भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 204

परिच्छेद ] व्यापार-लक्षण का खण्डन १८७ नापि द्वितीयः ; लिङ्गपरामर्शस्यानुमितौ अकरणत्वप्रसङ्गात् । निर्विकल्पक- स्यापि तस्योपगमे सविकल्पकानाश्रयत्वात् । अतद्धेत्वाश्रयस्य तद्धेतुव्यापारत्वे चात्यापत्तेः । किञ्च – फलाव्यभिचारित्वं किं तस्मिन्नेव काले फलस्य सत्त्वनियमः , उत तदनन्तरं फलसत्त्वनियमः ? नाद्यः; कारणस्य पूर्वभाविताया अवश्यं वक्तव्यत्वात् । न द्वितीयः ; आनन्तर्यं यद्यव्यवहितानन्तर्यं विवक्षितं तदा यत्किञ्चिद्व्या- पारवतः करणत्वपक्षे हस्तादेरकरणत्वापत्तेः । आफलव्यापारवतस्तथात्वे कर्त्रादिष्वतिव्याप्तिः । अथ व्यवहितस्यापि आनन्तर्यं विवक्षितम्, तदाऽपि यत्किञ्चिद्व्यापाराभिप्राये 'करण में स्थित कारण व्यापार है' यह द्वितीय पक्ष भी अयुक्त है। कारण, लिङ्ग- परामर्श में कोई व्यापार नहीं है, अतः लिङ्गपरामर्श करण नहीं कहा जायगा । साथ ही धूम का निर्विकल्पक ज्ञान भी करण नहीं होगा, क्योंकि सविकल्पक लिङ्गपरामर्श उसमें नहीं, किन्तु आत्मा में रहता है। यदि अन्य कारण में स्थित को भी करण का व्यापार मानें, तो सहकारीमात्र करण के व्यापार हो जायेंगे । किञ्च—'व्यापारवान् कारण का फल के साथ अव्यभिचार' क्या वस्तु है ? क्या वह व्यापारवान् कारण के काल में फल (प्रधान क्रिया ) का अवश्य होना है अथवा व्यापारवान् कारण के अनन्तर काल में फल का अवश्य होना है ? इनमें प्रथम पक्ष अयुक्त है; क्योंकि जिस काल में कारण हो, उस काल में [ कारण-जन्य होने से ] कार्य नहीं रह सकता, क्योंकि जन्य-जनक में पूर्व और परभाव का नियम है । द्वितीय पक्ष में यदि अव्यवहित अनन्तर ( उत्तर) कहें और 'यत्किञ्चित् व्यापारवान् करण है' इस पक्ष का आश्रयण करें, तो हस्त के यत्किञ्चित् व्यापार के अव्यवहित उत्तर क्षण में फल न होने से हस्त में अव्याप्ति हो जायगी । यदि 'फलोत्पत्तिपर्यन्त व्यापार- वान् करण है' इस पक्ष का ग्रहण करें, तो हस्त में अव्याप्ति तो न होगी, क्योंकि काष्ठ, अग्नि आदि के व्यापार भी हस्त से प्रयोज्य होने के कारण हस्त के ही व्यापार हैं और उन व्यापार-समूहों के अव्यवहित अनन्तर फल नियमतः होता ही है । परन्तु इसी तरह कर्ता आदि के व्यापार भी फलपर्यन्त होते हैं और उनके अव्यवहित उत्तरक्षण में फल नियमतः होता है; अतः कर्ता आदि में अतिव्याप्ति हो जायगी । द्वितीय पक्ष में यदि व्यवहित उत्तर कहें और 'यत्किञ्चित् व्यापारवत् करण है' यह मानें, तो जहां अन्तराय ( विघ्न ) होने से हस्त-व्यापार के अनन्तर फल न