकत्वप्रसङ्गात् । सुषुप्त्यनन्तरभाविन्याः प्रमायाः परिगणितकरणोपाधिभेदपरिसङ्ख्यातेषु प्रमाराशिषु बहिर्भावप्रसङ्गात् । अचेतनस्यापि कर्तृत्वे चातिप्रसङ्गात् । सेश्वरवादे तु ईश्वरव्यापारविषयः सर्वं कारणमिति नाकरणं कारणं स्यात् । ओमित्यभिधाने च अकारणमात्रं व्यवच्छेद्यमिति कारणं करणमित्ये- वोच्यताम्, वृथा विशेषणपूरणप्रयासः । अथ मन्यसे – न धर्म्यन्तरव्यवच्छेदाय विशेषणानि, किन्तु एकस्यापि धर्मिणो रूपभेदेन करणपदाभिधेयतोपदर्शनायेति । एवं तर्हि एतद्रूपालिङ्गितस्य का करण कर्तृव्यापार का विषय नहीं है, अतः अंकुर के करण में लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । यदि कहें कि अङ्कुर करणरहित ही हैं, तो 'कार्यं करणपूर्वकम्' इस व्याप्ति के न होने से रूपादिविषयक ज्ञानरूप कार्य से चक्षुरादि करण की अनुमिति न होगी, जो अनीश्वरवादी के लिए अपसिद्धान्त हो जायगा । किञ्च सुषुप्ति के अनन्तर-क्षण में उत्पन्न प्रमा का करण भी कर्तृव्यापार का अविषय होने से करण न होगा । यदि कहें कि वह प्रमा अकरणक ही है, तो परिगणित करणरूप निमित्त से उत्पन्न पञ्च या षट्-प्रमाराशि में उसका अन्तर्भाव न होगा और एक सप्तम प्रमा माननी पड़ेगी । यदि ज्ञानरहित जीव या शरीर को ही सुषुप्त्यनन्तर जात प्रमा का कर्ता मानें, तो जीव ही अङ्कुर का भी कर्ता हो जायगा । फिर 'अंकुर अकर्तृक है,' तुम्हारा यह कथन असङ्गत हो जायगा । 'उपादान-गोचर-अपरोक्ष-ज्ञानादिमान् ही कर्ता होता है और अंकुर का उपादान-गोचर अपरोक्षज्ञान जीव को नहीं है, अतः जीव अंकुर का कर्ता नहीं है', यह तो अचेतन को कर्ता माननेवाले आप नहीं कह सकते । यदि सेश्वरवाद मानें, तो ईश्वररूप कर्ता के व्यापार के विषय तो सभी कारक होते हैं । अतः सम्पूर्ण कारक करण हो जायेंगे । यदि कहें कि ठीक है, कारणमात्र करण ही है, तो 'कारणं करणम्' यही लक्षण करें, व्यर्थ ही विशेषण का पूरण-प्रयास क्यों करते हैं ? समर्थन—यह विशेषण कर्ता, कर्म आदि अन्य कारकों की व्यावृत्ति के लिए नहीं हैं, किन्तु एक ही कारक की रूप भेद ( प्रवृत्तिनिमित्त ) से करणपद-वाच्यता प्रदर्शन करने के लिए है । खंडन—तब तो लक्षण की निरुक्ति में प्रवृत्त आपने 'तत्क्रिया का हेतु तथा तत्क्रिया के कर्तृव्यापार का विषय तत्क्रिया का करण है' इस कथन द्वारा प्रवृत्ति- निमित्त ही कहा । एवञ्च प्रश्न का उत्तर न देकर अप्रस्तुत का अभिधान करने से अर्थान्तर
परिच्छेद ] द्वितीय करणत्व-लक्षण का खण्डन १७५ करणत्वात् लक्षणोक्तिप्रवृत्तेन त्वया लक्ष्यमात्रमुक्तं भवेत् । न च लक्ष्यपदप्रवृत्ति- निमित्तमेव लक्षणार्थः ; गन्धवत्त्वादेः पृथिव्याद्यलक्षणत्वापत्तेः । अपि चैवं वस्तुमात्रं करणमित्यभिधायैव किं न करणपदप्रवृत्तिनिमित्तमुपा- दर्शि । स्यादेवं यदि सर्वत्र वस्तुनि करणव्यवहारः स्यादिति चेत् ; तर्हि त्वदुक्त- लक्षणमपि भवेत् यदि सर्वत्र कारणे करणव्यवहारः स्यादित्यपि पश्य । नहि कर्तरि कर्मणि वा कस्यचित्करणव्यवहारः । कर्तरि तावदस्ति लोके 'प्रमाणमिह देवदत्तः' इति । शास्त्रेऽपि 'मन्त्रायुर्वेदप्रा- माण्यवच्च तत्प्रामाण्यमाप्तप्रामाण्याद्' इतीति चेन्न । किमयं माणवकेऽग्निव्यवहार इव गौणो मुख्य एव वेति संशये यदि त्वत्परिकल्पितान्निमित्तात् मुख्यः स्यात्ततः कर्मण्यपि स्यात्तत एव निमित्तादिति बाधकदर्शनेन पारिशेष्यात् गौणतयैव तद्व्यवस्थापनाया युक्तत्वात् । का प्रसङ्ग हुआ । यदि कहें कि लक्षण तथा प्रवृत्तिनिमित्त एक ही है, अतः प्रवृत्तिनिमित्त के अभिधान से अर्थान्तर