खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 203, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ें१८६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम शब्द एव तद्व्यापारः किन्न स्यादिति चेन्न । तस्य कर्मत्वेन करणकोटि- बहिर्भावात् । क्वचित्तयोरेकत्वेऽपि का क्षतिरिति चेन्न । शब्दबुद्धौ कार्यायामुपधायकत्वेन प्रविष्टस्य शब्दस्य करणव्यापारतया कारणकोटावपि प्रवेशनेऽशतो नियम्यनिया- मकत्वविरोधापत्तेः । घटादिबुद्धौ चक्षुरादेश्चक्षुर्घटादिसंसर्गव्यापारक्त्वेऽपि सम- मिदमिति चेत् किन्न स्यात् । तथा च— बाधेऽदृढेऽन्यसाम्यात् किं दृढेऽन्यदपि बाध्यताम् । क्व ममत्वं मुमुक्षूणामनिर्वचनवादिनाम् ॥ ३३ ॥ तथा हि मिथिलानाथो मुमुक्षुर्निर्ममः पुरा । आहेदं मिथिलादाहे न मे किञ्चन दह्यते ॥ ३४ ॥ समर्थन—श्रोत्र-इन्द्रिय आकाशरूप है और शब्द आकाश का गुण है। अतः श्रोत्र से जन्य तथा शब्द-प्रत्यक्ष का जनक होने से शब्द को ही शब्द-प्रत्यक्ष में व्यापार क्यों न मानें ? खंडन—शब्द [ प्रत्यक्ष प्रमा का ] कर्म है, अतः उक्त प्रमा का करण नहीं हो सकता समर्थन—यद्यपि सर्वत्र कर्म से अन्य ही करण होता है, तथापि शब्द-प्रत्यक्ष में कर्म को ही करण मानें, तो क्या हानि है ? खण्डन—यदि शब्द को व्यापार मानें, तो विषयतासम्बन्ध से शब्दविशिष्ट प्रत्यक्ष में शब्दरूप व्यापारविशिष्ट श्रोत्र के करण होने से विशिष्टवृत्ति धर्म विशेषण में भी अवश्य रहता है। अतः शब्द का कार्य और कारण दोनों दलों में प्रवेश होने से वह कार्य और कारण दोनों हो जायगा, जो आत्माश्रय होने से अनुचित है । समर्थन—ऐसा मानें, तो विषयतासम्बन्ध से घटविशिष्ट प्रमा में घटसंयुक्त चक्षु के कारण होने से विशेषणरूप से घट का कार्य और कारण दोनों दलों में प्रवेश होने के कारण उसमें भी कार्यत्व और कारणत्व का प्रसङ्ग हो जायगा । खण्डन—ऐसा क्यों नहीं ? यदि बाधक (दूषण) दृढ़ (अखण्डनीय) है, तो अन्यत्र भी इसी प्रकार से दोष हो जायगा । ऐस साम्य दिखाने से क्या होगा ? उसे भी उक्त दोष से ही खण्डित जानिये । पदार्थमात्र को अनिर्वचनीय माननेवाले मुमुक्षु पुरुषों का भी क्या किसीमें ममत्व हो सकता है ? स्मरण कीजिये, मुमुक्षु और निर्मम मिथिलेश जनक ने मिथिला-दाह के समय भी कहा था कि 'मिथिला के जलने पर भी मेरा कुछ नहीं जलता।'