खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 172, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] सम्यक्त्व का खण्डन १५५ विषयस्य अप्रमात्वापातात्। नापि द्वितीयः; असर्ववित्परिच्छित्तीनां सर्वासाम- प्रमात्वापत्तेः। अथ मन्यसे— सम्यक्शब्दः सविशेषार्थः। यदपि लोकेऽभिधीयते 'न मया सम्यक् दृष्टम्', तस्यापि न मया विशेषतो दृष्टमित्यर्थः। तस्माद्विशेषसहितधर्मि- परिच्छित्तिः प्रमेत्युक्तं भवति। विभ्रमादयो हि विशेषमपश्यतो जायन्त इति तद्व्यावृत्त्यर्थं विशेषणमिदम्। विशेषाणां च सर्वेषां विशेषान्तरानभ्युपगमेऽपि स्वरूपमेव केषाञ्चिद्विशेष इति। नैतद्युक्तम्; विशेषपदेन विशेषमात्राभिधाने रजतत्वादिना विशेषेण सहैव शुक्तिव्यक्त्यादेर्भ्रमेणावगाहनात् तस्यापि प्रमात्वं स्यात्। प्रत्यर्थं व्यावृत्ताकाराणां च विशेषाणामुपादाने अननुगमप्रसङ्गात्, सामान्यतश्चातिप्रसङ्गात् उभयथाऽप्य- सङ्गततापत्तेः। सर्वधर्मसहितत्व कहें, तो जो परिच्छेद सर्वधर्मों के विषय नहीं होते, उनमें अव्याप्ति हो जायगी। समर्थन—यहाँ 'सम्यक्' शब्द का अर्थ 'विशेष' है। लोक में जो कहा जाता है कि 'मैंने सम्यक् नहीं देखा', उसका भी यही अर्थ होता है कि मैंने 'उसे विशेषरूप से नहीं देखा।' तस्मात् 'विशेष से सहित धर्मी का परिच्छेद प्रमा है' यह लक्षण हुआ। विभ्रम या सन्देह विशेष धर्म की अज्ञानदशा में होते हैं, अतः उनमें अव्याप्ति के वारणार्थ सम्यक्त्व-निवेश है। यद्यपि विशेष धर्मों में अनवस्था-भय से अन्य विशेष धर्म नहीं रहते, तथापि उनका स्वरूप ही विशेष धर्म है; अतः विशेष धर्म की प्रमा में अव्याप्ति नहीं है। खंडन—यदि लक्षण में विशेष का सामान्यरूप से प्रवेश करें, तो 'इदं रजतम्' इस भ्रम में अतिव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि यह भ्रम भी रजतत्वरूप विशेष का ही शुक्ति में अवगाहन करता है। यदि विशेषरूप से विशेष का निवेश करें, अर्थात् 'जहाँ जो विशेष हो, वहाँ उस विशेष का अवगाहन करनेवाला ज्ञान प्रमा है' ऐसा कहें, तो यत्-तत् का अर्थविशेष प्रतिव्यक्ति व्यावृत्त होने से जिस विशेष का यत् शब्द से उपादान करेंगे, उसका अवगाहन करनेवाली प्रमा से अन्य ज्ञान में अव्याप्ति हो जायगी। यदि विशेष-भेद से लक्षण का भेद मानें, तो अनेक लक्षण होने से लक्षणों का अननुगम हो जायगा।