भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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१८४ : सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [प्रथम तत्राप्युभयकर्मजसंयोगवत्तदपि कारणमिति चेन्न । अभावादिसापेक्ष-विशिष्ट- प्रतिपत्तिवत् प्रागुपजातवह्निव्याप्तधूमस्मृतेः प्रथममपि 'योऽसौ वह्निव्याप्तः सोऽयं धूमः' इति परामर्शोपपत्तेः । नित्यसापेक्षेऽर्थेऽस्तु तथा, नान्यत्र प्रथमं तथेति चेन्न । प्राक् तत्कारणोपपत्तौ नान्यत्रैवमिति नियमे प्रमाणास्याभावात् । तस्य व्यापाराभावान् नानुमित्युत्पाद- कत्वमेवेति चेत्; स्यादप्येवं यदि व्यापारवतः करणत्वमित्येव सिद्धं स्यात् । तत्र धूमादिनिर्विकल्पकस्य तद्व्यापारस्य करणत्वमिति चेन्न । नित्यसङ्घटितार्थव- द्विनापि निर्विकल्पकं सविकल्पकोत्पत्तेरविरोथेन त्वदुक्तप्रक्रियानियमे प्रमाणाभावात् । समर्थन—उभयकर्मज संयोग के तुल्य वह परामर्श भी दैववश जात व्याप्ति की स्मृति और प्रथम धूमदर्शन दोनों से जन्य हो सकता है । खंडन—जैसे प्रतियोगी की स्मृति से प्रतियोगिविशिष्ट अभाव की प्रमा होती है, वैसे ही दैववश जात व्याप्ति की स्मृति से प्रथम भी धूमदर्शन के बिना ही ‘जो धूम वह्निव्याप्त है, तद्द्घूमवान् यह पर्वत है’ ऐसा परामर्श हो सकता है । समर्थन—अभावप्रमा के तुल्य धूमत्वविशिष्ट में व्याप्ति के वैशिष्ट्य का भान प्रथम धूमज्ञान के बिना नहीं हो सकेगा; कारण अभाव प्रतियोगी में नित्य साकाङ्क्ष है । अतः प्रतियोगिनिरपेक्ष केवल अभाव की प्रमा नहीं हो सकती । किन्तु प्रथम ही विशिष्टवैशिष्ट्यावगाही अभाव की प्रमा होती है । प्रकृत में नित्य साकाङ्क्ष न होने से वैशिष्ट्यावगाही ज्ञान प्रथम धूमदर्शन के बिना नहीं हो सकेगा । खंडन—जब व्याप्तिस्मृति, धूम तथा चक्षुःसंयोग आदि कारण विद्यमान हैं, तब ‘नित्य सापेक्ष न होने से प्रथमतः धूमदर्शन के बिना विशिष्टवैशिष्ट्यावगाही ज्ञान नहीं हो सकता’ यह कथन निर्युक्तिक है । समर्थन—लिङ्गपरामर्श में कोई व्यापार नहीं है, अतः वह करण नहीं है । खंडन—यह कथन तभी युक्त होता, जब ‘सव्यापार ही करण होता है’ यह नियम

  • होता । परन्तु ऐसा नियम नहीं है; कारण, व्यापाररहित व्यापार भी करण होता है । समर्थन—प्रथम धूम का निर्विकल्पक ज्ञान होता है, अनन्तर विशिष्टवैशिष्ट्याव- गाही धूम का परामर्श होता है। अतः धूम का निर्विकल्पक ज्ञान ही परामर्श द्वारा अनुमिति का करण है । खंडन—प्रतियोगी में नित्य सापेक्ष अभाव की प्रमा के तुल्य निर्विकल्पक के बिना भी पूर्वोक्त रीति से व्याप्तिविशिष्ट धूम का परामर्श हो सकता है। अतः ‘निर्विकल्पक ज्ञान के बिना सविकल्पक ज्ञान नहीं हो सकता’—आपकी इस कल्पित प्रक्रिया में कुछ भी प्रमाण नहीं है ।