भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 610 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 206

परिच्छेद ] व्यापार-लक्षण का खण्डन १८६ येन क्रियाकारणेन युक्त एव प्रमिमीत इति चेन्न । सुखादिप्रमितौ करण- व्यापारस्याऽपि करणत्वप्रसङ्गात् । ओमिति चेन्न । अव्यापारतयाऽकारकत्वेन तद्विशेषकरणभावानुपपत्तेः । व्यापारवताऽपीति चेन्न । एवं हि व्यापारवत एव करणत्वं न स्यात्, न हि व्यापारवतस्तस्य व्यापारान्तरवत्त्वऽस्ति। अथ व्यापारवतो व्यापारांशमपहाय करणत्वम्, तत्र चास्त्येवेदं लक्षणम् । यस्य करणत्वमस्ति तस्य व्यापारवत्त्वमप्यस्तीति व्यापारवत् करणमुच्यत इति । न; पटमुद्यम्य निपात्य च प्रक्षालयतः स कर्मेव हि करणं स्यात् । किंच—किं तस्य करणत्वमिति लक्ष्यीभूतस्य अवश्यवक्तव्यत्वात् । यद्युक्त- समर्थन—जिस प्रमिति के कारण से युक्त होकर प्रमाता प्रमिति करे, वह प्रमाण है, ऐसा कहेंगे । खंडन—तब तो सुखादि-प्रमिति के कारण आत्ममनः- संयोगरूप व्यापार से युक्त ही प्रमाता सुखादि की प्रमिति करता है। अतः सुखादिप्रमिति में आत्ममनःसंयोग भी करण हो जायगा । 'उक्त प्रमिति में आत्ममनःसंयोग करण है ही' इसे इष्टापत्ति नहीं कह सकते, क्योंकि व्यापार न होने से आत्ममनःसंयोग जब कारक ही नहीं, तो कारकविशेषरूप करण कैसे हो सकेगा ? समर्थन–'जिस क्रिया के व्यापारवान् करण से युक्त होकर प्रमाता प्रमिति करता है, वह करण है' ऐसा लक्षण करेंगे । एवञ्च आत्ममन.संयोग व्यापाररहित है, अतः उसमें अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन--ऐसा होने पर व्यापारवान् कुठारादि भी करण न कहे जा सकेंगे । कारण अंशतः आत्माश्रय दोष होने से व्यापारविशिष्ट कुठार में वह व्यापार तो रह नहीं सकता, जिससे वह विशिष्ट है। फिर उसमें अन्य कोई व्यापार भी नहीं है । समर्थन---व्यापार से उपलक्षित कुठार करण है और उस कुठार में उपलक्षणीभूत व्यापार रहता है, अतः उक्त लक्षण का समन्वय हो जायगा । खण्डन --तब तो पट को उठाकर निपातन करता हुआ रजक जहाँ वस्त्र-प्रक्षालन करता है, वहाँ पटरूप कर्म भी करण हो जायगा । कारण, वहाँ उद्यमन-निपातनरूप व्यापार से युक्त तथा प्रक्षालनरूप क्रिया का कारण जो पट है, उससे युक्त ही कर्ता प्रक्षालन करता है । किञ्च—जिस करण का आप लक्षण करते हैं, वह लक्ष्यभूत करण क्या वस्तु है, यह अवश्य कहना होगा । अन्यथा लक्षणरूप धर्म किस धर्मी में रहेगा ? यदि