खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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ला बिठाया है। अतः तेलङ्ग का यह कहना कि श्रीहर्ष ६ वीं, १० वीं सदी के हैं, विश्व- सनीय नहीं है। कुछ लोग श्रीहर्ष को अपने पिता को हरानेवाले नैयायिक श्रीउदयनाचार्य के प्रति- शोधकर्ता बताते हुए यहाँतक कहते हैं कि स्वयं श्रीहर्ष ने उदयन को पछाड़ा। उदयना- चार्य के यह कहने पर कि 'तू निरी गाय है', श्रीहर्ष की अकाट्य और उदयन की पराजय- की हेतु युक्ति के रूप में वे यह श्लोक भी प्रस्तुत करते हैं : “किं गवि गोत्वमथागवि गोत्वं यदि गवि गोत्वं मयि नहि तत्त्वम् । अगवि च गोत्वं यदि भवदिष्टं भवतु भवत्यपि सम्प्रति गोत्वम्' ॥” ये लोग अपनी पुष्टि में यह तर्क भी रखते हैं कि श्रीहर्ष उदयन-मत का खण्डन करते हुए उन्हें कहीं-कहीं मध्यमपुरुष, सर्वनाम द्वारा कुछ इस प्रकार सम्बुद्ध करते हैं, मानो
- उनसे साक्षात् शास्त्रार्थ कर रहे हों। किन्तु ऐतिहासिक सुदृढ प्रमाणों से जब वे जयचन्द्र (११६६-११६३) के आश्रित सिद्ध हो जाते हैं, तो ६८४-८५ ई० के श्रीउद- यनाचार्य से उनकी भेट या शास्त्रार्थ का प्रश्न ही नहीं उठता; बल्कि उनके पिता को भी लगभग पौने दो सौ वर्ष पूर्व के नैयायिक-शिरोमणि प्रसिद्ध उदयनाचार्य द्वारा हराना बुद्धि में नहीं बैठता। संभव है, प्रसिद्ध उदयन-मत के अनुयायी, पर उदयन नाम के ही कोई अन्य पण्डित हों, जिन्होंने उनके पिता को हराया हो और उसका बदला चुकाने में श्रीहर्ष ने मूलभूत उदयनमत का खण्डन किया हो। अथवा पिता के प्रति अत्यन्त भावुक श्रीहर्ष को उनके विजेता उदयन नाम से ही चिढ़ हो गयी हो और उसी चिढ़ में उन्होंने नामसाम्य से प्रसिद्ध उदयनाचार्य का भी अपनी प्रौढ़ प्रतिभा से खण्डन कर दिया हो। रह गयी खण्डन में मध्यम पुरुष के प्रयोग की बात ! वह तो आचार्यों की शैली है। अपने पूर्ववर्ती आचार्य के मत के विवेचन में परवर्ती आचार्य मध्यम पुरुष का प्रयोग करते ही रहते हैं—कहीं आदर में, तो कहीं उपेक्षा में। एतावता इसे समकालिकता का प्रयोजक नहीं माना जा सकता। इस तरह उपर्युक्त श्लोक भी किंवदन्ती से अतिरिक्त कुछ नहीं ठहरता । कुछ लोग श्रीहर्ष को काव्यप्रकाशकार मम्मट के समकालीन बतलाते हुए कहते हैं कि श्रीहर्ष ने 'नैषधचरित' बनाकर अपने गौरव-प्रदर्शनार्थ उसे मम्मटभट्ट को दिखलाया। मम्मट ने आद्योपान्त पढ़कर कहा कि 'अरे ! यदि मुझे पहले ही यह काव्य दिखलाया जाता, तो 'काव्य-प्रकाश' के दोष-परिच्छेद में दोषोदाहरण खोजने का मेरा प्रयास बच १. अर्थात् मुझे आपने गाय कहा, तो बतायें कि गोत्व गाय में ही रहता है या गाय से भिन्नमें गाय में ही रहता हो, तो वह मुझ में रह नहीं सकता, तब आपने यह कैसे कहा ? यदि गोत्व सिद्ध करना चाहें, तो फिर वह मेरी तरह आपमें भी गोत्व निर्बाध रहेगा । स्वयं नैषधकार स्वयं कहते हैं कि यदि किसी व्यक्ति का वही नाम हो, जो अपने शत्रु तेजस्वी उसे सहेगा ? 'नामापि जागर्ति हि यत्र शत्रोस्तेजस्विनस्तं कतमं सहन्ते ।'