भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 610 में से

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पृष्ठ 196

परिच्छेद ] द्वितीय करणत्व-लक्षण का खण्डन १७६ यद्विशिष्टमुपलक्षितं वा तत्करणमित्येवास्तु, सम्बन्धीत्येव वा तथा विवक्ष्यता- मित्युकतमेव । अयमेवार्थः कयाऽपि कुसृष्ट्या सम्बन्धिपदसार्थकतामुपपाद्य यदि विव- क्षितस्तदाप्युच्यते — कृत्तिकोदयक्रियायां रोहिण्यासत्तिरेवेवं करणं स्यात्, अनन्तर- भाविनश्चतुर्दशस्य नक्षत्रस्योदयं प्रति पूर्वभाविचतुर्दशसङ्ख्यनक्षत्रास्तमयस्य च करणत्वं स्यात् । न चैवमेव युक्तम् ; यौगपद्येन कारणत्वानुपपत्त्या कारकत्वस्य दुर्निरस्तत्वेन करणत्वस्य सम्भावनाऽनारोहात् । न च तत्र सम्बन्ध एव नास्ति; व्याप्तेः स्वभावसम्बन्धात्मिकाया दुरपह्नवत्वात् । अथ कार्यकारणभावः सम्बन्धो विवक्षितः । न ; सामग्र्याः करणत्वापत्तेः । उपलक्षित हो, वह करण है,” अथवा “यावत्सत्त्व जो प्रधान छिदादि क्रिया का सम्बन्धी हो, वह करण है” ऐसा ही लक्षण रहे, 'अयोगव्यवच्छेदेन' यह विशेषण व्यर्थ है । यदि कहो कि सम्बन्धी पद से सम्बन्ध-सामान्य विवक्षित है और अयोगव्यवच्छेद पद से यावत्-कारक-सत्त्व विवक्षित है, अतः न पुनरुक्ति है और न विशेषण ही व्यर्थ है, तो यह कल्पना उदक्षर होने से ( अक्षरार्थ न होनेसे ) कुत्सित है । किञ्च — ऐसा निवेश करने पर भी कृत्तिकानक्षत्र की उदयरूप क्रिया में रोहिणी का सामीप्य भी करण हो जायगा । किञ्च — उत्तरभावी चतुर्दश नक्षत्र के उदय के प्रति पूर्वभावी चतुर्दश नक्षत्र का अस्तगमन भी करण हो जायगा । समर्थन — कृत्तिकानक्षत्र के उदय में रोहिणी का सामीप्य करण क्यों नहीं माना जाय ? खण्डन — एक काल में होने से उसमें पूर्वकालवृत्तित्वरूप कारणत्व ही नहीं है, अतः करणत्व की सम्भावना भी नहीं है । समर्थन — कृत्तिकोदय का रोहिणी के सामीप्य में सम्बन्ध नहीं है । अतः क्रिया के साथ अयोगव्यवच्छेद से युक्त सम्बन्धरूप करणत्व लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं है । खंडन — कृत्तिकोदय की रोहिण्यासत्ति ( रोहिणी के सामीप्य ) में स्वभाव ( स्वरूप ) सम्बन्धरूप व्याप्ति ही सम्बन्ध है । उसका अपह्नव नहीं हो सकता । समर्थन — क्रिया के साथ अयोगव्यवच्छेद से युक्त कार्यकारणभावरूप सम्बन्ध जिसमें हो, वह करण है। कृत्तिकोदय का रोहिणी के सामीप्य में कार्यकारणभाव नहीं है, अतः अतिव्याप्ति नहीं है। खण्डन — छिदादि प्रधान क्रिया के साथ अयोगव्यवच्छेद से युक्त सम्बन्धी सामग्री भी है; अतः सामग्री में

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