खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [प्रथम एकदा च सर्वत्र प्रमाणासम्भवेन क्रमाश्रयणे तत्तदर्थक्रियातत्तत्सामग्रीपर- म्परावगमनियमाभ्युपगमे एकस्मिन्नेव विषये पुरुषायुषः पर्यवसानप्रसङ्गात् । विच्छेदाभ्युपगमे त्वन्तिमावगमस्याप्रामाण्यात् आप्रथममप्रमात्वापत्तेः । वास्तव- तदर्थक्रियात्वस्य च दुर्निरूपत्वेन व्यवहारानर्हत्वात् । तथाप्रतीतिमात्रस्य भ्रमासाधारण्यात् । नन्वेवं चतुर्थः पक्षोऽस्तु । तथा हि—अर्थक्रियाकारिविषयत्वं वाऽविसंवादि- त्वमिति । यथाऽऽह—'प्रमाणमविसंवादिज्ञानमर्थक्रियास्थितिश्वाऽविसंवादः' इति । न ; सामान्यतो विवक्षायां भ्रान्तावपि प्रसङ्गात् । प्रतीयमानरूपेणार्थक्रियाकारित्वमर्थस्य विवक्षितमिति चेन्न । दुरवधारणत्वात् । किञ्च—युगपद् अनेक ज्ञान नहीं होते, अतः व्यापक के प्रतीतिकाल में व्याप्य की प्रतीति नहीं होगी, वह क्रम से ही होगी । अर्थात् व्यापक की प्रतीति के उत्तर- काल में ही व्याप्य की प्रतीति होगी । ऐसा मानने पर पूर्वज्ञानगत प्रमात्व उत्तरक्षण में उत्पन्न अर्थक्रिया की प्रतीति या सामग्री की प्रतीति से गृहीत होगा, वह अर्थक्रिया- प्रतीतिगत प्रमात्व भी उससे उत्तरक्षण में उत्पन्न अर्थक्रिया की प्रतीति से गृहीत होगा, इस तरह पूर्व पूर्वप्रतीति के प्रमात्व में अपर-अपर प्रतीति की अपेक्षा होने से अन- वस्था हो जायगी । यदि अर्थक्रिया की प्रतीति की धारा का कहीं विच्छेद मानें, तो अन्तिम अर्थक्रिया की प्रतीति के अप्रमा होने से मूलपर्यन्त अप्रमात्व हो जायगा । किञ्च--यदि अर्थक्रिया वास्तविक लें, तो प्रमितित्व से इतर वास्तविकत्व हो नहीं सकता और प्रमिति का अभीतक निर्वचन ही नहीं हुआ है । यदि केवल अर्थक्रिया की प्रतीति का ही ग्रहण करें, तो भ्रमस्थल में भी अर्थक्रिया की प्रतीति होने से अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'अर्थक्रियाकारित्व अविसंवाद है' यह चतुर्थ पक्ष ही मानेंगे । धर्मकीर्ति ( बौद्ध आचार्य ) ने भी कहा है कि 'अविसंवादी ज्ञान प्रमा है और अर्थक्रियाकारित्व ही अविसंवाद है।' खंडन—यदि अर्थक्रियाकारित्व सामान्यरूप से अभिप्रेत हो, तो शुक्तिरूप से अर्थक्रियाकारित्व भ्रम में भी है, अतः भ्रम में अतिव्याप्ति हो जायगी । यदि कहें कि प्रतीयमान धर्म से अर्थक्रियाकारित्व अभिप्रेत है । एवञ्च भ्रम में प्रतीयमान रजतत्वरूप से अर्थक्रियाकारित्व न होनेसे अतिव्याप्ति नहीं है, तो वह भी ठीक नहीं; क्योंकि रजतमें दृष्ट भी अङ्गुलीयरूप अर्थक्रियाका कर्तृत्व रजतत्वरूपसे