खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजाता, अर्थात् आपके काव्य में वे सभी दोष आ गये हैं। किन्तु यह बात भी विवेचकों की बुद्धि में नहीं बैठ सकती । कारण मम्मट का काल ईसा की ११वीं सदी का उत्तरार्ध माना गया है, क्योंकि उन्होंने अभिनव गुप्त ( १०१५ ई० में जीवित ) और पद्मगुप्त ( १०१० ई० के आस-पास ) के पद्यों को उद्धृत किया है तथा एक श्लोक भोज की दानशीलता में भी लिखा है । इधर काव्यप्रकाश की सर्वप्रथम टीका 'संकेत' माणिक्यचन्द्रसूरि ने ११६० ई० में बनायी है। इस प्रकार जहाँ मम्मट ११वीं सदी के उत्तरार्ध में हैं, वही श्रीहर्ष जयचन्द्र के सभापण्डित के नाते १२वीं सदी के उत्तरार्ध में आते हैं। अतः बीच के सौ वर्ष का अन्तर दोनों को कैसे मिला सकता है ? इसलिए यह मत भी विशेष विश्वसनीय नहीं और न इसके कारण श्रीहर्ष एक सदी पीछे ही धकेले जा सकते हैं । हम समझते हैं कि खण्डनकार के समय-निर्धारण में स्वयं उनकी अन्तःसाक्ष्य ही विशेष महत्त्व की होगी । उनके 'ताम्बूलद्वयमासनं च लभते यः कान्यकुब्जेश्वरात्' इस श्लोक से ऐतिहासिकों ने जहाँ उन्हें जयचन्द्र (११६६-११९३ ई०) के राजपण्डित सिद्ध कर दिया है, वहीं खण्डन में उद्धृत उनकी एक अन्य कारिका भी उनके समय पर और प्रकाश डालती है¹। उक्त कारिका में उन्होंने 'व्यक्तिविवेक'-कार महिमभट्ट का आदर के साथ उल्लेख किया है । इन महिमभट्ट का काल ११ वीं सदी का मध्यकाल है, अधिक से अधिक ११वीं सदी के आरम्भ से पूर्व तो जा ही नहीं सकता । कारण उन्होंने 'व्यक्तिविवेक' में अभिनव गुप्त का उद्धरण दिया है, जिनका काल ९८० से १०२० ई० है । इधर मम्मट ने ( ११वीं सदी का उत्तरार्ध ) उनके द्वारा उद्भावित दोषों को अपने 'काव्यप्रकाश' में उद्धृत किया है। अतः श्रीहर्ष महिम भट्ट से पूर्व (११वीं सदी से पूर्व) कभी जा ही नहीं सकते । अब तक के अन्य प्रमाणों ने भी इसी बात की पुष्टि की है । किन्तु इस तरह निर्णीत ईसा की १२वीं सदी का उत्तरार्ध भी श्रीहर्ष का स्थूलकाल ही कहा जायगा । उसकी सूक्ष्मता में उतरें, तो उनका जीवनकाल १२ वीं सदी का प्रथम चरण और उनकी ग्रन्थ-रचना का काल १२वीं सदी के द्वितीय चरण के आस-पास मानना पड़ेगा, ऐसा दीखता है। कारण नैषध या श्रीहर्ष का सर्वप्रथम उद्धरण करनेवाले हेमचन्द्र ( १०८८-११७२ ई० ) के शिष्य महेन्द्र सूरि ने 'अनेकार्थ-संग्रह' की टीका में जिन-जिनके नाम उद्धृत किये हैं, प्रायः वे सभी १२ वीं सदी के मध्य के बाद के नहीं हैं । लेकिन ऐसा मानने पर एक आपत्ति यह आती है कि राजशेखर ने कहा है कि 'जयचन्द्र के शासन-काल में ( ११६६ से ११९३ ई० ) श्रीहर्ष ने नैषध लिखा' क्या गति होगी ? तो कहना होगा कि उनका यह कथन अक्षरशः सत्य जा सकता । कारण उन्होंने ११७४ ई० में जयचन्द्र के प्रधानमन्त्री की यात्रा का वर्णन किया है और उस यात्रा के पूर्व ही श्रीहर्ष की काश्मीर
१. 'दोषं व्यक्तिविवेकेऽमुं कविलोकाविलोचने । काव्यमीमांसिषु प्राप्तमहिमा महिमादृत ॥' ( खण्डन, ४ परि० )