भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] द्वितीय करणत्व-लक्षण का खण्डन १८४ अपि चैवं विवक्षितमपि करणं न स्यात् । न हि यावत्सत्त्वं व्यापारवतोऽपि तस्य क्रियाजनकत्वम् ; क्रियाकाले क्षणमपि तदनुवृत्तिनिषेधे प्रमाणस्य दुरुपन्या- सतया संशयेनापि लक्षणासिद्धेः । प्रत्युत चिरस्थिरकरसंयोगे स्पृश्ये स्पर्शप्रमा- करणस्पर्शनैन्द्रियसंयोगस्थैर्यस्य मन्तुमुचितत्वात् । यावत्सत्त्वं च कारणमिति भाषायां सर्वस्मिन् तत्सत्त्वकाले करणत्वमित्यर्थः । न च कारणत्वस्य नियतपूर्वकालसम्बन्धात्मकस्य क्वचित्काले सत्त्वम्, कालं प्रति कालान्तराभावादिति । अथ क्रियया अयोगव्यवच्छेदेन सम्बन्धीत्यस्यायमर्थो यस्मिन् सति भवत्येव क्रियेति । कोऽस्यार्थः—किं यस्मादनन्तरं क्रियोत्पद्यत एव, उत यस्मिन् वर्तमाने अपिच—'यावत्सत्त्व ( अवस्थिति ) क्रिया का अयोगव्यवच्छेद से जो सम्बन्धी हो, वह करण है' ऐसा लक्षण होने पर विवक्षित कुठारादि भी [ उद्यमन-निपतन- विशिष्ट कुठार का या कुठार की उद्यमन-निपतन क्रिया का यावत्काल में प्रधानक्रिया छिदादि के साथ जनकत्वरूप सम्बन्ध न होने से ] करण नहीं कहलायेंगे । कारण, कुठारादि के क्रियाकाल में क्षणभर भी प्रधानक्रिया छिदा के असम्बन्ध का निषेध है, इसमें कोई प्रमाण नहीं । अतः असम्भव के सन्देह से भी यह लक्षण असङ्गत है । प्रत्युत देखा यह जाता है कि स्पृश्य द्रव्य में चिर-स्थिर कर-संयोग होने पर त्वगिन्द्रिय और स्पृश्य द्रव्य का संयोगरूप व्यापार तो है; किन्तु चित्त के अन्यत्र व्यासक्त होने पर त्वाच-प्रमा नहीं होती । अतः स्पर्श-प्रमा के साथ त्वगिन्द्रिय का अयोगव्यवच्छेदयुक्त सम्बन्ध न होने से त्वगिन्द्रिय में करण-लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—'यावत्-सत्त्व क्रिया के साथ अयोगव्यवच्छेद से जनकता रूप से जो सम्बन्धी हो, वह करण है' इस वाक्य का यह अर्थ हुआ कि 'सर्वकरणसम्बन्धी काल में विद्यमान कारण करण है।' किन्तु वह अयुक्त है, कारण, काल में काल नहीं रहता । अतः काल से घटित प्राक्कालसत्त्वरूप करणत्व से विशिष्ट कारण काल में भी नहीं रहेगा । समर्थन—'अयोगव्यवच्छेद से युक्त जो क्रिया का सम्बन्धी हो' इस वाक्य का 'जिसके होने पर अवश्य क्रिया होती हो' यह फलित अर्थ है । खण्डन—'जिसके होने पर अवश्य क्रिया होती हो' इस वाक्य का 'जिसके अनन्तर क्षण में क्रिया अवश्य उत्पन्न होती हो' यह अर्थ है, 'जिसके रहते क्रिया अवश्य उत्पन्न हो' यह