खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमुसलमानों ने जीतकर अपदस्थ कर दिया। श्रीजयचन्द्र का ११८६ ई० का एक दानपत्र भी मिलता है¹। उससे उनका काल स्पष्ट निर्णीत हो जाता है। कहा जाता है कि श्रीहर्ष ‘ब्रह्मविद्याभरण’ के लेखक श्रीअद्वैतानन्द के समकालीन थे, जिनका समय ११६६-६६ ई० बताया जाता है। नव्यन्याय के प्रवर्तक श्रीगङ्गेशोपाध्याय ने भी कहा है कि ‘एतेन खण्डनकारमतमपास्तम्’, जिनका समय ईसा की १३ वीं शती बताया जाता है। यह सब देखते हुए खण्डनकार का समय ईसा की १२ वीं शती का उत्तरार्ध सिद्ध होता है। पाश्चात्य विद्वान् बूलर ने श्री श्रीहर्ष का यही काल (११६६ से ११६३ ई०) माना है। किन्तु श्री के. टी. तैलङ्ग इसे नहीं मानते। वे श्रीहर्ष को ९वीं या १० वीं शती का मानते हैं। बूलर के मत के खण्डन में वे तीन तर्क देते हैं : १. नैषध का उद्धरण भोज के ‘सरस्वतीकण्ठाभरण’ में मिलता है। २. वाचस्पति मिश्र ने ११ वीं सदी में ‘खण्डनोद्धार’ लिखकर खण्डन का खण्डन किया है। और ३. सायणमाधव ने ‘शंकर-दिग्विजय’ में श्रीहर्ष को श्रीशंकराचार्य के समकालीन (७८८-८२० ई०) बताया है। किन्तु बूलर ने इनके इन तर्कों का खण्डन भी कर दिया है। वे कहते हैं कि ‘सरस्वती-कण्ठाभरण’ का काल निश्चित नहीं है और उसमें दिये गये उद्धरण भी सही नहीं। दूसरे तर्क के बारे में वे कहते हैं कि ‘खण्डनोद्धार’ के लेखक वाचस्पति षड्दर्शनों के टीकाकार वाचस्पति से भिन्न कोई नये वाचस्पति हैं। काशी के पण्डितों का भी यही विश्वास है। कारण वाचस्पति मिश्र ने अपने ‘न्यायसूची-निबन्ध’ में कहा है कि मैंने इसे विक्रम संवत् ८६८ (८४१ ई०) में रचा है²। तीसरे तर्क के बारे में बूलर कहते हैं कि सायण-माधव का वक्तव्य ऐतिहासिक विश्वसनीय नहीं है। कारण उन्होंने शङ्कर, बाण आदि को, जिनका परस्पर भिन्नकालिक होना निश्चित है, वहाँ एक साथ १. “सोऽयं श्रीमज्जयन्तचन्द्रो विजयी अधिकारिपुरुषानाज्ञापयति बोधयत्यादिशति च ‘विदित- मस्तु भवतां यथोपरिलिखितग्रामः सजलस्थलः सलोहलवणाकरः समत्स्याकरः सगर्तोषरः सगिरि- गहननिधानः, समधुकास्रवनवाटिकाविटपतृणयूतिगोचरपर्यन्तः सोर्ध्वाधश्चतुराघाटविशुद्धः स्वसीमा- पर्यन्तास्त्रिचत्वारिंशदधिकद्वादशशतवत्सर आषाढे मासि शुक्लपक्षे सप्तम्यां तिथौ रविदिने (अङ्कतोऽपि १२४३ आषाढ शुदि रवौ ७ अद्येह श्रीमद्वाराणस्यां गङ्गायां स्नात्वा विधिवन्मन्त्र- वदेव मुनिमनुजभूतपितृगणाँस्तर्पयित्वा तिमिरपटलपाटनपटुमहसमुष्णरोचिषमुपस्थायौषधिपतिशकल शेखरं समभ्यर्च्य त्रिभुवनत्रातुर्भगवतो वासुदेवस्य पूजां विधाय प्रचुरपायसेन हविषा हवि- र्हुत्वा मातापित्रोरात्मनश्च पुण्ययशोऽभिवृद्धयेऽस्माभिर्गोकर्णकुशलतापूतकलोतलोद- द्दाजगोत्राय भारद्वाजाङ्गिरसबार्हस्पत्येति त्रिप्रवराय राउत श्रीआठले पौत्राय राउत डोड राउत श्रीऋएंगाय चन्द्राकं यावच्छासनीकृत्य प्रदत्तो मत्वा तथादीयमानभो करप्रभृतिनियतानियतसमस्तदायादाज्ञाविधेयीभूय दास्यथ” इत्यादि । २. “न्यायसूचीनिबन्धोऽसावकारि सुधियां मुदे । श्रीवाचस्पतिमिश्रेण वस्वङ्कवसुवत्सरे ॥”