खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम तर्हि सम्बन्धिपद एवैषा विवक्षाऽस्तु, कृतमधिकमुपादाय तद्विवक्षया। निषेध- व्यवच्छेदेन सार्वत्रिकत्वलाभ इति चेन्न। निषेधस्यव्यवच्छेदस्य विध्यनतिरेकार्थ- त्वेनाविशेषात्। तद्धर्मिकं सम्बन्धस्य असम्बन्धासामानाधिकरण्यम् 'अयोगव्यवच्छेदेने' त्यने- नोच्यत इति चेन्न। तस्यापि सत्त्वकाले तत्रासत्त्वोपगमात्। सर्वदेति चेन्न। यद्येवं तत् किं करणासत्त्वकालेऽपि योग एव करणेन क्रियायाः? यावत्सत्त्वमिति चेत्; तर्हि सम्बन्धीति व्यर्थम्, यावत् सत्त्वमयोगव्यवच्छेदेन अयोगव्यवच्छेद पद सार्थक है। खंडन—सम्बन्धी पद से ही अन्य काल में अयोग का व्यवच्छेद विवक्षित क्यों न मानें? उसके लिए अयोगव्यवच्छेद शब्द का निवेश क्यों किया जाय? समर्थन—अयोगव्यवच्छेदरूप विशेषण से अयोग का निषेध होने पर सार्वकालि- कत्व का लाभ हो जाता है। खंडन—अभावाभाव प्रतियोगी रूप होने से जब अयोगव्यवच्छेद योगरूप ही है, तो 'अयोगव्यवच्छेद' शब्द से सार्वकालिक सम्बन्ध का लाभ ही कैसे होगा? समर्थन—'जिस कुठारादि में छिदादि प्रधानक्रिया का सम्बन्ध प्रधानक्रिया के सम्बन्धाभाव से समानाधिकरण न हो, वह करण है'—यह अर्थ अयोगव्यवच्छेद शब्द से विवक्षित है। एवञ्च कर्ता में छिदा का सम्बन्ध 'स्व' के असम्बन्ध से समानाधिकरण है, अतः उसमें अतिव्याप्ति नहीं होगी। खंडन—कर्ता में भी छिदा के सम्बन्धकाल में छिदा का असम्बन्ध नहीं है, अतः उसमें उक्त लक्षण की अतिव्याप्ति तदवस्थ ही है। समर्थन—जिस धर्मी में छिदा के सम्बन्ध के अभाव का सदा असत्त्व हो, वह करण है। कर्ता में छिदा के सम्बन्ध-काल में उसके सम्बन्धाभाव का असत्त्व होने पर भी सदा असत्त्व नहीं है, अतः अतिव्याप्ति नहीं है। खंडन—यदि ऐसा है, तो क्या करण के असत्त्वकालमें भी क्रिया के साथ करण का सम्बन्ध विवक्षित है? अर्थात् करण में भी सर्वदा सम्बन्ध नहीं है, अतः लक्षण असम्भवी हो जायगा। समर्थन—यावत् कुठारादि करण का सत्त्व हो, तावत् कुठारादि में छिदा का सत्त्व विवक्षित है। खंडन—ऐसा होने पर सम्बन्धी पद व्यर्थ हो जायगा। अर्थात् "यावत् 'स्व' का सत्त्व हो, तावत् जो धर्मी क्रिया के अयोगव्यवच्छेद से विशिष्ट या