नहीं है, तो गन्धवत्त्व पृथिवी का लक्षण नहीं हो सकेगा । कारण जब आप प्रवृत्तिनिमित्त को ही लक्षण मानते हैं, तो गन्धवत्त्वरूप उपाधि की अपेक्षा लाघव होने से पृथिवीत्व जाति ही प्रवृत्तिनिमित्त होती है, गन्धवत्त्व नहीं । अतः गन्धवत्त्व लक्षण नहीं होगा । अपि च—'वस्तुमात्र करण है' यह कहकर आपने करणपद के प्रवृत्तिनिमित्त का प्रदर्शन क्यों नहीं किया ? यदि कहें कि 'ऐसा तभी कह सकते थे, जब कि वस्तुमात्र में करण व्यवहार होता,' तो हम भी कह सकते हैं कि 'तभी आपका यह लक्षण भी हो पाता, यदि कारणमात्र में करण व्यवहार होता ।' आप भी यही देखें कि कर्ता या कर्म के बीच किसीक करण में भी व्यवहार नहीं होता । समर्थन—लोक में 'प्रमाणमिह देवदत्तः' इस स्थल में कर्ता में करण-व्यवहार देखा ही जाता है। शास्त्र में भी 'मन्त्रायुर्वेदप्रामाण्यवच्च तत्प्रामाण्यमाप्तप्रामाण्यात्' इस स्थलमें कर्ता में करण व्यवहार देखा जाता है। खंडन—'क्या यह व्यवहार 'अग्निर्मााणवकः' के तुल्य गौण है या मुख्य ?, ऐसा सन्देह होने पर यदि तुम्हारे कल्पित निमित्त से इस व्यवहार को मुख्य मानें, तो उसी तुम्हारे कल्पित निमित्त से कर्म में भी करण-व्यवहार होना चाहिए किन्तु कर्म में तो करण-व्यवहार का बाध (अभाव) देखा ही जाता है । अतः परिशेष से कर्म या कर्ता में गौणता से करण-व्यवहार होता है, यही व्यवस्था युक्त है ।
१७६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अस्त्येव कर्मण्यपि तेन रूपेणेति चेन्न । न तावदयं शक्योपदर्शनोदाहरणः शास्त्रलोकयोः । क्व दृश्यते 'घटं पश्यती'त्यर्थे 'घटेन पश्यती'ति । यदि तु त्वच्चेतसि केवलं स्यात्, तन्न च नादरं विधातुमुत्सहामहे । प्रमेयमात्रं करणमिति वदतो वामबुद्धेर्मनसि विपरिवर्तमानं प्रमेयमात्र एव करणव्यवहारास्तित्वमेव- मनुरोद्धव्यं स्यादिति । 'घटेन पश्यती'त्याद्यनभिधानवशान्न प्रयोगः, न हि सर्वं लाक्षणिकं प्रयुज्यत इति चेन्न माऽस्तु, तदभावे काऽन्याऽस्ति तेषु करणव्यवहार इति वक्तव्यः स स्यात्, न चासौ शक्यदर्शन इति । क्रियया अयोगव्यवच्छेदेन सम्बन्धि करणमित्यपि न । तथा हि—अयोग- व्यवच्छेदो योग एव पर्यवस्येदित सम्बन्धेन सम्बन्धीत्युक्तं स्यादिति पौनरुक्त्यम् । समर्थन—कर्म में भी कर्तृव्यापार-विषयत्वरूप से करणत्व-व्यवहार होता ही है । खण्डन—नहीं, लोक या वेद में कहीं भी 'घटं पश्यति' के स्थान पर 'घटेन पश्यति' ऐसा व्यवहार नहीं देखा गया है । यदि केवल आपके चित्त में 'घटं पश्यति' के स्थान पर 'घटेन पश्यति' ऐसा व्यवहार हो, तो उसका आदर करने में हमें उत्साह नहीं होता । कारण यदि आपके वचन का आदर करें, तो 'प्रमेयमात्र करण है' यह कहनेवाले वामबुद्धि आपके वचन का आदरकर प्रमेयमात्र को करण मानना पड़ेगा । समर्थन—अभिधान न होने से 'घटेन पश्यति' यह प्रयोग नहीं होता । कारण यह निश्चय नहीं है कि लक्षण से युक्त या सिद्ध सबका प्रयोग हो । खंडन—कर्म में करण शब्द या विभक्ति का प्रयोग न होने पर उसमें करणत्वप्रयुक्त कौन-सा व्यव- हार होता है, यह कहना होगा किन्तु आप उसको कह नहीं सकते । समर्थन—जो कुठारादि प्रधान क्रिया ( छिदादिरूप फल ) से अयोगव्यवच्छेद ( सम्बन्धाभावका अभाव ) द्वारा सम्बद्ध हो, वह करण है । कुठार का व्यापार होने पर छेदन अवश्य होता है, अतः कुठार में छेदन के अयोग का व्यवच्छेद है । कर्ता का व्यापार होने पर भी सम्भव है कि कदाचित् छेदन न हो । अतः कर्ता में छेदन का सम्बन्ध तो है, किन्तु छिदा के अयोग का व्यवच्छेद नहीं है, इसलिए न कुठार में अव्याप्ति है और न कर्ता में अतिव्याप्ति । खंडन—अभाव का अभाव प्रतियोगि- रूप होता है । अतः अयोग का व्यवच्छेद योगरूप होने से उक्त लक्षणवाक्य का अर्थ हुआ सम्बन्धयुक्त सम्बन्धी । फलतः पुनरुक्तिदोष होने से उक्त लक्षण असङ्गत है ।
