भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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खण्डनकार श्रीहर्ष

श्रीशङ्कर और श्रीसुरेश्वराचार्य के बाद वेदान्त-दर्शन के नये युग के प्रकरण-ग्रन्थ- लेखकों में एकमात्र खण्डन-खण्डखाद्यकार श्रीहर्ष का ही नाम लिया जा सकता है। [काल-निर्णय] मध्यकाल में टीका-टिप्पणी का ही युग चला। जिस प्रकार निर्भ्रान्त रूप से यह कहा जाता है कि श्रीउदयनाचार्य ने अपनी असाधारण प्रतिभा और ग्रन्थ-रचना-कौशल से द्वैतवादी न्यायमत को सर्वथा परिपुष्ट कर दिया, उसी प्रकार यह भी कहने में कोई अनौचित्य नहीं कि खण्डनकार ने द्वैतमत का जितना जबर्दस्त खण्डन किया, उतना और किसीने नहीं ! श्रीचित्सुख, मधुसूदन, ब्रह्मानन्द आदि परवर्ती सुख्यात द्वैतभंजक ग्रन्थकारों ने खण्डनकार द्वारा निर्दिष्ट पथ का ही अनुसरण किया है। इस तरह श्रीहर्ष दार्शनिक क्षेत्र में, विशेषकर अद्वैत वेदान्त-दर्शन के क्षेत्र में अपने युग के एक युगपुरुष ही कहे जा सकते हैं। साहित्य- क्षेत्र में भी 'नैषधीय-चरित' नामक महाकाव्य रचकर आपने तर्ककर्कश दार्शनिकता के साथ अपनी नवनीत-कोमल सहृदयता भी स्पष्ट कर दी। यह तो निश्चित ही है कि 'खण्डन'कार और 'नैषध'कार एक ही श्रीहर्ष हैं। ऐसे महान् विद्वान् के काल और चरित्र के विषय में जिज्ञासा का होना स्वाभा- विक ही है। वैसे संस्कृत-साहित्य में श्रीहर्ष नाम के अनेक विद्वान् और कवि हुए हैं। जैसे : १. स्थाण्वीश्वर और कान्यकुब्ज के प्रसिद्ध सम्राट् 'हर्षवर्द्धन', जिन्होंने 'नागानन्द', 'प्रियदर्शिका' और 'रत्नावली' नाटिका लिखी हैं। २. श्रीकल्हण की 'राजतरङ्गिणी' (७६११) में कथित एक सत्कवि । ३. भरत के 'नाट्यशास्त्र' के वार्तिककार, जो अभिनव गुप्त से भी पूर्व के हैं। किन्तु ये सभी १० वीं शताब्दी के पूर्व के हैं। ये 'लक्षणावली' (६८४-६५ ई०) लिखनेवाले श्रीउदयनाचार्य के खण्डनकर्ता श्रीहर्ष कभी नहीं हो सकते। खण्डनकार श्रीहर्ष ने 'खण्डन' और 'नैषध' में स्वयं अपना कुछ परिचय दिया है। जैन-कवि राजशेखर ने अपने 'प्रबन्ध-कोश' (१३४८ ई०) में ग्रन्थकार के उन्हीं परि- चयों को दुहराते हुए कान्यकुब्जेश्वर श्रीजयचन्द्र—जयन्तचन्द्र—को उनका आश्रयदाता बताया है। श्रीचाण्डू पण्डित ने भी 'नैषध-दीपिका' में इनका परिचय दिया है। दोनों परि- चय बहुत कुछ मिलते हैं। इन जयचन्द्र का राज्यकाल ११६६ से ११९३ ई० माना गया है। ये कान्यकुब्ज देश के गाहडवाड़वंशीय अन्तिम राजा हुए, जिन्हें ११९३ ई० में