भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] व्यापार-लक्षण का खण्डन १८३ अथ क्रियया अयोगव्यवच्छेदेन सम्बन्धित्वं करणत्वमित्यस्यायमर्थः— व्यापारवतः फलाव्यभिचारित्वमिति । मैवम् ; हस्ताद्यव्यापनात् । व्यापार-लक्षण-खण्डनम् कश्चायं तद्व्यापारो नाम—किं तज्जन्यं कारणम् , उत तदाश्रयं कारकम् ? नाद्यः ; लिङ्गपरामर्शे तदसम्भवात् । पक्षे प्रथमधूमादिदर्शनस्य व्याप्तिस्मृतिद्वारा द्वितीयलिङ्गपरामर्शव्यापारं जनयतः करणत्वमेष्टव्यम् । एवञ्च परमार्थतो व्याप्यस्य स्वरूपेण प्रमितिर्द्वितीय- व्याप्ततत्परामर्शव्यापारिका अनुमानमिष्यत इति चेन्न । अन्यतो जाताग्निधूमादि- व्याप्तिस्मृतौ सत्यां पक्षगतप्रथमधूमादिदर्शनस्य तद्व्यापारकत्वासिद्धेः । समर्थन—'क्रिया के साथ अयोगव्यवच्छेदयुक्त सम्बन्धी करण है' इसका फलित अर्थ यह है कि 'जिस व्यापार के होने पर फल का अव्यभिचार हो, वह करण है।' खंडन—हस्त का व्यापार होने पर भी कदाचित् फल का व्यभिचार होने से हस्त में अव्याप्ति हो जायगी । व्यापार-लक्षण का खण्डन किञ्च—करण का व्यापार क्या वस्तु है—क्या करण से जन्य कारण व्यापार है अथवा करण का आश्रित कारण व्यापार है ? इनमें प्रथम कल्प युक्त नहीं है; कारण, लिङ्गपरामर्श करणजन्य न होने से व्यापार न कहलायेगा । समर्थन—पक्ष ( पर्वतादि ) में प्रथम जो धूम का चाक्षुष प्रत्यक्ष होता है, वह व्याप्तिस्मृति द्वारा द्वितीय लिङ्गपरामर्श का जनन करता है; अतएव वह करण है। ऐसा होने पर वस्तुतः व्याप्य धूम की स्वरूपतः प्रमा वह्निव्याप्य धूमात्मक परा- मर्शरूप व्यापारयुक्त होने से उसका अनुमान इष्ट है । खण्डन—दैववश जहाँ पूर्वगृहीत व्याप्ति की स्मृति हुई हो, वहाँ द्वितीय लिङ्गपरामर्श उस स्मृति से जन्य ही होता है । प्रथम पक्ष में धूम का जो प्रत्यक्ष हुआ है, उससे जन्य नहीं है । अतः प्रथम लिङ्ग के ज्ञान का द्वितीय लिङ्गपरामर्श व्यापार नहीं कहा जायगा ।