परिच्छेद ] द्वितीय करणत्व-लक्षण का खण्डन १७७ यदा सम्बन्धीत्यनेन कालविशेषनियतसम्बन्धिता अभिधीयते, ततोऽन्यस्मि- न्नपि काले सम्बन्धिता अयोगव्यवच्छेदपदेन विवक्षितेति चेन्न । सम्बन्धीत्यनेन न कालविशेषनियता सम्बन्धिताऽभिहिता, येन कालान्तरेऽलब्धसम्बन्धताभिधा- नाय पदान्तरमुपादीयेत । अथोच्यते—सम्बन्धीत्यस्य सामान्यतोऽभिधायिनः कालविशेषनियतं सम्ब- न्धमादायपि पर्यवसाने सार्थक्यं भवत्येवेति कालान्तरेऽसम्बन्धितया व्यवतिष्ठ- मानं कत्राद्यपि करणं प्रसज्येत । तद्व्यवच्छेदाय कालान्तरे सम्बन्धिता पदान्तरेणा- भिधीयत इति । मैवम् ; तर्हि तेनापि क्वचिदेव कालान्तरे सम्बन्धिताऽभिधीयेत, तदापि तस्य सार्थकता सम्बन्धिपदन्यायेन सामान्याभिधायिनो भवेदिति ततोऽपि कालान्तरे असम्बन्धव्यवच्छेदाय विशेषणान्तरमपि निवशनीयं स्यात् । अथ यदा कदाचिदपि योऽयोगस्तस्य सर्वस्य व्यवच्छेदो विवक्षित इति । समर्थन—'सम्बन्ध' शब्द काल-विशेष से नियत सम्बन्ध का वाचक है । अतः काल- विशेष से अन्य काल में सम्बन्धित्व प्रतिपादन करने के लिए 'अयोगव्यवच्छेद' का लक्षण में निवेश है । खण्डन—'सम्बन्धी' पद से काल-विशेष से नियत सम्बन्ध का अभिधान नहीं होता, किन्तु सामान्यतः सम्बन्ध का अभिधान होता है । अतः सम्बन्धी कहने पर अन्य काल में अयोग प्राप्त नहीं होता, फिर उसके व्यवच्छेद के लिए 'अयोगव्यवच्छेद' पद का उपादान व्यर्थ है । समर्थन—यद्यपि 'सम्बन्धी' पद सामान्यतः सम्बन्धमात्र का अभिधान करता है, तथापि कालविशेष से नियत सम्बन्ध में भी सम्बन्धी पद का पर्यवसान हो सकता है । अतः कदाचित् छिदादि प्रधान क्रिया से असम्बद्ध कर्ता में करणत्व के व्यवच्छेद के लिए अयोगव्यवच्छेद पद का लक्षण में निवेश हो सकता है । खण्डन—जैसे सामान्यतः सम्बन्ध का वाचक 'सम्बन्धी' पद कालविशेष से नियत सम्बन्ध में पर्यवसित होता है, वैसे ही अभावाभाव के प्रतियोगी रूप होने से, सामान्य सम्बन्ध के वाचक 'अयोगव्यवच्छेद' शब्द का भी यदि कालविशेष से नियत सम्बन्ध में ही पर्यवसान मान लें, तो फिर भी कर्ता में अतिव्याप्ति हो जायगी । अतः उसमें अति- व्याप्ति के वारण के लिए अन्य विशेषण का निवेश करना होगा । इस प्रकार उत्तरोत्तर विशेषण-निवेश करने पर अनवस्था हो जायगी । समर्थन—अन्य काल में भी जो अयोग हो, उसका व्यवच्छेद अयोगव्यवच्छेद शब्द का अर्थ है । अतः क्रिया से सार्वकालिक कुठार-सम्बन्ध के लाभ के लिए २३
१७८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम तर्हि सम्बन्धिपद एवैषा विवक्षाऽस्तु, कृतमधिकमुपादाय तद्विवक्षया। निषेध- व्यवच्छेदेन सार्वत्रिकत्वलाभ इति चेन्न। निषेधस्यव्यवच्छेदस्य विध्यनतिरेकार्थ- त्वेनाविशेषात्। तद्धर्मिकं सम्बन्धस्य असम्बन्धासामानाधिकरण्यम् 'अयोगव्यवच्छेदेने' त्यने- नोच्यत इति चेन्न। तस्यापि सत्त्वकाले तत्रासत्त्वोपगमात्। सर्वदेति चेन्न। यद्येवं तत् किं करणासत्त्वकालेऽपि योग एव करणेन क्रियायाः? यावत्सत्त्वमिति चेत्; तर्हि सम्बन्धीति व्यर्थम्, यावत् सत्त्वमयोगव्यवच्छेदेन अयोगव्यवच्छेद पद सार्थक है। खंडन—सम्बन्धी पद से ही अन्य काल में अयोग का व्यवच्छेद विवक्षित क्यों न मानें? उसके लिए अयोगव्यवच्छेद शब्द का निवेश क्यों किया जाय? समर्थन—अयोगव्यवच्छेदरूप