भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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उल्लेख किया है। तथ्य यह है कि श्रीहर्ष नैषध लेकर ही काश्मीर गये थे। अतः उसकी रचना ११७४ से पूर्व हो चुकी थी। इसलिए जयचन्द्र के राज्यारंभ से ५ वर्षों (११६६ से ७३ ई०) के बीच ही किसी तरह नैषध का रचना-काल बैठाना होगा। इस तरह राजशेखर का यह कथन सत्य मानने के लिए कोई बाध्यता नहीं। सिवा इसके राजशेखर ने तो जयचन्द्र को गोविन्दचन्द्र का पुत्र बताकर (प्रबन्धकोष, पृ० ५५) दोनों के बीच के महाराज विजयचन्द्र की सत्ता ही मिटा दी। जयचन्द्र के दादा गोविन्दचन्द्र ११५४ ई० तक अवश्य थे¹ और जयचन्द्र ११६६ से सिंहासनारूढ हुए। इस बीच का काल उनके पिता विजयचन्द्र का राज्यकाल माना जा सकता है। इसीलिए श्रीहर्ष के ग्रन्थों में एक 'विजय-प्रशस्ति' का होना भी संगत होता है, जो विजयचन्द्र की प्रशस्ति में रची गयी होगी। नैषध के टीकाकार-गदाधर तो श्रीहर्ष को स्पष्ट गोविन्दचन्द्र के आश्रित बताते हैं। इन सबसे स्पष्ट है कि श्रीहर्ष प्रथम गोविन्दचन्द्र के आश्रित हुए, उसके बाद विजयचन्द्र के और अन्त में जयचन्द्र के आश्रित हुए। इस तरह उनका जयचन्द्र का आश्रित होना भी संगत हो जाता है। काल-निर्णय होने के बाद श्रीहर्ष के स्थान-निर्णय का प्रश्न आता है। वास्तव में वे कहाँ के थे और कहाँ रहे ?, इस विषय में अबतक अनेक विद्वानों ने अनेक अनुमान लगाये हैं। उनकी माता का नाम 'मामल्लदेवी' था। ऐसा नाम दक्षिण भारतीय या काश्मीरी हो सकता है। इस तरह तो श्रीहर्ष दक्षिण [स्थान-निर्णय] भारत या काश्मीर के सिद्ध होते हैं। एक किंवदन्ती उन्हें मम्मट का भागिनेय भी बताती है। इधर श्रीदासगुप्ता और श्रीनीलकमल भट्टाचार्य उन्हें बङ्गाली सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। उनके मत से गौडेश्वर के आश्रित होने के नाते वे गौड़ याने बंगाल के निवासी सिद्ध होते ही हैं। अन्य भी अन्तःसाक्ष्य पाये जाते हैं। जैसे विवाह के समय 'उलु' शब्द का उच्चारण और 'शंखवलय' का धारण, जिसका कि उनके 'नैषध' में दमयन्ती के विवाह के अवसर पर (१४।५१) उल्लेख है। किन्तु ये सारे प्रमाण कितने व्यभिचरित हैं, यह डा० चण्डिकाप्रसाद शुक्ल ने अपने 'नैषध-परिशीलन' की भूमिका में विस्तार से दिखलाया है। उनके सारे विवेचन का सारांश इतना ही है कि १. गौड़ देश की व्याप्ति बंगालतक ही सीमित नहीं, बल्कि- बंगाल, गोड़वाना, गोंडा और कभी-कभी समस्त उत्तर भारतके लिए भी यह शब्द प्रयुक्त हुआ है। २. उलु-शब्द का प्रयोग तो परकालीन साहित्य में विवाह-प्रसंग का मुख्य विषय ही बन गया। वैसे 'अनर्घराघव' में मुरारी कवि ने भी इस शब्द का विवाह के प्रसंग में उल्लेख किया है, जब कि मुरारी कवि निश्चित ही काश्मीरी थे। ३. शंखवलयका भी यही हाल है। कादम्बरी में श्रीबाण ने जाबाली-आश्रम- में शंखवलय का उल्लेख किया है, जो थे बिहारी और रहते थे थानेश्वर । बाण


१. श्रीधर रामकृष्ण भाण्डारकर के द्वितीय भ्रमण का विवरण, ई० १६०४-५ पृ० ४३,८७ ।