भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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१५४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम सम्यक्त्व-खण्डनम् सम्यक्परिच्छेदः प्रमेत्यपि न युक्तम् । न खलु सम्यक्त्वं तत्त्वविषयता, याथार्थ्यं वा सम्भवति ; उक्तदोषात् । ननु सामस्त्यं सम्यक्त्वमिष्टम् । अभिधीयते हि लोके—'न मया सम्यक् दृष्टम्, सामान्याकारेण तु उपलब्धमि'ति । तदिह समीचोऽर्थस्य परिच्छेदः सम्यक्- परिच्छेदः, सम्यगर्थविषयत्वाद्वा सम्यक्शब्दः परिच्छेदसमानाधिकरण एवायमिति । मैवम् । सामस्त्यमर्थस्य किं सर्वावयवसहितत्वम्, अथवा सर्वधर्मसहितत्वम् ? नाद्यः ; अनवयवपदार्थपरिच्छेदस्येव सावयवपदार्थपरिच्छेदस्यापि मध्यभागाद्य- अर्थ का विशेषण हो, वह ज्ञान उस अंश में प्रमा है' यह परिष्कृत लक्षण भी यत्-तत् घटित हो जायगा । अतः यत् शब्द को यदि एक ज्ञानव्यक्तिपरक मानें, तो जिस घटज्ञान व्यक्ति का यत् शब्द से ग्रहण करेंगे, वह पट में न होने से पट से व्यावृत होकर विषयता संबन्ध से केवल घट में ही रहेगी; इसलिए पटज्ञान में अव्याप्ति हो जायगी । यदि यत् शब्द से ज्ञानसामान्य का ग्रहण करें, तो 'रजतत्वेन शुक्तिं जानामि' इस ज्ञान में रजतत्व विशेषण होने से 'इदं रजतम्' यह ज्ञान भी प्रमा हो जायगा । किञ्च—यत् शब्द का निवेश भी व्यर्थ हो जायगा, कारण 'इदं रजतम्' इस ज्ञान में अतिव्याप्ति के वारणार्थ ही उसका निवेश है । किन्तु वह अतिव्याप्ति यत् शब्द का निवेश करने पर भी तदवस्थ ही है । सम्यक्त्व का खण्डन खंडन—'सम्यक्-परिच्छेद प्रमा है' यह लक्षण भी युक्त नहीं, कारण 'तत्त्वविष- यत्व' या 'याथार्थ्य'रूप सम्यक्त्व हो नहीं सकता, क्योंकि वह उक्त दोषों से खण्डित हो जाता है । समर्थन—इस लक्षण में सामस्त्यरूप सम्यक्त्व ही अभिप्रेत है । लोक में भी यही कहा जाता है कि 'मैंने सम्यक् अर्थात् समस्त रूपों से नहीं देखा, सामान्य आकार से देखा ।' तस्मात् समीचीन अर्थ का परिच्छेद ( अनुभव ) अथवा सम्यक् अर्थ को विषय करने से जो सम्यक् अनुभव है, उसी को 'सम्यक्-परिच्छेद' कह सकते हैं । खंडन—अर्थ में सामस्त्य क्या सर्वावयवसहितत्व है या सर्वधर्मसहितत्व ? यदि सर्वावयवसहितत्व कहें, तो निरवयव आकाशादि पदार्थों के परिच्छेदों तथा मध्यभाग को विषय न करनेवाले सावयव पदार्थों के परिच्छेदों में भी अव्याप्ति हो जायगी । यदि

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