विशेषण से अयोग का निषेध होने पर सार्वकालि- कत्व का लाभ हो जाता है। खंडन—अभावाभाव प्रतियोगी रूप होने से जब अयोगव्यवच्छेद योगरूप ही है, तो 'अयोगव्यवच्छेद' शब्द से सार्वकालिक सम्बन्ध का लाभ ही कैसे होगा? समर्थन—'जिस कुठारादि में छिदादि प्रधानक्रिया का सम्बन्ध प्रधानक्रिया के सम्बन्धाभाव से समानाधिकरण न हो, वह करण है'—यह अर्थ अयोगव्यवच्छेद शब्द से विवक्षित है। एवञ्च कर्ता में छिदा का सम्बन्ध 'स्व' के असम्बन्ध से समानाधिकरण है, अतः उसमें अतिव्याप्ति नहीं होगी। खंडन—कर्ता में भी छिदा के सम्बन्धकाल में छिदा का असम्बन्ध नहीं है, अतः उसमें उक्त लक्षण की अतिव्याप्ति तदवस्थ ही है। समर्थन—जिस धर्मी में छिदा के सम्बन्ध के अभाव का सदा असत्त्व हो, वह करण है। कर्ता में छिदा के सम्बन्ध-काल में उसके सम्बन्धाभाव का असत्त्व होने पर भी सदा असत्त्व नहीं है, अतः अतिव्याप्ति नहीं है। खंडन—यदि ऐसा है, तो क्या करण के असत्त्वकालमें भी क्रिया के साथ करण का सम्बन्ध विवक्षित है? अर्थात् करण में भी सर्वदा सम्बन्ध नहीं है, अतः लक्षण असम्भवी हो जायगा। समर्थन—यावत् कुठारादि करण का सत्त्व हो, तावत् कुठारादि में छिदा का सत्त्व विवक्षित है। खंडन—ऐसा होने पर सम्बन्धी पद व्यर्थ हो जायगा। अर्थात् "यावत् 'स्व' का सत्त्व हो, तावत् जो धर्मी क्रिया के अयोगव्यवच्छेद से विशिष्ट या
परिच्छेद ] द्वितीय करणत्व-लक्षण का खण्डन १७६ यद्विशिष्टमुपलक्षितं वा तत्करणमित्येवास्तु, सम्बन्धीत्येव वा तथा विवक्ष्यता- मित्युकतमेव । अयमेवार्थः कयाऽपि कुसृष्ट्या सम्बन्धिपदसार्थकतामुपपाद्य यदि विव- क्षितस्तदाप्युच्यते — कृत्तिकोदयक्रियायां रोहिण्यासत्तिरेवेवं करणं स्यात्, अनन्तर- भाविनश्चतुर्दशस्य नक्षत्रस्योदयं प्रति पूर्वभाविचतुर्दशसङ्ख्यनक्षत्रास्तमयस्य च करणत्वं स्यात् । न चैवमेव युक्तम् ; यौगपद्येन कारणत्वानुपपत्त्या कारकत्वस्य दुर्निरस्तत्वेन करणत्वस्य सम्भावनाऽनारोहात् । न च तत्र सम्बन्ध एव नास्ति; व्याप्तेः स्वभावसम्बन्धात्मिकाया दुरपह्नवत्वात् । अथ कार्यकारणभावः सम्बन्धो विवक्षितः । न ; सामग्र्याः करणत्वापत्तेः । उपलक्षित हो, वह करण है,” अथवा “यावत्सत्त्व जो प्रधान छिदादि क्रिया का सम्बन्धी हो, वह करण है” ऐसा ही लक्षण रहे, 'अयोगव्यवच्छेदेन' यह विशेषण व्यर्थ है । यदि कहो कि सम्बन्धी पद से सम्बन्ध-सामान्य विवक्षित है और अयोगव्यवच्छेद पद से यावत्-कारक-सत्त्व विवक्षित है, अतः न पुनरुक्ति है और न विशेषण ही व्यर्थ है, तो यह कल्पना उदक्षर होने से ( अक्षरार्थ न होनेसे ) कुत्सित है । किञ्च — ऐसा निवेश करने पर भी कृत्तिकानक्षत्र की उदयरूप क्रिया में रोहिणी का सामीप्य भी करण हो जायगा । किञ्च — उत्तरभावी चतुर्दश नक्षत्र के उदय के प्रति पूर्वभावी चतुर्दश नक्षत्र का अस्तगमन भी करण हो जायगा । समर्थन — कृत्तिकानक्षत्र के उदय में रोहिणी का सामीप्य करण क्यों नहीं माना जाय ? खण्डन — एक काल में होने से उसमें पूर्वकालवृत्तित्वरूप कारणत्व ही नहीं है, अतः करणत्व की सम्भावना भी नहीं है । समर्थन — कृत्तिकोदय का रोहिणी के सामीप्य में सम्बन्ध नहीं है । अतः क्रिया के साथ अयोगव्यवच्छेद से युक्त सम्बन्धरूप करणत्व लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं है । खंडन — कृत्तिकोदय की रोहिण्यासत्ति ( रोहिणी के सामीप्य ) में स्वभाव ( स्वरूप ) सम्बन्धरूप व्याप्ति ही सम्बन्ध है । उसका अपह्नव नहीं हो सकता । समर्थन — क्रिया के साथ अयोगव्यवच्छेद से युक्त कार्यकारणभावरूप सम्बन्ध जिसमें हो, वह करण है। कृत्तिकोदय का रोहिणी के सामीप्य में कार्यकारणभाव नहीं है, अतः अतिव्याप्ति नहीं है। खण्डन — छिदादि प्रधान क्रिया के साथ अयोगव्यवच्छेद से युक्त सम्बन्धी सामग्री भी है; अतः सामग्री में
