भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 175

१५८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम 'आप्तानाप्तवाक्याभ्यां नदीतीरे पञ्च फलानि सन्तीत्येवंरूपाभ्यां प्रतिपाद्यमानेऽर्थे स्थितं किं विशेषमेकत्र पश्यसि, यमपरत्र न पश्यसी'ति पृष्ट्वा प्रतिबोधनीयः । तथाप्यनुपजातप्रबोधस्तु जडतमः कश्चिद्यदि स्यात्, स एवं प्रबोध्यः—'ये ते विशेषान्तरप्रवाहस्वीकारेऽनन्तविशेषापत्तिभयात् त्वया स्वत एव विशेषरूपा इति स्वीकृताः, तेषां स्वरूपं तावत् परस्परव्यावृत्तम्, अतोऽनुगतैकरूपाभावात् अव्यापकत्वं स्यादि'ति । बाधव्यवस्थाहेतुत्वादेव अनुगतिरिति चेन्न । क्वाचित्कबाधव्यवस्थाहेतोर्भ्रमेऽपि प्रकाशात् । तत्र तस्येति चेन्न; व्यावृत्तेः । बाधस्य च तद्विपरीतार्थप्रमात्वेन तदर्थाननुगमात्, प्रमायाश्च अद्याप्यव्य- वस्थापनादिति । और अनाप्त दोनों पुरुष 'नदी-तीर पर पञ्च फल हैं' यह कहें, तो उन दोनों से प्रतिपादित अर्थों में एक स्थल में ( आप्तप्रतिपादनस्थल में ) क्या विशेष देखते हो ! फिर भी कोई इतना जडतम हो, जो यह भी समझ न पाये, उसे इस तरह समझाया जाय कि आप तो विशेष में विशेष और उसमें भी अन्य विशेष स्वीकार नहीं करते; क्योंकि अनन्त विशेषों के स्वीकार में गौरव या अनवस्थादोष हो जायगा । प्रत्युत परस्परव्यावृत्त, विशेषान्तरशून्य अनन्त विशेष ही मानते हैं । अतः कोई उपसंग्राहक रूप न होने से लक्षण में जिस विशेष का निवेश करेंगे, तद्विषयक प्रमा में ही समन्वय हो सकेगा, अन्यविशेषविषयक प्रमा में तो अव्याप्ति ही हो जायगी । समर्थन—'बाध-व्यवस्था-हेतुत्व'रूप से ही सभी विशेषों का संग्रहकर लक्षण बनायेंगे । अर्थात् बाध की व्यवस्था का हेतु जो विशेष तद्विशिष्ट पदार्थके अनुभव को प्रमा कहेंगे । इससे न तो लक्षण का अननुगम होगा और न अव्याप्ति ही । खंडन— सार्वत्रिक बाध की व्यवस्था का हेतुत्व तो कहीं भी संभव नहीं है । यदि क्वचित् बाधव्यवस्था के हेतुत्व को ही विशेष कहें, तो रजतत्व भी वास्तविक रजत में होनेवाले 'इदं रजतम्' इस ज्ञान में बाध-व्यवस्था का हेतु है ही। फलतः शुक्ति में भी 'इदं रजतम्' यह ज्ञान प्रमा हो जायगा । यदि कहें कि जिस स्थल में जो बाध-व्यवस्थापक हो, उसी स्थल में वह विशेष है, तो लक्षण के यत्-तत् से घटित हो जाने से जिस विशेष का यत् शब्द से ग्रहण करेंगे, उससे अन्यत्र लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—विपरीत प्रमामात्र तो बाधक है नहीं, कारण तब तो 'पर्वतो वह्निमान्' इस ज्ञान का 'ह्रदो वह्न्यभाववान्' यह ज्ञान भी बाधक हो जायगा । अतः यही मानना