भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 177

१६० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [प्रथम अव्यभिचारित्व-खण्डनम् नापि अव्यभिचार्यनुभवः प्रमेति युक्तम् । अव्यभिचारिपदस्य यदि तत्त्व- विषयाद्यर्थत्वम्, तदा दूषणान्युक्तान्येवानुवर्तन्ते । अथैवमुच्यते अव्यभिचारित्वमर्थाविनाभूतत्वम् ; तदा प्रष्टव्यं कोऽस्यार्थः— किं यदैवार्थस्तदैव ज्ञानम्, उत यत्रार्थस्तत्रैव देशे ज्ञानम्, अथ यादृगर्थस्तादृगेव ज्ञानं यत्तत्प्रमितिरिति ? नाद्यः, अतीतानागतानुमित्याद्यव्यापनात् । न द्वितीयः ; ज्ञानसमानदेशार्थ- प्रमितीनामव्यापनात् । ज्ञानसमानदेशमर्थमन्यत्र आरोपयतोऽप्यनुभवस्य प्रमा- त्वापत्तेः । नापि तृतीयः; ज्ञानार्थभेदवादे सर्वाकारेण तत्साम्यानुपपत्तेः । अभेदवादे तु भ्रमस्याऽपि तदभ्युपगन्तव्यत्वप्रसङ्गेन विशेषणवैयर्थ्यापातात् । अव्यभिचारित्व का खण्डन खंडन — 'अव्यभिचारी अनुभव प्रमा है' यह लक्षण भी युक्त नहीं, कारण यदि अव्यभिचारी पद का तत्त्वविषयकत्व आदि अर्थ करें, तो उक्त दूषणों की ही आवृत्ति होगी । समर्थन — हम अव्यभिचारी' पद का 'ज्ञान में विषय का अविनाभाव' यह अर्थ करेंगे । खंडन — 'अविनाभाव' शब्द का क्या अर्थ है, क्या समुद्रवृद्धि-चन्द्रोदय के तुल्य जिस काल में अर्थ हो, उसी काल में ज्ञान, हो — यह अर्थ है अथवा धूम-वह्निके तुल्य जिस देश में अर्थ हो, उसी देश में ज्ञान हो — यह अर्थ है, किंवा जैसा अर्थ हो, वैसा ही ज्ञान हो — यह अर्थ है ? यदि प्रथम अर्थ मानें, तो अतीत-अनागत विषयों की अनुमितियों में अव्याप्ति हो जायगी । द्वितीय अर्थ मानें, तो समवाय सम्बन्ध से ज्ञान का देश आत्मा है और वह घट- पटादि अर्थों का देश नहीं है; अतः घटपटादि प्रमा में लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । साथ ही ज्ञान के देश में स्थित आत्मत्व का जो अन्यत्र ( शरीर में ) भ्रम होता है, उस भ्रम में अतिव्याप्ति हो जायगी । यदि तृतीय अर्थ मानें, तो ज्ञान का अर्थ के साथ भेद माननेवाले के मत में ज्ञान तथा अर्थ का सर्वथा सादृश्य न होने से अस- म्भव हो जायगा । ज्ञान तथा अर्थ के अभेदवाद में भ्रमज्ञान में अतिव्याप्ति हो जायगी । व्यवच्छेद न होने से विशेषण भी व्यर्थ हो जायगा ।