१८० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम ओमिति चेत्; तत्किमोमित्यभिधायैव निवृत्तो भवान् ? आकलितं किलास्माभिः सामग्र्यपि करणमित्यत्र न श्रदधतः प्रणवपूर्विकां श्रुतिमेव काञ्चित्पठित्वा श्रद्धा- पयिष्यति भवानस्मानिति । न सामग्री कारणम्, किन्तु तदेकदेशो नानाभूतः प्रत्येकं तथा । सामग्री तु 'यदनन्तरं कार्यं भवत्येव'इत्येतावन्मात्ररूपेति चेन्न । एतादृशस्य सामग्रीलक्षणस्य करणेऽपि सत्त्वात् करणस्यापि सामग्रीत्वापातात्, क्रियाया विभागादौ विभागस्य च संयोगनाशादिं प्रति तथात्वापत्तेः । यच्च प्रतिसामग्र्येकदेशं नियतप्राग्भावादि कारणलक्षणमिष्यते, तत्सामग्र्या- मपीति कथं तदकारणता ? प्राक्कालमन्तर्भाव्य सामग्री, तादृश्याश्च तस्याः प्राक्सत्त्वमेव नास्तीति चेन्न । तत एव प्राक्कालस्याकारणत्वात् कारणसामग्र्यां तदनिवेशात् । करणत्व का प्रसङ्ग हो जायगा । यदि आप 'ओम्' शब्द का उच्चारणकर सामग्री का करणत्व स्वीकार करायें, तो क्या आप 'ओम्' कहकर ही कृतकृत्य हो गये ? हमने तो यही समझा कि बिना किसी युक्ति के सामग्री को करण मानने में श्रद्धा न रखने- वाले हम लोगो को आप प्रणवपूर्वक कोई श्रुतिवचन पढ़कर श्रद्धा करा देंगे । समर्थन—सामग्री कारण नहीं, बल्कि उसका एकदेश जो, कि समवायी, असमवायी आदि अनेकविध है, कुठारादि प्रत्येक कारण है । जिसके अनन्तर उसरकाल में कार्य अवश्य हो, वह सामग्री है । अतः सामग्री में क्रिया के साथ अयोगव्यवच्छेद से युक्त कार्यकारणभावरूप सम्बन्ध न होने से अतिव्याप्ति नहीं है । खण्डन--सामग्री का यह लक्षण करण में भी है, अतः करण में सामग्री के लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—क्रिया विभाग की और विभाग संयोग के नाश की सामग्री हो जायगा । किञ्च—नियतपूर्ववर्तित्वरूप जो कारणत्व-सामग्री के एकदेश में है, वह सामग्री में भी है ही । अतः 'सामग्री कारण नहीं है' यह कथन भी उचित नहीं है । समर्थन—सामग्री में अन्तर्भूत प्राक्काल भी है और उसमें प्राक्सत्त्वरूप कारणत्व नहीं है । अतः प्राक्कालघटित सामग्री में प्राक्सत्त्वरूप कारणत्व नहीं है । खण्डन—प्राक्काल में पूर्वक्षणवृत्तित्व का असत्त्व होने से वह कारण ही नहीं है। अतः कारणसमूहरूप सामग्री में प्राक्काल का प्रवेश हो ही नहीं सकता ।
परिच्छेद ] द्वितीय करणत्व-लक्षण का खण्डन १८४ अपि चैवं विवक्षितमपि करणं न स्यात् । न हि यावत्सत्त्वं व्यापारवतोऽपि तस्य क्रियाजनकत्वम् ; क्रियाकाले क्षणमपि तदनुवृत्तिनिषेधे प्रमाणस्य दुरुपन्या- सतया संशयेनापि लक्षणासिद्धेः । प्रत्युत चिरस्थिरकरसंयोगे स्पृश्ये स्पर्शप्रमा- करणस्पर्शनैन्द्रियसंयोगस्थैर्यस्य मन्तुमुचितत्वात् । यावत्सत्त्वं च कारणमिति भाषायां सर्वस्मिन् तत्सत्त्वकाले करणत्वमित्यर्थः । न च कारणत्वस्य नियतपूर्वकालसम्बन्धात्मकस्य क्वचित्काले सत्त्वम्, कालं प्रति कालान्तराभावादिति । अथ क्रियया अयोगव्यवच्छेदेन सम्बन्धीत्यस्यायमर्थो यस्मिन् सति भवत्येव क्रियेति । कोऽस्यार्थः—किं यस्मादनन्तरं क्रियोत्पद्यत एव, उत यस्मिन् वर्तमाने अपिच—'यावत्सत्त्व ( अवस्थिति ) क्रिया का अयोगव्यवच्छेद से जो सम्बन्धी हो, वह करण है' ऐसा लक्षण होने पर विवक्षित कुठारादि भी [ उद्यमन-निपतन- विशिष्ट कुठार का या कुठार की उद्यमन-निपतन क्रिया का यावत्काल में प्रधानक्रिया छिदादि के साथ जनकत्वरूप सम्बन्ध न होने से ] करण नहीं कहलायेंगे । कारण, कुठारादि के क्रियाकाल में क्षणभर भी प्रधानक्रिया छिदा के असम्बन्ध का निषेध है, इसमें कोई प्रमाण नहीं । अतः असम्भव के सन्देह से भी यह लक्षण असङ्गत है । प्रत्युत देखा यह जाता है कि स्पृश्य द्रव्य में चिर-स्थिर कर-संयोग होने पर त्वगिन्द्रिय और स्पृश्य द्रव्य का संयोगरूप व्यापार तो है; किन्तु चित्त के अन्यत्र व्यासक्त होने पर त्वाच-प्रमा नहीं होती । अतः स्पर्श-प्रमा के साथ त्वगिन्द्रिय का अयोगव्यवच्छेदयुक्त सम्बन्ध न होने से त्वगिन्द्रिय में करण-लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—'यावत्-सत्त्व क्रिया के साथ अयोगव्यवच्छेद से जनकता रूप से जो सम्बन्धी हो, वह करण है' इस वाक्य का यह अर्थ हुआ कि 'सर्वकरणसम्बन्धी काल में विद्यमान कारण करण है।' किन्तु वह अयुक्त है, कारण, काल में काल नहीं रहता । अतः काल से घटित प्राक्कालसत्त्वरूप करणत्व से विशिष्ट कारण काल में भी नहीं रहेगा । समर्थन—'अयोगव्यवच्छेद से युक्त जो क्रिया का सम्बन्धी हो' इस वाक्य का 'जिसके होने पर अवश्य क्रिया होती हो' यह फलित अर्थ है । खण्डन—'जिसके होने पर अवश्य क्रिया होती हो' इस वाक्य का 'जिसके अनन्तर क्षण में क्रिया अवश्य उत्पन्न होती हो' यह अर्थ है, 'जिसके रहते क्रिया अवश्य उत्पन्न हो' यह
१८२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [प्रथम क्रियोत्पद्यत एव, उत यस्मादनन्तरं क्रिया तिष्ठत्येव, उत यस्मिन् वर्तमाने क्रिया तिष्ठत्येव ? नाद्यः; सामग्र्याः करणत्वप्रसङ्गात्, हस्तादीनामकरणत्वप्रसङ्गाच्च, सुखदुःखदेः प्रमेयस्यापि प्रमाकरणत्वप्रसङ्गाच्च । न च प्रमेयमपि प्रमायाः करणं स्यादेवेति वाच्यम्; तत्र तथाव्यवहारस्य कस्यचिदप्यसिद्धेः । नापि द्वितीयः; स्पृश्येन सह स्थिरसंयोगस्य स्पर्शनैन्द्रियस्याव्यापनात् , तत्सत्त्वेऽपि व्यासक्तौ तेन प्रमानुत्पादनात् । नापि तृतीयः ; सामग्र्यादेः करणत्व- प्रसङ्गात्, उत्पत्तेः, स्थिरे करणत्वप्रसङ्गाच्च । नापि चतुर्थः; सहस्थायिनां करणत्वप्रसङ्गात् । अर्थ है, 'जिसके अनन्तर क्रिया अवश्य रहती हो' यह अर्थ है अथवा 'जिसके रहते क्रिया अवश्य रहती हो' यह अर्थ है ? इन चार कल्पों में प्रथम कल्प युक्त नहीं है । कारण, सामग्री के अनन्तर भी अवश्य कार्य उत्पन्न होता है, अतः सामग्री करण हो जायगी । किञ्च - हस्त-व्यापार के अनन्तर कदाचित् पाकादि क्रिया नहीं भी होती, अतः हस्तादि में लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । सुख-दुःख अवश्य वेद्य हैं । अर्थात् सुखादि क्षणभर भी अज्ञात नहीं रहते, किन्तु उत्पत्तिके अनन्तर इनकी प्रमिति अवश्य होती है, अतः सुखादि भी स्व- प्रमिति के करण हो जायेंगे । प्रमेय भी प्रमा का करण होता है, यह तो कभी नहीं कह सकते ; कारण कर्म में करण-व्यवहार देखा नहीं जाता । द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है ; कारण व्यासङ्ग-दशा में त्वगादि इन्द्रिय और स्पृश्यादि विषयोंका संनिकर्ष होने पर भी प्रमिति न होने से त्वगादि इन्द्रियों में अव्याप्ति हो जायगी । तृतीय कल्प भी प्रायः प्रथम कल्प में उक्त दूषण से ही दूषित है । किञ्च - जो कार्यों को स्थिर मानते हैं अर्थात् क्षणिक नहीं मानते, उनके मत में भी घटादि से स्वसत्तारूप क्रिया अनन्तर होती है. अतः घटादि स्वसत्त्वरूप क्रिया में करण हो जायेंगे । चतुर्थ कल्प भी अयुक्त है, कारण एक साथ रहनेवाले रूपादि के रहने पर ही रसादि रहते हैं । अतः सहस्थायी रूपादि भी रसादि के करण हो जायेंगे ।
