खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 176, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] सम्यक्त्व का खण्डन १५६ शङ्कान्तराणि चात्र अतः पराणि याथार्थ्यविशेषणदूषणदूषितान्येव उपनिप- तन्तीति द्विरभिधानभयान्नोक्तानि। किञ्च—तर्कज्ञानमाहार्यौ च संशयविपर्ययौ परिदृश्यमान एव विशेषे भव- न्तीति तैरतिप्रसङ्गः स्यात्। न चाऽऽहार्यौ तौ नाभ्युपगन्तव्याविति युक्तम्। विप्रलम्भकस्य वाक्यप्रयोगमूलतया आहार्यभ्रमस्य ज्ञाततत्त्वस्य च गुरोः शिष्य- प्रबोधार्थं विचारं प्रवर्तयतश्च आहार्यसंशयानां भवत एव शास्त्रेऽनुमतत्वात्। परिच्छेदशब्दश्च अनुभूतिपर्यायोऽनुभूतिदूषणं नातिक्रामतीत्यलम्। होगा कि जिस धर्मी में जो बाध्य हो, उसमें उस धर्म के अभाव का अवगाही ज्ञान बाधक है। फिर तो लक्षण के यत्-तत् घटित होने से पुनः यदि यत् शब्द से रजतत्व का ग्रहण करें, तो सर्पभ्रम में बाधलक्षण की अव्याप्ति हो जायगी। किञ्च—'सविशेष ज्ञान' को प्रमा कहते हैं, 'बाध-व्यवस्था के हेतु' को विशेष कहते हैं तथा 'तद्विपरीत प्रमा' को बाध कहते हैं—इस रीति से बाध के लक्षण में प्रमा की और प्रमा के लक्षण में विशेष द्वारा बाध की अपेक्षा होने से चक्रक दोष हो जायगा। 'जिस विशेष धर्म से सहित धर्मी हो, उस विशेष से सहित धर्मी का अनुभव प्रमा है,' 'साक्षात् विशेष से सहित धर्मी का अनुभव प्रमा है' या 'भासमान यावद् विशेषों से सहित धर्मी का अनुभव प्रमा है' इन सारी शङ्काओं का खण्डन तो 'यथार्था- नुभवः प्रमा' इस लक्षण के याथार्थ्य-विशेषण के दूषण-प्रस्ताव में हो ही चुका है। अतः पुनरुक्ति के भय से यहाँ फिर इसे नहीं कहते। किञ्च—'यदि वह्निर्न स्यात्तदा धूमोऽपि न स्यात्' यह तर्क 'पर्वतो वह्निमान्' ऐसा विशेष ज्ञान होने पर ही होता है। आहार्य-भ्रम और संशय भी विशेष ज्ञान होने पर ही होते हैं। अतः उनमें लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी। इसपर यह नहीं कह सकते कि 'आहार्य-भ्रम और सन्देह होता ही नहीं, कारण वञ्चक पुरुष को आहार्य-भ्रम होता ही है। अन्यथा वह असत्यार्थक वाक्य कैसे कहता, यह आप भी मानते हैं। साथ ही शिष्य के प्रबोधनार्थ शास्त्रार्थारम्भ करनेवाले तत्त्वज्ञ गुरु का आहार्य-सन्देह भी आपके शास्त्र में स्वीकृत ही है। 'परिच्छेद' शब्द का अर्थ अनुभूति है, अतः वह अनुभूति के दूषणों का अतिक्रमण नहीं कर सकता। अर्थात् अनुभूतित्व जाति या स्मृत्यन्यज्ञानत्व आदि उपाधिरूप नहीं हो सकता, इसका खण्डन हो ही चुका है।