खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] अविसंवादित्व का खण्डन १६१ तैस्तैश्च विशेषैः सादृश्यस्य विवक्षितत्वे यथार्थताप्रस्तावोक्तान्येव दूषणानि आवर्तन्त इति । अविसंवादित्व-खण्डनम् अविसंवाद्यनुभवः प्रमेत्यपि न युक्तम् । अविसंवादित्वं हि ज्ञानान्तरेण तथैवोल्लिख्यमानार्थत्वं वा, ज्ञानान्तरेण विपरीततया अप्रतीयमानार्थत्वं वा, प्रती- यमानव्याप्यविषयत्वं वा, अन्यदेव वा किञ्चित् ? न प्रथमः ; धारावाहिनो भ्रमस्य प्रमात्वप्रसङ्गात् । न च प्रमाभूतं ज्ञानान्तरं विवक्षितमिति वाच्यम् ; प्रमाया एव लक्ष्यमाणत्वात् । नापि द्वितीयः ; अज्ञातबाधभ्रमव्यापनात्, स्वस्थदशोत्पन्नस्य शुक्लशङ्खज्ञानादेः 'जो धर्म अर्थ में हो, वही ज्ञान में भासता है' इस तरह का अर्थसाम्य अनुभव में मानें, तो याथार्थ्य-प्रकरण में उक्त दोष हो जायँगे । अर्थात् विशेषमात्र का अभिधान करेंगे, तो भ्रमादि में अतिव्याप्ति होगी । तत्तत् विशेष व्यक्ति कहेंगे, तो अननुगम होगा, ये सभी दोष आ जायँगे । अविसंवादित्व का खण्डन 'अविसंवादी अनुभव प्रमा है' यह लक्षण भी युक्त नहीं है, कारण 'अविसंवादी' शब्द का कुछ अर्थ ही नहीं हो सकता । देखिए—क्या जिस ज्ञान का विषय उत्तर- ज्ञान से उल्लिख्यमान हो, वह अनुभव अविसंवादी है; जिस अनुभव के विषय का अभाव उत्तर-ज्ञान का विषय न हो, वह अनुभव अविसंवादी है; जिस अनुभव के विषय का व्याप्य प्रतीयमान हो, वह अनुभव अविसंवादी है अथवा और ही कुछ अविसंवादित्व है ? इनमें प्रथम कल्प युक्त नहीं है; कारण धारावाही भ्रम में पूर्व-पूर्व भ्रम का विषय उत्तर-उत्तर ज्ञान का विषय होता ही है, अतः उसमें अतिव्याप्ति हो जायगी । यदि कहें कि प्रमात्मक ज्ञानान्तर से जिस अनुभव का विषय उल्लिख्यमान हो, वह अविसंवादी है, तो वह भी उचित नहीं; कारण प्रमा का अभीतक निर्वचन ही नहीं हो पाया है । अतः प्रमा से प्रमा की निरुक्ति होने के कारण आत्माश्रय तथा प्रमा से अविसंवादित्व की निरुक्ति तथा अविसंवादित्व से प्रमा की निरुक्ति होने के कारण अन्योन्याश्रय हो जायगा । द्वितीय कल्प भी उचित नहीं, कारण जिस भ्रम का बाध नहीं हुआ है, उस भ्रम में अतिव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—स्वस्थ-दशा में उत्पन्न 'शुक्लः शंखः' इस २१