परिच्छेद ] व्यापार-लक्षण का खण्डन १८३ अथ क्रियया अयोगव्यवच्छेदेन सम्बन्धित्वं करणत्वमित्यस्यायमर्थः— व्यापारवतः फलाव्यभिचारित्वमिति । मैवम् ; हस्ताद्यव्यापनात् । व्यापार-लक्षण-खण्डनम् कश्चायं तद्व्यापारो नाम—किं तज्जन्यं कारणम् , उत तदाश्रयं कारकम् ? नाद्यः ; लिङ्गपरामर्शे तदसम्भवात् । पक्षे प्रथमधूमादिदर्शनस्य व्याप्तिस्मृतिद्वारा द्वितीयलिङ्गपरामर्शव्यापारं जनयतः करणत्वमेष्टव्यम् । एवञ्च परमार्थतो व्याप्यस्य स्वरूपेण प्रमितिर्द्वितीय- व्याप्ततत्परामर्शव्यापारिका अनुमानमिष्यत इति चेन्न । अन्यतो जाताग्निधूमादि- व्याप्तिस्मृतौ सत्यां पक्षगतप्रथमधूमादिदर्शनस्य तद्व्यापारकत्वासिद्धेः । समर्थन—'क्रिया के साथ अयोगव्यवच्छेदयुक्त सम्बन्धी करण है' इसका फलित अर्थ यह है कि 'जिस व्यापार के होने पर फल का अव्यभिचार हो, वह करण है।' खंडन—हस्त का व्यापार होने पर भी कदाचित् फल का व्यभिचार होने से हस्त में अव्याप्ति हो जायगी । व्यापार-लक्षण का खण्डन किञ्च—करण का व्यापार क्या वस्तु है—क्या करण से जन्य कारण व्यापार है अथवा करण का आश्रित कारण व्यापार है ? इनमें प्रथम कल्प युक्त नहीं है; कारण, लिङ्गपरामर्श करणजन्य न होने से व्यापार न कहलायेगा । समर्थन—पक्ष ( पर्वतादि ) में प्रथम जो धूम का चाक्षुष प्रत्यक्ष होता है, वह व्याप्तिस्मृति द्वारा द्वितीय लिङ्गपरामर्श का जनन करता है; अतएव वह करण है। ऐसा होने पर वस्तुतः व्याप्य धूम की स्वरूपतः प्रमा वह्निव्याप्य धूमात्मक परा- मर्शरूप व्यापारयुक्त होने से उसका अनुमान इष्ट है । खण्डन—दैववश जहाँ पूर्वगृहीत व्याप्ति की स्मृति हुई हो, वहाँ द्वितीय लिङ्गपरामर्श उस स्मृति से जन्य ही होता है । प्रथम पक्ष में धूम का जो प्रत्यक्ष हुआ है, उससे जन्य नहीं है । अतः प्रथम लिङ्ग के ज्ञान का द्वितीय लिङ्गपरामर्श व्यापार नहीं कहा जायगा ।
१८४ : सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [प्रथम तत्राप्युभयकर्मजसंयोगवत्तदपि कारणमिति चेन्न । अभावादिसापेक्ष-विशिष्ट- प्रतिपत्तिवत् प्रागुपजातवह्निव्याप्तधूमस्मृतेः प्रथममपि 'योऽसौ वह्निव्याप्तः सोऽयं धूमः' इति परामर्शोपपत्तेः । नित्यसापेक्षेऽर्थेऽस्तु तथा, नान्यत्र प्रथमं तथेति चेन्न । प्राक् तत्कारणोपपत्तौ नान्यत्रैवमिति नियमे प्रमाणास्याभावात् । तस्य व्यापाराभावान् नानुमित्युत्पाद- कत्वमेवेति चेत्; स्यादप्येवं यदि व्यापारवतः करणत्वमित्येव सिद्धं स्यात् । तत्र धूमादिनिर्विकल्पकस्य तद्व्यापारस्य करणत्वमिति चेन्न । नित्यसङ्घटितार्थव- द्विनापि निर्विकल्पकं सविकल्पकोत्पत्तेरविरोथेन त्वदुक्तप्रक्रियानियमे प्रमाणाभावात् । समर्थन—उभयकर्मज संयोग के तुल्य वह परामर्श भी दैववश जात व्याप्ति की स्मृति और प्रथम धूमदर्शन दोनों से जन्य हो सकता है । खंडन—जैसे प्रतियोगी की स्मृति से प्रतियोगिविशिष्ट अभाव की प्रमा होती है, वैसे ही दैववश जात व्याप्ति की स्मृति से प्रथम भी धूमदर्शन के बिना ही ‘जो धूम वह्निव्याप्त है, तद्द्घूमवान् यह पर्वत है’ ऐसा परामर्श हो सकता है । समर्थन—अभावप्रमा के तुल्य धूमत्वविशिष्ट में व्याप्ति के वैशिष्ट्य का भान प्रथम धूमज्ञान के बिना नहीं हो सकेगा; कारण अभाव प्रतियोगी में नित्य साकाङ्क्ष है । अतः प्रतियोगिनिरपेक्ष केवल अभाव की प्रमा नहीं हो सकती । किन्तु प्रथम ही विशिष्टवैशिष्ट्यावगाही अभाव की प्रमा होती है । प्रकृत में नित्य साकाङ्क्ष न होने से वैशिष्ट्यावगाही ज्ञान प्रथम धूमदर्शन के बिना नहीं हो सकेगा । खंडन—जब व्याप्तिस्मृति, धूम तथा चक्षुःसंयोग आदि कारण विद्यमान हैं, तब ‘नित्य सापेक्ष न होने से प्रथमतः धूमदर्शन के बिना विशिष्टवैशिष्ट्यावगाही ज्ञान नहीं हो सकता’ यह कथन निर्युक्तिक है । समर्थन—लिङ्गपरामर्श में कोई व्यापार नहीं है, अतः वह करण नहीं है । खंडन—यह कथन तभी युक्त होता, जब ‘सव्यापार ही करण होता है’ यह नियम
- होता । परन्तु ऐसा नियम नहीं है; कारण, व्यापाररहित व्यापार भी करण होता है । समर्थन—प्रथम धूम का निर्विकल्पक ज्ञान होता है, अनन्तर विशिष्टवैशिष्ट्याव- गाही धूम का परामर्श होता है। अतः धूम का निर्विकल्पक ज्ञान ही परामर्श द्वारा अनुमिति का करण है । खंडन—प्रतियोगी में नित्य सापेक्ष अभाव की प्रमा के तुल्य निर्विकल्पक के बिना भी पूर्वोक्त रीति से व्याप्तिविशिष्ट धूम का परामर्श हो सकता है। अतः ‘निर्विकल्पक ज्ञान के बिना सविकल्पक ज्ञान नहीं हो सकता’—आपकी इस कल्पित प्रक्रिया में कुछ भी प्रमाण नहीं है ।
परिच्छेद ] व्यापार-लक्षण का खण्डन १८५ नित्यसङ्घटितेऽपि निर्विकल्पकं मंस्यस इति चेन्न । कारणान्तरादेव तदुपपत्तौ तत्र निर्विकल्पककल्पनायां प्रमाणाभावात् । प्रत्युत तत्सङ्घटनस्य स्वभा- वानतिरेकोपगमात् । तथापि यत्किञ्चित्जनकं तदेव तत्रानुमितिकरणमास्तामिति चेन्न । तथेन्द्रिया- देरनुमितिकरणत्वापत्तेरिति अलमतिप्रसरेणेति । शब्दश्रोत्रसन्निकर्षस्य च श्रोत्राव्यापारत्वप्रसङ्गात् । अन्यथा श्रोत्रस्य शब्द- प्रतिपत्तावकरणत्वप्रसङ्गात् । सन्निकर्षो हि इन्द्रियव्यापार उच्यत इति व्यापारा- न्तरञ्च तस्य क्षणिकमसिद्धम् , स्थिरे चोक्त एव दोषः । समर्थन—अभाव की प्रमा भी निर्विकल्पकज्ञानपूर्वक ही होती है, ऐसा मानेंगे । खंडन—जब अभाव की प्रमा प्रतियोगी की स्मृति से युक्त इन्द्रिय-सन्निकर्ष से ही हो सकती है, तब उस प्रमा में निर्विकल्पक ज्ञान को कारण मानने में कोई प्रमाण नहीं है । प्रत्युत अभाव आदि नित्यसाकाङ्क्ष पदार्थों का यह स्वभाव है कि निर्विकल्पक ज्ञान के विना भी वे विशिष्टज्ञान ( सविकल्पक ज्ञान ) के विषय होते हैं । समर्थन—व्याप्ति की स्मृति ही परामर्शरूप व्यापार की जनक होने से अनुमिति का करण क्यों न मानी जाय । खण्डन—ऐसा होने पर इन्द्रिय ही अनुमिति- करण क्यों न मानी जाय ? जैसे 'वह्निव्याप्यो धूमः' इत्याकारक व्याप्तिस्मृति, 'योऽयं वह्निव्याप्यो धूमस्तद्वान् अयं पर्वत:' इस परामर्श की जनिका है, वैसे ही इन्द्रिय भी उक्त परामर्श की जनिका है। अतः व्याप्तिस्मृति के तुल्य इन्द्रिय की भी उक्त स्मृति व्यापार हो सकती है। यदि इन्द्रिय को अनुमिति का करण मान लें, तो इन्द्रियजन्य होने से अनुमिति प्रत्यक्ष हो जायगी । एवञ्च प्रत्यक्षत्व तथा अनुमितित्व का साङ्कर्य हो जायगा । इतना० ही बहुत है, विस्तार से कुछ फल साध्य नहीं । किञ्च—यदि करण का व्यापार करण से जन्य कहा जाय, तो शब्द के साक्षात्कार में श्रोत्र का शब्द-समवाय [ अजन्य होने से ] व्यापार नहीं होगा । यदि समवाय को उक्त स्थल में व्यापार न मानें, तो श्रोत्र करण न हो सकेगा । कारण, व्यापारवत् कारण को ही करण कहते हैं और श्रोत्र का शब्द से सन्निकर्ष ही व्यापार हो सकता है । जो क्षणिक जन्य हो, ऐसा अन्य व्यापार शब्द-प्रत्यक्ष में असिद्ध है और स्थिर ( समवाय ) व्यापार [ उक्त लक्षण का समन्वय न होने से ] हो नहीं सकता । २४